सल्फर ( गन्धक ) – Sulphur

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सल्फर के होम्योपैथी लाभ

( Sulphur Homeopathic Medicine In Hindi )

(1) सल्फर के शारीरिक-लक्षण – दुबला-पतला, झुक कर चलने वाला, बदहजमी का शिकार, दुबलेपन में फॉस से तुलना – इसका रोगी दुबला-पतला होता है, सीधा नहीं चल सकता, कुबड़ों की तरह झुक कर चलता है, शरीर के कोने निकले दिखाई देते हैं, हड्डियां उभरी हुई, बूढ़ों की तरह गर्दन नीचे किये चलता है। शरीर पुष्ट नहीं होता, हाथ-पांव दुबले होते हैं। रोगी का हाजमा भी ठीक नहीं होता, पोषण-क्रिया के विकार के कारण रोगी निर्बल होता है। जब कोई व्यक्ति घर से बाहर नहीं निकलता, घर में बैठा रहता है, अपने कमरे में बंद पड़ा पुस्तकों का कीड़ा बन जाता है, खुली हवा में चलता-फिरता नहीं, व्यायाम नहीं करता, तब उसकी ऐसी हालत हो जाती है कि जो कुछ भी खाना खाता है उस से शरीर का ठीक तरह से पोषण नहीं हो पाता। वह पतला हो जाता है, चलता भी झुका हुआ, बैठता भी झुका हुआ, टिक कर एक स्थान पर खड़ा नहीं रह सकता, परन्तु पतले होने का यह मतलब नहीं है कि मोटे व्यक्तियों के लिये यह औषधि नहीं है। सल्फर के रोगी के लिये एक जगह टिक कर खड़ा न हो सकना बड़ा मुख्य लक्षण है।

दुबलेपन में फॉस से तुलना (फॉस में सल्फर की बदबू नहीं है) – यह औषधि तथा फॉसफोरस दुबलेपन में एक-दूसरे से मिलते हैं। दोनों पतले-दुबले, कन्धे झुका कर चलने वाले हैं। दोनों के लिये एक जगह टिक कर खड़े रहना कठिन है। दोनों का चेहरा बड़ा कोमल दीखता है, दोनों रक्तहीन होते हैं। डॉ० नैश कहते हैं कि सल्फर और फॉस – इन दोनों में इतनी समानता है कि अगर फॉस्फोरस में भी सोरा-दोष इतना प्रबल होता जितना प्रबल यह सल्फर में है, तो ये दोनों एक-दूसरे के इतने नजदीक होते कि इन्हें अलग-अलग समझना ही कठिन हो जाता। फिर भी सल्फर की तेज बदबू, मैलापन, त्वचा के रोग इसे फॉसफोरस से पृथक कर देते हैं।

(2) सल्फर के शारीरिक लक्षण – मैला-कुचैला, बिखरे बाल, न नहाने वाला – इस रोगी का एक और भी शारीरिक रूप है जिसे देखकर झट से सल्फर का रोगी पहचाना जा सकता है। वह देखने में मैला-कुचैला होता है बाल बिखरे हुए, न जाने कब से कंघी नहीं की। चेहरा इसका लाल होता है, जरा-सी बात पर चेहरे पर लाली आ जाती है, हर मौसम का प्रभाव चेहरे पर नजर आता है। चेहरा हर समय मैला दीखता है, कितना भी वह नहाये-धोये मैलापन उस से नहीं छूटता। अगर रोगी बच्चा है, तो माँ चाहे उसे कितनी बार नहलाये, ऐसा गलता है कि वह कभी नहाया ही नहीं। बच्चे इतने गन्दे होते हैं कि नाक का मल होंठो पर आते ही मना करने पर भी उसे चाट जाते हैं।

(3) सल्फर के शारीरिक-लक्षण – रोगी से दुर्गन्ध आती है, स्नान करना पसन्द नहीं करता। (दुर्गन्ध में सोरिनम से तुलना) – इस रोगी के शरीर से इतनी दुर्गन्ध आती है कि दूर से उसे इस दुर्गन्ध से पहचाना जा सकता है। यह दुर्गन्ध इसलिये ही नहीं आती क्योंकि वह अपने को घोता नहीं है, वह अपने को कितना ही क्यों न धोये, यह दुर्गन्ध उसका पीछा नहीं छोड़ती। वैसे गन्दे लोगों के लिये स्वाभाविक है, वह स्नान करना पसन्द भी नहीं करता। केवल स्नान न करने के ही लक्षण पर सल्फर दे देना उचित चिकित्सा नहीं है। कई बच्चे सर्दियों में स्नान करना पसन्द नहीं करते, स्नान न करने पर सल्फर तब देना चाहिये अगर या तो व्यक्ति का स्वभाव ही गन्दा रहने का हो, या स्नान करने से उसके रोग में वृद्धि हो जाती है।

दुर्गन्ध में सोरिनम से तुलना (सोरिनम अत्यन्त शीत-प्रधान है) – जहां तक दुर्गन्ध और त्वचा के रोगों का सम्बन्ध है, सल्फर और सोरिनम एक ही कोटि में आते हैं, फिर भी सोरिनम में त्वचा के रोग सल्फर से ज्यादा पाये जाते हैं। दुर्गन्ध दोनों में पाई जाती है, परन्तु सोरिनम अत्यन्त शीत-प्रधान-है, गर्मी में भी वह गर्म कपड़ा ओढ़े रहता है-ठंड उसे इतना सताती है, सल्फर का रोगी प्राय: अपने मकान के दरवाजे खिड़कियां खुली रखना चाहता है, उसे मुख्यतौर पर ‘शीत-प्रधान’ नहीं कहा जा सकता, वह मध्य तापमान का है।

(4) सल्फर के शारीरिक-लक्षण – स्वयं दुर्गन्ध छोड़ता है, परन्तु अपनी दुर्गन्ध को भी बर्दाश्त नहीं करता – सल्फर का मरीज दुर्गन्ध से परेशान हो जाता है, परन्तु यह अचम्भे की बात है कि सल्फर का मरीज – बच्चा नाक, आंख या अन्य अंगों से दुर्गन्धयुक्त स्राव को चाट जाता है। रोगी अपनी गन्ध से भी घिनौनापन अनुभव करता है, अपने सांस की गन्ध से भी उसे उबकाई आती है, अपने मल से उसे ऐसी दुर्गन्ध आती है कि पाखाना होने के बाद भी उसे पाखाने की बू हर जगह पकड़े रखती है, दिन भर उसे अपने पाखाने की ही बू आती रहती है, वह अपनी बगल को, अपने जननांगों को कितना ही धोये-उन से बू आती ही रहती है।

(5) सल्फर के मानसिक लक्षण-स्वार्थी मनोवृत्ति – इस रोगी की मनोवृत्ति अत्यन्त स्वार्थमयी होती है। उसे अपने सिवाय अन्य किसी के मनोभावों का ख्याल नहीं होता। वह जो-कुछ भी सोचता या करता है, अपने ही फायदे के लिये करता है। किसी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना उसके स्वभाव का अंग नहीं है। स्वार्थ-वृत्ति उसका चरित्रगत लक्षण है।

(6) सल्फर के मानसिक लक्षण-चीथड़ों में लिपटा दार्शनिक – हेरिंग ने सल्फर के रोगी को चीथड़ों में लिपटा दार्शनिक का नाम दिया है। दार्शनिक, वैज्ञानिक दिन-रात एक कर के किसी प्रश्न के समाधान में जुटा रहता है। उसे कपड़ों की चिन्ता नहीं, कपड़े फटे पड़े हैं, सिर के बाल बढ़ गये हैं, कई दिन से हजामत नहीं की, पुस्तकों का ढेर टेबल पर अस्त-व्यस्त बेतरतीब पड़ा है, हर वस्तु बेढंगी है, ‘परवाह नहीं’ की मनोवृत्ति में वह रहता है। उसने कपड़े कई दिनों से न बदले हों, परन्तु इसकी उसे चिन्ता नहीं होती। वह अपने को बड़ा दार्शनिक, वैज्ञानिक समझता है, और उसे यह सोचकर निराशा होती है कि दुनिया उसकी कद्र नहीं करती। प्राय: देखा गया है कि ऐसे बेढंगे दार्शनिक को जब सल्फर दिया जाता है, तब कुछ देर बाद उसके रहने का तरीका बदल जाता है, वह हजामत करने लगता है, कपड़े साफ पहनने लगता है। कई ऐसे पागल होते हैं जो चीथड़े पहन कर अपने को आलीशान समझते हैं, अत्यन्त खूबसूरत। वे इसी हालत में बड़े प्रसन्न दीखते हैं, कोई चिन्ता नहीं फिक्र नहीं, अत्यन्त हर्ष में मग्न, बदसूरती में भी उन्हें सुन्दरता-ही-सुन्दरता दिखलाई पड़ती है।

(7) सल्फर के मानसिक लक्षण – कुछ काम न कर निठल्ला बैठा रहता है – (काम न करने में फॉस और सीपिया से तुलना) – रोगी कुछ काम नहीं करता, निठल्ला बैठा रहता है। उसकी स्त्री सब काम-काज करती है, कपड़े धोती है और उसकी देख-रेख करती है। वह समझता है कि उसकी स्त्री इसी काम के लायक है। इस रोगी में संस्कृति का कुछ अंश भी दिखलाई नहीं देता, बिल्कुल जंगली का-सा हो जाता है, आर्सेनिक के शराफत पसन्द रोगी से बिल्कुल उल्टा, अक्खड़।

(8) सल्फर के मानसिक-लक्षण – अपने को बहुत बड़ा समझता है – वह अपने की बहुत बड़ा कल्पित करता है, अपने को राजा कहता है, शिक्षा को तिरस्कार की दृष्टि से देखता है, पढ़े-लिखों, साहित्यिकों को घृणित समझता है, उनकी योग्यता को भी हेय गिनता है, उसे आश्चर्य होता है कि लोगों को समझ क्यों नहीं आता कि वह शिक्षा आदि से बहुत ऊंचे स्तर का व्यक्ति है।

(9) जलन, हाथ-पैर की जलन; तरेरें आना; भग की जन्न; जलन की अन्य औषधियां – इसके व्यापक-लक्षणों में जलन का मुख्य स्थान है। गन्धक के लिये प्रसिद्ध है कि नरक में गन्धक लगातार जला करती है-यह बात किसी ने यूं ही नहीं कही। रोगी को सिर के भीतर-बाहर, आंखों में, हर जगह जलन का अनुभव होता है, नाक से जलता हुआ पानी बहता है, चेहरे पर जलन होती है, जीभ में जलन के साथ दर्द होती है, मुंह में छाले जलते अनुभव होते हैं, गला पक जाता है परन्तु साथ ही गले में जलन होती है, पहले गले के दाहिनी तरफ़ फिर बाईं तरफ़, पेट में जलन, गुदा-प्रदेश में जलन के साथ भारीपन, जलते अंगारों के समान बवासीर के मस्से, बाहों में जलन, मूत्र प्रणाली में जलन, स्त्री के भग में जलन, पीठ की दोनों फलकास्थियों के बीच में जलन, हाथों में जलन, पैरों में जलन, हाथ-पैर की जलन ऐसी कि रोगी हाथों तथा पैरों को ओढ़न से बाहर रखने का प्रयत्न करता है-गर्म तरेरें, जैसे वृद्धावस्था में रजोरोध के समय स्त्रियों का आया करती है, सारे शरीर की त्वचा की जलन, फोडे-फुन्सियों के खुजलाने पर जलन – इस औषधि में इतनी सर्वव्यापी जलन पायी जाती है कि जलन को इसका मुख्य-लक्षण कहा जा सकता है। जब रोगी जलन की शिकायत करे तब सल्फर की तरफ ध्यान जाना अनिवार्य है। शरीर का प्रत्येक हिस्सा जलता है, शरीर में कहीं रक्त-संचय हो जाता है इसीलिये जलता है, त्वचा जलती है, सारी त्वचा नहीं जलती, कुछ हिस्सा यहां, कुछ वहां-भिन्न-भित्र स्थानों में जलन होती है, शरीर की ग्रन्थियां जलती हैं, पेट, फेफड़े, आंतें, पेशाब, मूत्राशय-किसी-न-किसी जगह जलन पायी जाती है।

(10) शरीर के स्राव (जुकाम, प्रदर, पेशाब, मल आदि) जलते तथा खराशदार होते हैं – रोगी के सब श्लैष्मिक-संस्थानों पर इसका प्रभाव है। जहां-जहां भी ‘श्लैष्मिक-झिल्ली’ (Mucus membrane) है, वहां-वहां से स्राव हो सकता है। जुकाम का पानी नाक से बह कर होठों को जहां-जहां छूता है वहां-वहां खराश पैदा करता है, जलन पैदा करता है, उन स्थानों को काटता-सा जाता है, यह स्राव होठों को जलाता जाता है – इतना तेज होता है – इसके बहने से जिस-जिस स्थान को यह छूता है वे लाल हो जाते हैं। प्रदर का स्राव जननांगों में जलन पैदा करता है। पतला दस्त गुदा में जलन करता है, सारा गुदा-प्रदेश लाल हो जाता है। स्त्रियों के रोग में अगर पेशाब का एक बून्द भी रह जाय, तो जननांगों में जलन होने लगती है, इस बूंद को कपड़े से पोछ देना काफी नहीं होता, इसे पानी से धो डालने पर ही यह जलन शान्त हाती है – इतना तेज, तेजाब की तरह तेज इसका असर होता है। बच्चों के गुदा-प्रदेश के दोनों तरफ के हिस्से मल की तेजी से लाल पड़ जाते हैं। संक्षेप में कहा जाय, तो कह सकते हैं कि इस औषधि में रोगी का हर किसी अंग का स्राव जहां-जहां से छूता हुआ गुजरता है वहां-वहां जलन, खराश, लाली पैदा कर देता है।

(11) स्रावों के खराशदार होने से स्राव लगने के कारण अंग लाल रहते हैं – जैसा ऊपर कहा गया है, इस औषधि का स्राव इतना तेज होता है कि जहां-जहां छूता है वहां-वहां अंग को छील देता है। यही कारण है कि जहां छीलता है वहां रुधिर का संचार हो जाता है, वह स्थान लाल हो जाता है। अंग का लाल होना इस औषधि का चरित्रगत-लक्षण है। भिन्न-भिन्न निकास के स्थान लाल रहते हैं। होंठ सिंदूर के-से लाल, जननांग का अग्रभाग लाल, भग लाल, गुदा लाल, आंख के कोने लाल, कान लाल – अंगों की लालिमा की देख कर सल्फर को स्मरण करना चाहिये।

(12) रोग के लक्षणों का रात को बढ़ना – इस औषधि में रोग के लक्षणों का रात को बढ़ना विशेष रूप से पाया जाता है। रात को सांस रुकने का दौर पड़ता है। सोते-सोते रोगी एकदम पूरा जाग उठता है। दोपहर की ऊंघाई आती है, शाम को सूर्य ढलने के बाद निंदासा हो जाता है, परन्तु सारी रात नींद नहीं आती। सिर-दर्द शाम को खाने के बाद शुरू होता है और ज्यों-ज्यों रात बढ़ती है सिर-दर्द भी बढ़ता जाता है, इस दर्द के कारण वह सो नहीं सकता। सब प्रकार के दर्द रात को हुआ करते या बढ़ा करते हैं, रात को प्यास सताती है। रोगी बिस्तर में लेटता है कि खुजली शुरू हो जाती है। रात को लक्षणों का प्रकट होना या बढ़ जाना इसका व्यापक-लक्षण है।

(13) मध्य-दिन, प्रति सप्ताह या प्रति दो सप्ताह रोग का बढ़ना – जैसे रात को रोग का बढ़ना सल्फर में पाया जाता है, वैसे ही मध्य-दिन, दोपहर को रोग का बढ़ना भी इमसें पाया जाता है। ठीक दोपहर को जाड़ा लगकर बुखार चढ़ जाता है, ज्वर आ रहा हो तो दोपहर को बढ़ जाता है, मानसिक-लक्षण दोपहर को बढ़ जाते हैं, सिर-दर्द दोपहर को अपने शिखर पर आ जाता है। कई शिकायतें हर सातवें, हर चौदहवें दिन नियमपूर्वक प्रकट होती हैं – यह भी सल्फर का लक्षण है। सिर-दर्द हर सातवें दिन हो, हर चौदहवें दिन हो-इसी प्रकार अन्य कोई रोग नियमपूर्वक हर सातवें या हर चौदहवें दिन प्रकट हो तो यह इस औषधि का लक्षण है।

(14) प्रात: काल उठते ही दस्त की हाजत और फिर दिन भर ठीक रहना – इस औषधि का अपना विशेष समय बंधा होता है। यह मध्य-रात्रि के बाद और सवेरे उठने के समय रोगी को परेशान करता है। प्राय: दस्त की हाजत उस समय होती है जब व्यति सोकर उठने की सोच रहा होता है। दस्त की हाजत इतनी तेज होती है कि वह बिस्तर से उठकर बाथरूम को भागता है। प्राय: दस्त पतला, पनीला होता है, ज्यादा भी नहीं होता, कभी-कभी बहुत थोड़ा ही होता है, वेग से भी नहीं निकलता कभी-कभी इसका रंग पीला होता है। प्राय: इस दस्त के आने के बाद उसे अपने दिन सवेरे तक कोई कष्ट नहीं होता। ऐसे अनेक व्यक्ति पाये जाते हैं जिन्हें सालों इस प्रकार सवेरे दस्त आने की हाजत होती है, वे इसे रोक नहीं सकते। कभी-कभी इस प्रकार के दस्तों के साथ रोगी के पेट में दर्द, ऐंठन, बेचैनी जलन आदि शिकायतें होती हैं। पाखाना जिस-जिस स्थान को छूता है वहाँ-वहाँ खराश होती है, जलन होती है, वह स्थान लाल हो जाता है।

(15) एक जगह देर तक खड़े न रह सकना-स्नायु-प्रधान होना – रोगी एक जगह देर तक खड़ा नहीं रह सकता, जब भी वह खड़ा होता है उसे बे-आरामी अनुभव होती है। बैठने के लिये कुर्सी दिख जाय, तो झट बैठ जाता है। सल्फर के रोगी को अगर कुछ देर खड़ा रहना पड़े, तो उसकी तबियत घबड़ा जाती है। खड़े रहने पर उसका मन डावांडोल हो जाता है, दिल घबराने लगता है, चक्कर आने लगता है, पेट में, आंतों में, पैर की नाड़ियों में भारीपन अनुभव होने लगता हे, स्त्रियों को पेडू में बोझ लगने लगता है। या तो व्यक्ति जगह ढूंढ कर बैठ जाता है या टहलने लगता है, खड़ा किसी हालत में नहीं रह सकता। चलने में उसे दिक्कत नहीं होती, परन्तु देर तक खड़ा रहने में उसे परेशानी हो जाती है।

स्नायु-प्रधान होना – इस औषधि का रोगी देर तक एक जगह पर खड़ा नहीं रह सकता। इसका मुख्य-कारण यह है कि वह ‘स्नायु-प्रधान’ (Nervous) होता है, उत्तेजित (Full of excitement) होता है। चिकित्सक नहीं समझता कि रोगी स्नायु-प्रधान है, परन्तु वास्तव में सल्फर का रोगी स्नायु प्रधान होता है, उत्तेजित होता है, जरा-से शोर-शराबे से चौंक उठता है, सोते हुए कोई आवाज हो जाय, तो चौंक कर ऐसे उठता है मानो तोप की आवाज सुनी हो।

(16) पीना अधिक, खाना कम – इस औषधि के संक्षिप्त सूत्रों का निर्माण करते हुये किसी लेखक ने लिखा है – “पीता अधिक खाता कम” है। रोगी कहता है कि उसे भूख लगी है, परन्तु जब खाने को बैठता है तब खाया नहीं जाता। बहुत साधारण-सा खाना खा सकता है, अत्यन्त हल्के पदार्थ। इस प्रकार के एक ही सूत्र के लक्षण पर बहुत भरोसा नहीं करना चाहिये।

(17) दोपहर 11 बजे पेट खाली मालूम पड़ना – अगर दिन के 24 घंटों में कोई समय ऐसा है जब सल्फर का व्यक्ति पेट में खालीपन का, भूख का-सा अनुभव करता है, तो वह दोपहर के 11 बजे का समय है। जिन लोगों को 12 बजे खाने की आदत है, वे एक घंटा पहले 11 बजे-पेट में खालीपन का-सा अनुभव करने लगते हैं मानो पेट अंदर को धंसा जाता है, बेचैन हो जाते हैं, ठहर नहीं सकते। अगर उनके खाने का समय 1 बजे है, तो 12 बजे उन्हें एक प्रकार की बेचैनी होने लगती है। खाने के नियत समय से एक घंटा पहले पेट की एक प्रकार की बेचैनी सल्फर का चरित्रगत-लक्षण है।

(18) कुत्ते की नींद सोना, बार-बार नींद टूटना या प्रात: 3 बजे तक ही सो सकना – इस औषधि का व्यक्ति कुत्ते की नींद सोता है; सोता है, झट जाग जाता है, फिर सो जाता है। नींद स्वप्नों से भरी रहती है। स्वप्न बड़े स्पष्ट होते हैं – सजीव। रात्रि के प्रथम प्रहर में उसे निद्रा आ घेरती है, प्राय: सवेरे 3 बजे तक सोता है, परन्तु 3 बजे के बाद नींद टूट जाती है या बे-आरामी की नींद आती है, या बिल्कुल नहीं आती। वह देर तक सोना चाहता है, दिन निकलने तक सोना चाहता है, सूरज की रोशनी न निकले, वह सोता रहे-यह चाहता है, और अगर 3 बजे के बाद उसे नींद आ जाय, तो गहरी नींद आती है, उठाये नहीं उठता, सवेरे देर तक सोते रहना चाहता है। यह समय ऐसा होता है जब अगर नींद आ जाय तो इस नींद में उसे आनन्द आता है, यह स्वप्न-रहित निद्रा होती हैं नक्स का रोगी भी 3 बजे तक ही सोता है।

(19) शक्ति तथा प्रकृति – प्रारंभ करने के लिय 12 शक्ति उपयुक्त है। उसके बाद चिकित्सक ऊपर-नीचे जा सकता है। पुराने रोगों में सल्फर 200 शक्ति उपयुक्त रहती है, फोड़े-फुन्सियों के लिये निम्न-शक्ति। यह ‘अनेक-कार्य-साधक’ औषधि है। इस विषय में डॉ० कैन्ट लिखते हैं कि मानव को जितने भी रोग हो सकते हैं वे सब इसमें पाये जाते हैं और चिकित्सक समझ सकता है कि उसे किसी अन्य औषधि की आवश्यकता ही नहीं है, परन्तु ऐसा समझना भूल है। सल्फर मुख्य तौर पर ‘गर्म’-प्रकृति के रोगी के लिये है, परन्तु इसका रोगी मध्य-तापमान पसन्द करता है। यह नहीं कहा जा सकता कि ‘शीत’-प्रकृति के रोगियों को सल्फर नहीं दी जानी चाहिये। शीत-प्रकृति के अनेक रोगियों के लिये भी यह उतनी ही लाभप्रद है जितनी ऊष्ण-प्रकृति के रोगियों के लिये।
सल्फर Q, सल्फर 30, सल्फर 200, सल्फर 1000

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