ड्रॉसेरा – Drosera Homeopathic Medicine

ड्रॉसेरा – Drosera Homeopathic Medicine

(1) कुत्ता-खांसी (Whooping cough) – हनीमैन का कथन था कि कुत्ता-खांसी की यह मुख्य दवा है। रोगी भौं-भौं करके खांसता है, तारदार श्लेष्मा निकलता है। हनीमैन का कथन था कि कुत्ता-खांसी में Drosera 30 शक्ति की एक मात्रा देने से सात-आठ दिन में रोग चला जाता है। उनका यह भी कहना था कि इस औषधि की दूसरी मात्रा नहीं देनी चाहिये क्योंकि इतना ही नहीं कि दूसरी मात्रा पहली मात्रा के असर को दूर कर देती है, अपितु रोगी को हानि भी पहुंचती है। इस खांसी का विशेष प्रभाव श्वास-नलिका के ऊपरी भाग (Larynx) पर होता है, वहीं सरसराहट होती है, ज्यों रोगी सोने के लिये बिस्तर पर सिर रखता है कि खांसी शुरू हो जाती है, ठंडी वस्तुओं के खाने पीने से यह खांसी बढ़ जाती है।

(2) व्याख्याताओं का स्वर भग (Sore-throat) – उपदेशकों, व्याख्याताओं, गायकों का गला बोलते-बोलते दुखने लगता है, गले में खराश होने लगती है, गला बैठ जाता है, आवाज फट जाती है. बोलने में बहुत जोर लगाना पड़ता है। ऐसी हालत में यह Drosera लाभप्रद है।


(3) क्षय रोग (टी०बी०) – डॉ० टायलर का कथन है कि इस बात को तो सब जानते हैं कि इस औषधि का कुत्ता-खांसी में प्रयोग किया जाता है, परन्तु क्षय-रोग के लिये भी यह उत्तम औषधि है और इसकी तरफ चिकित्सकों का ध्यान कम गया है। श्वास-नलिका की खुरखुराने वाली खांसी क्षय-रोग की सबसे बड़ी पेरशानी होती है। डॉ० टायलर का कथन है कि जब उन्होंने अनुभव से देखा कि हड्डी, जोड़ और ग्लैंड के क्षय-रोग की चिकित्सा में यह औषधि कितनी सफल है, तब उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। इस उद्देश्य से जब उन्होंने हनीमैन के ‘मैटीरिया-मैडिका-प्यूरा’ को पढ़ा, तब उनकी आंखें खुल गई क्योंकि उसमें उन्होंने इस औषधि के विषय में लिखते हुए जोड़ों, कन्धे की हड्डी, गिट्टे की हड्डी तथा अन्य अस्थियों पर इसके प्रभाव को मोटे अक्षरों में लिखा है। जिन रोगियों के जीवन इतिहास में वंशानुगत क्षय-रोग के लक्षण मौजूद हों, उन्हें Drosera रोग-मुक्त कर देता है। इसके अतिरिक्त क्षय-रोग के अन्य लक्षण – पुराना लगातार रहने वाला नजला, गले में लगातार खराश का बने रहना, फेफडों तथा श्वास नलिका का कफ से भरे रहना – ये जहां मौजूद हों, वहां यह औषधि विशेष प्रभाव दिखलाती है।

(4) दीर्घ-कालीन निद्रा-नाश तथा नींद से जागने के बाद भारी पसीना – ये दोनों भी इस औषधि के क्षय-रोग या अन्य किसी रोग में पाये गये लक्षण हैं।

(5) शक्ति – 30, 200 (कुत्ता-खांसी में मात्रा दोहरानी नहीं चाहिये)



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