कैपसिकम – लाल मिर्च, ( Capsicum ) होम्योपैथिक दवा

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व्यापक-लक्षण तथा मुख्य-रोग प्रकृति लक्षणों में कमी
मोटा, थुलथुला शरीर और नाक-गाल आदि की नोक पर लालिमा गर्मी से रोग में कमी
घर जाने की उत्कट अभिलाषा दिन के समय रोग में कमी
पुराने जुकाम में किसी भी औषधि का काम न कर सकना लक्षणों में वृद्धि
मिर्च की तरह जलन ठंडी, खुली हवा से रोग बढ़ना
यह सल्फर आदि की तरह धातुगत (Constitutional) दवा है शरीर का कपड़ा न होने से वृद्धि
आत्मघात का निरन्तर विचार खाने और पीने से रोग बढ़ना
ज्वर में दोनों कन्धों के बीच ठंड शुरू होकर जिस्म में फैलती है आधी रात के बाद रोग में वृद्धि

(1) मोटा, थुलथुला शरीर और नाक-गाल आदि की नोक पर लालिमा – जिन पदार्थों को हम स्वाद के लिये निरन्तर लिया करते हैं, कई पीढ़ियों बाद वे हमारे शरीर में ऐसे लक्षण उत्पन्न कर देंगे कि उन लक्षणों को दूर करने के लिये इन्हीं पदार्थों की शक्तिकृत मात्राएँ औषधि का काम करेंगी क्योंकि इन पदार्थों से उत्पन्न होने वाले रोगों के लक्षण शरीर में रोग के रूप में प्रकट होने वाले लक्षणों के समान होंगे। इन्हीं पदार्थों में एक पदार्थ लाल मिर्च-कैपसिकम है। इसका रोगी कैलकेरिया कार्ब की तरह मोटा, थुलथुला होता है। लाल मिर्च का रंग लाल होता है, ध्यान से देखने पर इस रोगी की भी नाक की नोक, गाल के उभार लाल होते हैं और चेहरे पर रुधिर की बारीक रक्त-वाहिनियां (Capillaries) फैली पड़ी दीखा करती हैं। इस रोगी का शरीर सुस्ती से भरा होता है, कोइ दवा काम नहीं करनी, सारे जिस्म का कार्य धीमा चलता है। इस प्रकार के शरीर (Constitution) में किसी भी रोग पर कैपसिकम दिया जा सकता है। यह जीवनी-शक्ति को क्रियाशील बना देगा और सुस्त पड़ रही शारीरिक-शक्तियां जाग उठेगी।

(2) घर जाने की उत्कट अभिलाषा – बच्चों को जब घर से बाहर किसी बोडिंग हाउस में दाखिल कर दिया जाता है तब उनका जी नहीं लगता, वे निरन्तर रोया करते हैं, खेलने के स्थान में एक कोने में जा बैठते और मां-बाप को याद किया करते हैं। इस प्रकार के बच्चों को कैपसिकम की एक-दो मात्रा देने के बाद वे सब कुछ भूल जाते हैं और अन्य बच्चों के साथ खेलने लगते हैं।

(3) पुराने जुकाम में किसी भी औषधि का काम न कर सकना – कैपसिकम की शारीरिक-रचना में धीमापन अन्तर्निहित है। ऐसे रोगी मिलते हैं जिन्हें पुराना जुकाम सताता रहता है, किसी दवा से लाभ नहीं होता, अच्छी-से-अच्छी दवा चुन कर दी जाय, परन्तु जीवनी-शक्ति प्रतिक्रिया करती ही नहीं। इतने में चिकित्सक की रोगी के चेहरे पर नजर पड़ती है, वह देखता हे कि रोगी के नाक की नोक लाल है, ठंडी है, चेहरे पर पता चलता है कि पाठशाला में कुछ पढ़-लिख नहीं सकता, अगर शारीरिक या मानसिक श्रम करता है, तो पसीना छूटने लगता है, सर्दी बर्दाश्त नहीं कर सकता, सर्दी में मानो जम जाता है। इन लक्षणों को देखकर उसकी जीवनी-शक्ति को चेतन बनाने के लिये कैपसिकम देने पर या तो वह ठीक ही हो सकता है, या कुछ देर बाद साइलीशिया या कैलि बाईक्रोम आदि औषधि, जो पहले काम नहीं करती थीं, अब देने पर काम करने लगती हैं और रोगी ठीक हो जाता है। शरीरगत जो लक्षण हमने अभी कहे हैं, वैसे लक्षणों के होने पर, अगर जीवनी-शक्ति सुस्त पड़ी हो, तो कैपसिकम जीवनी-शक्ति को चुस्त कर देता है, और क्योंकि रोग से लड़कर उसे औषधि के सहारे परे फेंक देना जीवनी-शक्ति का ही काम है इसलिये ऐसे रोगियों की जीवनी-शक्ति को उभारना ही चिकित्सक का काम होता है जिसे कैपसिकम बखूबी करता है।

(4) मिर्च की तरह जलन – मिर्च में लाली और जलन ये दो बातें मुख्य हैं। कैपसिकम में जलन ये दो बातें मुख्य हैं। लाली के विषय में हमने अभी लिखा ही है। कैपसिकम में जलन भी है। श्लैष्मिक-झिल्ली में जहां भी जलन का लक्षण पाया जाय, वहां इस औषधि की तरफ ध्यान जाना जरूरी है। जलन ऐसी होती है जैसे मिर्च लग रही हो, इस प्रकार की जलन कहीं भी हो सकती है – जीभ, मुँह के भीतर, पेट आतें, मूत्रद्वार, मूलद्वार, छाती, फफड़े, त्वचा, बवासीर-कहीं भी नंगी श्लैष्मिक-झिल्ली पर मिर्ची के लगने जैसी जलन हो, तो इस औषधि का प्रयोग करना चाहिये।

(5) यह सल्फर आदि की तरह धातुगत (constitutional) दवा है – कई रोगी ऐसे आते हैं जिन्हें सर्दी लग जाती है, परन्तु उनका रोग ‘नवीन-रोगों’ (Acute) पर असर करने वाली दवाओं से शान्त हो जाता है। एकोनाइट, ब्रायोनिया, हिपर आदि औषधियों ठंड से उत्पन्न होने वाले उस रोग से निबट लेती हैं। परन्तु कभी-कभी यह नवीन-रोग ‘पुराना’ (chronic) हो जाता है जुकाम एकोनाइट आदि से ठीक होकर बार-बार लौट आता है। इसका अर्थ यह है कि जीवनी-शक्ति अपने पूर्ण-वेग से जगी नहीं है, उसकी तरफ से प्रतिक्रिया धीमी है, मध्यम है, ऐसी हालत में सलफर, फॉसफोरस, लाइकोपोडियम आदि गहन क्रिया करने वाली औषधियों का प्रयोग करना पड़ता है। ठंड से होने वाले रोगों का हठधर्मी होकर बैठ जाना, रोगी को न छोड़ना, गठिया आदि पुराने रोगों को जड़-मूल से नष्ट करने के लिये ‘धातुगत-औषधि’ की आवश्यकता होती है। इसी श्रेणी में कैपसिकम की गणना है।

(6) आत्मघात का निरन्तर विचार – आत्मघात संबंधी लक्षणों पर विचार करते हुए चिकित्सक को दो बातों में भेद करना सीखना होगा। एक तो है : आत्मघात-सम्बन्धी विचार, दूसरा है आत्मघात-संबंधी-आवेग। ‘विचार’ (Thought) पर मनुष्य नियन्त्रण करता रहता है; ‘आवेग’ (Impulse) पर काबू पाना कठिन होता है। आत्मघात-संबंधी-विचार में व्यक्ति आत्मघात की बात सोचा करता है परन्तु आत्मघात करना नहीं चाहता, वे विचार इस पर हावी होने का प्रयत्न करते हैं परन्तु वह उन विचारों से लड़ा करता है, उन्हें परे फेंकने का प्रयत्न किया करता है, वे ‘विचार’ होते हैं, ‘आवेग’ नहीं। कैपसिकम में आत्मघात का ‘विचार’ आता है, ऑरम मैटेलिकम में आत्मघात का ‘आवेग’ आता है।

(7) ज्वर में दोनों कन्धों के बीच ठंड शुरू होकर जिस्म में फैलती है – कैपसिकम के ज्वर का विशिष्ट-लक्षण यह है कि इसमें दोनों कन्धों के बीच में ठंड लगनी शुरू होती है, और वहां से जिस्म में फैल जाती है। ज्वर में जाड़ा चढ़ने से पहले प्यास लगती है परन्तु पानी पीते ही शरीर में कंपकपी फैल जाती है।

कैपसिकम औषधि के अन्य लक्षण

(i) खांसी पर दूरवर्ती स्थानों में दर्द – इसका एक अद्भुत-लक्षण यह है कि खांसने पर टांगों में, घुटने में, मूत्राशय में या अन्य किसी दूरवर्ती अंग में दर्द का अनुभव होता है।

(ii) मुँह में छाले पड़ जाना – मुँह में ऐसे छाले पड़ जाना जो भीतर जलन पैदा करते हों – इसमें पाया जाता है।

(iii) कानों के पीछे की शोथ – कान के पीछे की हड्डी का प्रदाह भी इसमें है।

(iv) सिर-दर्द – मानो खोपड़ी फूट पडेगी, जरा-सी हरकत से भयंकर सिर-दर्द। इसलिये रोगी चलता-फिरता नहीं, खांसी को भी रोकता है क्योंकि खांसने से भी सिर-दर्द बढ़ता है, सिर को पकड़ कर बैठे रहता है ताकि वह हिल न पीये।

शक्ति तथा प्रकृति – 6, 30, 200 (औषधि ‘सर्द’-(Chilly-प्रकृतिक लिये है।)

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