क्यूप्रम मेटैलिकम – Cuprum Metallicum In Hindi

क्यूप्रम मेटैलिकम – Cuprum Metallicum In Hindi

 

लक्षण तथा मुख्य-रोग लक्षणों में कमी
ऐंठन में अंगूठे को अंगुलियों से जोर से बन्द करना और इस प्रकार सारे शरीर में ‘अकड़न’ पड़ जाना खांसी में ठंडे पानी के घूंट से खांसी में फायदा
ऐंठन वाली हूपिंग-कफ जिसमे ठंडे पानी की घूंट से आराम पहुंचे
ऐंठन सहित कठिन-श्वास
वृद्धावस्था के विवाह में संभोग के समय ऐंठन
ऐंठन सहित मासिक-धर्म लक्षणों में वृद्धि
युवतियों में मासिक-धर्म के दिनों में ठंडे पानी से स्नान के कारण ऐंठन पड़ना ठंडी हवा से रोग में वृद्धि
मिर्गी दाने दब जाने से रोग होना
दाने या स्राव जाने से ऐंठन पैर का पसीना दब जाने से किसी रोग का होना
हैजे में ऐंठन होना निद्रानाश से रोग बढ़ना
मानसिक-श्रम या निद्रानाश से शारीरिक तथा मानसिक असमर्थता क्रोधादि मनोभावों से रोग होना

(1) ऐंठन में अंगूठे को अंगुलियों से जोर से बन्द करना और इस प्रकार शरीर में ‘अकड़न’ (spasm) पड़ जाना – क्यूप्रम मेटैलिकम मुख्य तौर पर ऐंठन-अकड़न, मिर्गी की औषधि है। इसका प्रभाव बहुत गहरा होता है। किसी भी रोग के साथ ऐंठन होने पर इस औषधि की तरफ ध्यान जाना उचित है। यह ऐंठन साधारण अंग-कंपन, थिरकन के रूप में हो सकती है, मांस-पेशियों के फड़कने के रूप में किसी एक मांस-पेशी के थिरकने से लेकर सारे शरीर की ऐंठन और अकड़न भी इसके क्षेत्र में है।

यह ऐंठन शुरू कहां से होती है? इसकी शुरूआत होती हैं ‘अंगुलियों से’। अंगुलियां अंगूठे को कस कर बांध लेती हैं, हाथ की मुट्ठी जोर से बंध जाती है। सबसे पहला प्रभाव अंगूठों पर पड़ता है। अंगूठे हथेली की तरफ मुड़ जाते हैं, और उन पर अंगुलियां जोर से अकड़ जाती है। हाथ की अंगुलियां और पैर के अंगूठों से ऐंठन शुरू होकर सारे शरीर में फैल जाती है, रोगी अत्यंत शक्तिहीन हो जाता है, उसके अंग फड़कने लगते हैं। ऐंठन में रोगी हाथ और पैर की अंगुलियों को अन्दर की ओर सिकोड़ लेता है। ऐंठन में इसकी तुलना सिकेल के साथ की जाती है। क्यूप्रम में अंगुलियां अन्दर की ओर और सिकेल में अंगुलियां अलग-अलग फैली रहती है।

(ऐंठन के रोग की मुख्य-मुख्य औषधियां)

(i) बेलाडोना – इसकी ऐंठन में चेहरा और आखें लाल हो जाती हैं, सिर गर्म हो जाता है, तेज बुखार होता है और कनपटियों में तपकन होती है।

(ii) ग्लोनॉयन – इसमें सिकेल की तरह अंगुलियां अलग-अलग फैल जाती हैं, सिर में खून जमा हो जाता है।

(iii) हायोसाइमस – इसमें ऐंठन पहले एक हाथ में होती है, फिर दूसरे हाथ में चली जाती है, इस प्रकार ऐंठन चलती रहती है। हाथ कांपता है, टेढ़ा पड़ जाता है। मुंह से झाग निकलती है।

(iv) इग्नेशिया – इसमें बच्चा माता-पिता, अध्यापक की डांट से डर कर ऐंठ जाता है। कभी-कभी बच्चों के दांत निकलते समय ऐंठन होती है। इनके लिये यह उपयोगी है।

(v) सिक्यूटा – इसकी ऐंठन में रोगी का सिर तथा गर्दन पीठ की तरफ धनुष की तरह ऐंठ जाते हैं।

(2) ऐंठनवाली हूपिंग-कफ जिसमें ठंडे पानी के घूंट से आराम पहुंचे – ‘कुत्ता-खांसी’ को हूपिंग-कफ कहते हैं। खांसते-खासंते बच्चा ऐंठ जाता है और उसका सांस रुक-सा जाता है। ऐंठनवाली इस खांसी का वर्णन करते हुए डॉ० कैन्ट लिखते हैं कि जिस बच्चे को यह खांसी होती है उसकी मां चिकित्सक को आकर कहती है कि खांसते-खांसते बच्चे का मुख नील पड़ जाता है, नाखूनों का रंग बदल जाता है, आंखें ऊपर को चढ़ जाती है, बच्चे का सांस रुक जाता है, और ऐसा लगता है कि अब इसका सांस लौट कर नहीं आयेगा, परन्तु सांस की क्रिया में एक जबर्दस्त खींच पड़ती है, छोटे-छोटे सांस लेकर बच्चा मरता-मरता जी उठता है। यह मूर्त रूप है ऐंठन वाली कुत्ता-खांसी का जिसमें यह दवा उपयुक्त है। आश्चर्य की बात यह है कि इस खांसी में ठंडे पानी का घूंट रोगी को आराम पहुंचाता है।

(3) ऐंठनसहित कठिन-श्वास – श्वास-नलिका में जब श्वास-कष्ट होता है, दम घुटता है, तब श्वास-नलिका की ऐंठन होती है, छाती में घड़घड़ाहट होती है। दम जितना घुटता जायगा उतना ही अंगुलियों से हाथ का अंगूठा जोर से भिंचता जायगा। इस प्रकार के कठिन-श्वास में जिसमें हाथों की ऐंठन मौजूद हो, क्यूप्रम लाभ करता है।

(4) वृद्धावस्था के विवाह में संभोग के समय ऐंठन – वृद्धावस्था में, या जो लोग समय से पूर्व बूढ़े हो जाते हैं, उन्हें रात में बिस्तर पर पड़ने पर अंगुलियों और पैर के तलुओं में ऐंठन होने लगती है। वृद्ध लोगों के एक अन्य रोग को भी क्यूप्रम दूर करता है। जब कोई देर तक शादी न करके वृद्धावस्था में शादी करता है, तब संभोग के समय उसे ऐंठन होने लगती है, पैर के तलवे और टांगें ऐंठने लगती हैं। ऐसे युवक जो कुकर्मों से वृद्ध-समान हो गये हैं, या शराब पीने तथा रात्रि-जागरण के कारण कमजोर हो गये हैं उन्हें भी ये ऐंठन पड़ने लगती है जिसे यह औषधि दूर कर देती है।

(5) ऐंठन सहित मासिक-धर्म – जिस युवतियों का मासिक-धर्म अंगुलियों में ऐंठन से शुरू होता है, और अंगुलियों से शुरू होकर यह ऐंठन सारे शरीर में फैल जाती है, उनके कष्टप्रद मासिक-धर्म को यह ठीक कर देता है। यहां पर भी इस औषधि का चरित्रगत-लक्षण-अंगुलियों में ऐंठन का शुरू होना है। जिस रोग में भी अंगुलियों से ऐंठन शुरू हो, उसे यह दवा देनी चाहिए।

(6) युवतियों में मासिक-धर्म के दिनों में ठंडे पानी से स्नान करने के कारण ऐंठन पड़ना – कई लड़कियों, यौवन के आगमन पर, मासिक-धर्म के दिनों में ठंडे पानी से स्नान कर लेती हैं। उनकी माता इन बातों के विषय में उन्हें जानकारी नहीं देती। इसका परिणाम यह होता है कि मासिक धर्म होने के समय स्नान से ठंड लगने के कारण रुधिर का प्रवाह रुक जाता है और ‘ऐंठन’ (Convulsions) पड़ने लगती है। इस प्रकार की ऐंठन या अकड़न क्यूप्रम का ही लक्षण है।

(7) मिर्गी (Epilepsy) – जो मिर्गी छाती के निचले भाग से या अंगुलियों की भींचन से प्रारंभ होकर सारे शरीर में या सब मांस-पेशियों में फैल जाय, वहां पर भी यही औषधि लाभप्रद है। यहां पर भी क्यूप्रम का चरित्रगत-लक्षण ही आधार में बैठा होता है।

(8) दाने या स्राव दब जाने से ऐंठन (क्यूप्रम, जिंकम और ब्रायोनिया में भी यह लक्षण है) – दाने दब जाने से डायरिया हो जाता है, कई चिकित्सक दानों पर ऐसा लेप कर देते हैं कि दाने आराम होने की जगह दब जाते हैं। अगर ऐसी हालत में डायरिया हो जाय, तो वह तो दानों के जहर को बाहर निकालने का प्रकृति का उपाय है। अगर दाने दबकर डायरिया हो जाय, और फिर उस डायरिया को भी दबा दिया जाय, तब ऐंठन पड़ जाती है। यह क्यूप्रम का क्षेत्र है। दानों की तरह प्रदर आदि स्रावों को भी तेज दवा से कई चिकित्सक रोक देते हैं। तब भी ऐंठन का दौरा पड़ जाता है। शरीर से जो स्राव निकलते हैं उन्हें ठीक करने के स्थान पर तेज दवा से दबा देने से अनेक भीषण-लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। प्राय: ऐंठन पड़ने लगती है। ऐसे लक्षणों के होने पर इस दवा को स्मरण करना चाहिये। जब दाने दब जाते हैं तब इस से दाने बाहर निकल आते हैं। इस शिकायत में जिंकम और ब्रायोनिया भी उपयोगी हैं।

(9) मानसिक-श्रम या निद्रानाश से शारीरिक तथा मानसिक असमर्थता – डॉ० फैरिंगटन का कथन है कि अगर मानसिक-श्रम से, या बहुत अधिक जागने से किसी को मानसिक या शारीरिक रोग उत्पन्न हो जाय, रोगी अपने को बेहद कमजोर अनुभव करने लगे, तो कौक्युलस तथा नक्स वोमिका की तरह क्यूप्रम भी लाभदायक है।

(10) शक्ति तथा प्रकृति – 6, 30, 200 (औषधि ‘सर्द’-प्रकृतिक लिये है)

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