मस्तिष्क की संरचना, अग्र मस्तिष्क – मानव मस्तिष्क जानकारी

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जैसा कि आरम्भ में (पूर्व में) बताया जा चुका है कि हमारे सिर की खोपड़ी मजबूत अस्थियों से बनी है । मस्तिष्क ही मन, बुद्धि और शरीर की चेतना का मुख्य आधार है। मोटे तौर पर आठ हड्डियों से बने हुए कोष्ठ (Cranium) के एक सन्दूक के सुरक्षित एक भूरे रंग का अंग है। दिखने में इसकी बनावट ‘अखरोट’ से मिलती जुलती है। मस्तिष्क की लम्बाई (आगे-पीछे) छ: से साढ़े छः इंच, चौड़ाई (दाँये-बाँये) पाँच से साढ़े पाँच इंच और मोटाई लगभग 5 इंच होती है। प्रौढ़ व्यक्ति के मस्तिष्क का औसत भार लगभग 21 छटांक होता है। किन्तु स्त्रियों के मस्तिष्क का भार कुछ कम होता है । आयु के प्रथम 4 वर्षों में इसका भार तेजी से बढ़ता है और 20 वर्ष की आयु तक यह सबसे अधिक हो जाता है । शरीर शास्त्र के ज्ञाताओं ने मस्तिष्क को तीन प्रमुख भागों में बाँटा है

(1) वृहत् मस्तिष्क (Greater Brain)
(2) लघु मस्तिष्क (Cerebellum)
(3) सुषुम्ना (Medulla Oblongata)

वृहत् मस्तिष्क की रचना

यह मानव शरीर का बहुत ही आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण अंग है। यह अण्डे की शक्ल का होता है। यह सिर के सामने के हिस्से में होता है I यह ऊपर से भूरा (Grey Matter) रंग का तथा भीतर से काटने पर सफेद रंग का दिखाई देता है। इसका ‘भूरा’ पदार्थ वात कोषों से बनता है और ‘सफेद’ भाग में वात-तन्तु होते हैं ।

वृहत् मस्तिष्क में कहीं उभार और कहीं गहराई होती है। यह ऐसा दिखाई देता है कि मानों नालियों वाला कोई जोता हुआ खेत हो । इसमें जो गहराई (नालियाँ) होती हैं, उनका बुद्धि से सम्बन्ध होता है। जो मनुष्य जितना अधिक बुद्धिमान होगा, वृहत् मस्तिष्क की ये नालियाँ उतनी ही गहरी होंगी । वृहत् मस्तिष्क की इन नालियों को ‘सीता’ (Sulcus) और उभरे हुए भाग को ‘चक्रांक’ कहते हैं । कुल मस्तिष्क के भाग का 87.5% भाग इसी से बनता है। इसका बड़ा होना बुद्धि ज्ञान की अधिकता का परिचायक है । प्राय: 40 वर्ष की आयु तक इसका भार बढ़ता रहता है फिर क्रमश: घटने लगता है ।

वृहत् मस्तिष्क के दो भाग होते हैं – (1) बाँया तथा (2) दूसरा दाँया। इनको गोलार्द्ध (Hemisphere) कहा जाता है। बाँयी तरफ का भाग शरीर के दाँये भाग से तथा दाँये भाग से शरीर का बाँया भाग सम्बन्धित होता है । इस भाग से 12 जोड़े वात नाड़ियाँ (Cranial Nerves) निकलती हैं जो शरीर के अंगों तक पहुँचती है। मस्तिष्क के निचले भाग से नाड़ियों के जो 12 जोड़े निकलते हैं जिसमें से कुछ सुख-दु:ख का अनुभव कहा जाता है और कुछ ‘मिश्रित’ प्रकार के होते हैं। यह बारह जोड़े निम्न प्रकार हैं:-

1. घ्राण नाड़ी (Olfactory Nerve) – यह नाड़ियाँ गन्ध का ज्ञान कराती हैं। ये संवेदानिक प्रकार की नाड़ी है। इसकी 20 शाखायें होती हैं। नासिका के ऊपर की एक तिहाई श्लेष्मिक कला को यह गन्ध का ज्ञान कराती हैं ।

2. दृष्टि नाड़ी (Optic Nerve) – यह भी संवेदनिक नाड़ी है जो मस्तिष्क तक दृष्टि की संवेदना पहुँचाती है । प्रत्येक स्नायु आँख के गोले तक जाती हैं ।

3. नेत्र चालनी नाड़ी (Oculomotor Nerve) – यह नाड़ी आँख के गोले का संचालन करती है । यह नाड़ी आँख की 6 पेशियों में से 4 पेशियों को चलाती है । जिन पर आँख के गोलों का भिन्न-भिन्न दिशाओं में गति करना निर्भर करता है । यह चालक नाड़ी है ।

4. कटाक्षिणी नाड़ी (Trochlear Nerve) – आँख के गोले के ऊपर की टेढ़ी पेशियों का संचालन करने वाली चालक नाड़ी है ।

5. त्रिशिखा नाड़ी (Trigeminal Nerve) – यह जोड़ा मिश्रित प्रकार का है । इनमें से एक संवेदनिक है जो आँख, नाक, मुख, दाँत और गाल के निकट के भागों में फैला है। इससे दाँत दर्द, स्वाद और चेहरे का दर्द का ज्ञान होता है । इसकी दूसरी शाखा चालक प्रकार की है जो भोजन चबाते समय जबड़ों को घुमाने-फिराने वाली पेशियों तक जाती है ।

6. नेत्रपार्श्व की नाड़ी (Abducens Nerve) – यह जोड़ा चालक प्रकार का है और आँख के गोले की बाहरी पेशी को चलाता है ।

7. मुखमण्डलीय नाड़ी (Facial Nerve) – यह भी शुद्ध नाड़ी का चालक जोड़ा है जो मुखमण्डल की पेशियों का संचालन करता है ।

8. श्रावणी नाड़ी (Auditory Nerve) – यह संवेदनिक नाड़ी है जो सुनने से सम्बन्ध रखती है । इसका सम्बन्ध अन्तरीय कान से होता है ।

9. जिह्वा कण्ठगत नाड़ी (Glossopharyngeal Nerve) – यह भी मिश्रित प्रकार की होती है। इसकी एक शाखा संवेदनिक है, जो जिह्वा के पिछले भाग में फैली हुई है। इसका सम्बन्ध स्वाद से है। दूसरी शाखा चालक है जो कण्ठ की पेशियों का संचालन करती है ।

10. प्राणदा नाड़ी (Vagus Nerve) – यह मिश्रित नाड़ी है। फुफ्फुस, हृदय, यकृत एवं आमाशय में फैली रहती है । इसका अपना प्रभुत्व है ।

11. मेरु सहायक नाड़ी (Spinal Accessory Nerve) – यह जोडा शुद्ध चालक, नाड़ियों का है । यह ग्रीवा की कुछ मांसपेशियों से सम्बन्ध रखती है ।

12. जिह्वा धोवर्ती नाड़ी (Hypoglossal Nerve) – यह भी चालक नाड़ी है जिसका सम्बन्ध जिह्वा के अधोभाग से होता है ।

इस प्रकार मस्तिष्क से निकलने वाली नाड़ियों के 12 जोड़े ज्ञान कराने में और कभी संचालन करने का कार्य करते हैं ।

लघु मस्तिष्क की रचना

यह खोपड़ी में पीछे की ओर, वृहत् मस्तिष्क के नीचे रहता है । यह शक्ल (आकृति) में उससे छोटा और दबे हुए गोले जैसा होता है। इसमें भी अनेक नालियाँ ‘सीताएँ’ होती हैं जो वृहत्मस्तिष्क की सीताओं से अधिक गहरी होती हैं। इसका औसत भार समस्त मस्तिष्क के कुल भार का 1/4 भाग होता है। साधारणत: इसका भार 2 या ढाई छटांक के लगभग होता है, इसकी चौड़ाई 4 इंच और मोटाई लगभग 1 इंच होती है ।

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