चिरायता [ Gentiana Chirata In Hindi ]

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हिन्दी नाम – चिरायता है। यह एक ज्वरघ्न औषधि है। पुराने जीर्ण-ज्वर में दीर्धकाल से व्यवहृत होता आ रहा है। चिरायता – मृदु, रेचक कृमि व ज्वर नाशक औषधि है। वैद्यगण पुराने ज्वर में जिस सुदर्शन चूर्ण का व्यवहार करते हैं, वह इस चिरायता से ही बनती है। जहाँ पर ज्वर में क्विनाइन के प्रयोग से भी ज्वर बंद नहीं होता – वहां इससे बहुत फायदा होता है, किन्तु क्विनाइन की तरह इससे कोई कुफल उत्पन्न नहीं होता। यह औषधि डॉ कालीकुमार भट्टाचार्य महाशय द्वारा परीक्षित है।

चरित्रगत लक्षण :-

  1. सारे सिर में दर्द, ललाट में खिंचाव मालूम होना, मस्तिष्क में शीत
  2. आँखों में बहुत जलन, अक्षिगोलक की शिरायें लाल रंग की
  3. कान में गुन-गुन शब्द, कान का ऊपरी अंश लाल और वहां पर मानो ताप निकलता हो। नाक सूखी, अचानक छींक आकर आँख, नाक से नया श्लेष्मा निकलता है।
  4. सुबह मुख का स्वाद ख़राब व मुख में बदबू
  5. गले में दर्द, गरम पानी से आराम मालूम होना
  6. ज्वर के समय शीघ्रता से बार-बार साँस चलना, वायुनली में सूखा श्लेष्मा, जोर से सांस लेने पर दर्द मालूम होना
  7. पेट में वायु संचय होना, दिन भर में 3-4 बार पतला पाखाना होना, लिवर व प्लीहा में दर्द, लिवर व प्लीहा बढे हुए।
  8. किडनी में ( दाहिनी ओर में ) दर्द।
  9. जननेन्द्रिय शिथिल, पेशाब में थोड़ी जलन, पेशाब घने लाल रंग का, शुक्रक्षरण।
  10. पैर में चिबाने की तरह दर्द, हड्डी के अंदर मज्जा में जैसे बिजली चमकती हो, दबाने पर आराम मालूम होना।
  11. ज्वर – शीत का बहुत देर तक स्थायी होना, प्यास बहुत कम, 1 घण्टा तक गर्मी लगकर पसीने वाली दशा आना, पसीना छाती, बगल और उरु में थोड़ा, उष्णावस्था में थोड़ा प्यास। शीतावस्था – कुछ देर तक रहकर बाद में मिचली आना व पित्त मिला श्लेष्मा का वमन, ज्वर आने का समय ठीक नहीं, ज्वर प्रबल होने पर दोपहर के पहले आता है, ज्वर धीमी प्रकृति का होने पर 2 बजे के बाद व 4 बजे के अंदर आता है, कभी रात के अन्तिम भाग में ज्वर सा भाव, ज्वर के साथ आँखों में जलन, वह ज्वर न छूटने तक रहती है। नाना प्रकार के पेटेण्ट क्विनाइन के सेवन करने पर भी ज्वर नहीं छूटता।

चिरायता Q की 10 बून्द की मात्रा में ज्वर रहने के समय 1-2 घंटे के अंतर से 3-4 बार के प्रयोग करने से ही ज्वर का प्रकोप घट जाता है।

इससे उत्कट प्रकृति का मलेरिया भी अच्छा होता है। ज्वर 104-105 डिग्री तक चढ़ता है, उसके साथ प्रलाप बकना, हाथ-पैर तथा मुंह, आँखों में भयानक जलन व छाती मानो फटी जाती हो इस प्रकार की यन्त्रणा इत्यादि रहते हैं। इस प्रकार की दशा में 30-40 बून्द तक की मात्रा में दिनभर में 3-4 बार प्रयोग से फायदा होता है।

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