खाने योग्य तेल

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भोजन तथा अन्य व्यंजनों को बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के तेल उपयोग में लाए जाते हैं। तेल में तले हुए पदार्थ बहुत स्वादिष्ट तथा स्वास्थ्यवर्धक होते हैं। तेल में लोग अधिकांशत: साग, सब्जियां, पूरी, कचौड़ी आदि बनाते हैं। इसके अलावा ये तेल मालिश तथा अन्य कामों में भी प्रयुक्त होते हैं। ऐसे तेलों में सरसों का तेल, सूरजमुखी का तेल तथा तिल का तेल शामिल है। इनमें वसा, प्रोटीन, विटामिन ‘बी’ कॉम्प्लेक्स तथा खनिज आदि पाए जाते हैं। इस पोस्ट में खाने योग्य तेलों की ही चर्चा की जा रही है।

सरसों का तेल

सरसों और सरसों का तेल – दोनों ही स्वास्थ्यवर्धक हैं। सरसों का पौधा एक मीटर लम्बाई तक बढ़ता है। छोटे-छोटे पौधों को सरसों के साग के रूप में खाया जाता है। सरसों के पौधे पर फली लगती है। इन फलियों से सरसों के दाने निकलते हैं, जिनका रंग भूरा होता है। सरसों की एक दूसरी किस्म भी होती है, जिसे ‘राई’ कहते हैं। यह अचारों में डाली जाती है।

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सरसों के दानों का तेल निकाला जाता है। सरसों का तेल प्राचीनकाल से ही कई प्रकार की औषधियों और साबुन-निर्माण में प्रयोग होता आ रहा है। लोग इस तेल की मालिश शरीर पर भी करते हैं। यह त्वचा को मुलायम और रोगमुक्त रखता है। यह भूख बढ़ाता है तथा सुपाच्य होता है। सरसों का तेल विभिन्न खाद्य पदार्थों को तलने में प्रयोग किया जाता है। इस तेल में तले हुए खाद्य पदार्थ बहुत स्वादिष्ट होते हैं। साग, सब्जी, पूरी, कचौड़ी, पकौड़े आदि सरसों के तेल में तले जाते हैं। शरीर पर सरसों के तेल की मालिश करने से मांसपेशियों का दर्द समाप्त हो जाता है। सरसों के बीजों की हल्की चाय पीने से दमा तथा खांसी के रोगी को आराम पहुंचता है। दूषित या संक्रमित भोजन करने के कारण विष का प्रभाव होने पर एक चम्मच सरसों के बीज पानी के साथ खाने से उल्टी हो जाती है तथा विष का प्रभाव कम हो जाता है। सरसों के तेल में नीबू मिलाकर लगाने से सिर की जुएं तथा लीखें मर जाती हैं। होंठों पर सरसों का तेल लगाने से होंठ नहीं फटते।

स्तनों पर सरसों के तेल की मालिश नित्य करने से स्तन सुडौल एवं पुष्ट हो जाते हैं। सरसों के तेल में जरा-सा कपूर मिलाकर शरीर की मालिश करने पर शरीर का दर्द ठीक हो जाता है। आग से जले हुए स्थान पर सरसों का तेल लगाने से छाले या फफोले नहीं पड़ते। सरसों के तेल में सेंधा नमक मिलाकर लगाने से सर्दियों में होने वाली उंगलियों की सूजन दूर हो जाती है। सरसों के तेल की मालिश नित्य पेट पर करने से कब्ज नहीं होता। इसके अलावा सरसों के तेल का प्रयोग दांत दर्द, बिवाई फटने, खांसी-जुकाम, श्वास रोग तथा सिर दर्द में भी किया जाता है।

सूरजमुखी का तेल

सूरजमुखी के बीज खाए भी जाते हैं। इसके बीजों से तेल निकाला जाता है, जिसे खाने वाले तेलों की श्रेणी में रखा गया है। इसके द्वारा भी सब्जी, परांठे, पूरी, कचौड़ी आदि बनाए जाते हैं। सूरजमुखी की उत्पत्ति प्रारंभ में उत्तरी अमेरिका में हुई। यहीं से यह यूरोप, रूस आदि देशों में फैल गया। आज विश्व के लगभग सभी देशों में सूरजमुखी की खेती होती है। पोषकमान के हिसाब से सूरजमुखी के बीजों में प्रोटीन 24 प्रतिशत तथा फॉस्फोरस और आयरन मध्यम मात्रा में होते हैं। यही कारण है कि क्रांति-पूर्व रूसी सैनिकों को आपातकालीन भोजन के रूप में सूरजमुखी के बीज खाने को दिए जाते थे।

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सूरजमुखी के बीजों और तेल का काफी महत्व है। सूरजमुखी के तेल का उपयोग अनेक रोगों में किया जाता है। सूरजमुखी के तेल के सेवन से रक्तवाहिनियों में कोलेस्ट्रॉल का जमाव नहीं होता। इसलिए इसका उपयोग हृदय रोगियों के लिए बहुत लाभकारी है। इसे मक्खन के साथ मिलाकर भी प्रयोग किया जा सकता है। सूरजमुखी थाइमिन और नाइसिन का अच्छा स्रोत है, अत: इसका उपयोग मस्तिष्क और तंत्रिकाओं को बहुत लाभ पहुंचाता है। सूरजमुखी का आटा आयरन तत्व का जाना-माना स्रोत है। यह शरीर में आयरन की आपूर्ति कर रक्ताल्पता रोग दूर करता है। यह श्वास विकारों में भी लाभदायक है।

तिल का तेल

तिल की फसल सारे एशिया में प्राचीनकाल से ही होती आ रही है। तिल एक प्रकार के झाड़ीनुमा पौधे की फलियों से बीज के रूप में प्राप्त किया जाता है। तिल का पौधा लगभग एक मीटर ऊंचा होता है। इस पर फली आती है। फिर इसकी फलियों को सुखाकर तिल निकाल लेते हैं। तिल के तेल से वस्तुओं को तला जाता है। तिल का छिलका उतारकर इसका सेवन भी किया जाता है। तिल में प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन और विटामिन ‘बी’ कॉम्प्लेक्स पाया जाता है।

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तिल की तीन किस्में होती हैं – काला, सफेद और लाल। काले तिलों से अच्छे किस्म का तेल निकलता है। सफेद तिल में कैल्शियम की अधिक मात्रा होती है। ये शरीर में कैल्शियम की कमी पूरी करते हैं। लाल तिलों में आयरन अधिक होता है। यह त्वचा को मुलायम और पोषक बनाने का काम करता है।

तिल अनेक प्रकार से उपयोगी है। तिल का इस्तेमाल गजक और रेवड़ी बनाने में किया जाता है। तिलों को भूनकर चीनी की चाशनी में मिलाकर लड्डू बनाए जाते हैं। भुने हुए तिल के साथ गुड़ को कूटकर तिलकुट भी बनते हैं। तिल से मक्खन भी निकाला जाता है, जिसे ‘ताहिनी’ कहते हैं। ताहिनी को शहद के साथ मिलाकर डबल रोटी पर लगाया जा सकता है। लहसुन तथा नीबू के साथ इसे सलाद पर डालते हैं। यह सलाद मध्य-पूर्व देशों में बहुत लोकप्रिय है। ताहिनी में पानी मिश्रित करके तिल का दूध भी तैयार होता है।

तिल का सेवन अनेक रोगों में लाभदायक है। प्रात:काल मुट्ठी भर तिल चबाकर खाने से दांत मजबूत तथा चमकीले हो जाते हैं। यदि बच्चा रात को बिस्तर पर मूत्र करता हो, तो उसे प्रात:काल नित्य एक मुट्ठी तिल खिलाना चाहिए। तिल को मक्खन में कूटकर खाने से खूनी बवासीर में फायदा होता है। तिल को पीस इसकी पुल्टिस बनाकर घाव या जले हुए स्थान पर लगाने से काफी लाभ होता है। तिल के तेल में चूना मिलाकर लगाने से भी घाव जल्दी भर जाता है। खून की कमी दूर करने के लिए तिलों का सेवन करना हितकर होता है।

दो चम्मच तिल को हल्की आंच पर भून-पीसकर गाय का एक चम्मच घी मिलाकर बकरी के दूध के साथ सेवन करने से दस्त और पेचिश में लाभ होता है। गर्भाधान के शुरू में एक बड़े चम्मच तिलों का चूर्ण बनाकर गुड़ के साथ दिन में दो बार खाने से गर्भपात हो जाता है। थोड़े से तिल में थोड़ा-सा एरण्ड का तेल, जरा-सा नमक और शहद मिलाकर लेने से दमा तथा अन्य श्वास विकारों में बहुत लाभ होता है। मासिकधर्म ठीक से न होने पर तिल का सेवन करना हितकर होता है। तिल और शहद चटाने से बच्चों को होने वाले खूनी दस्त बन्द हो जाते हैं। तिल, जौ और शक्कर के चूर्ण को शहद में मिलाकर खिलाने से गर्भवती तथा प्रसूता स्त्रियों की शारीरिक कमजोरी दूर होती है।

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