गर्दन तोड़ बुखार का एलोपैथिक चिकित्सा

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इस ज्वर को डॉक्टरी भाषा में सेरीब्रो स्पाईनल फीवर (Cerebro-Spinal Fever) अथवा गशी वाला ज्वर भी कहा जाता है। यह तीव्र ज्वर महामारी के रूप में एक प्रकार के कीटाणुओं से उत्पन्न हो जाता है। रोगी के नाक और गले के वाष्प द्वारा कीटाणु स्वस्थ मनुष्य के शरीर में चले जाते हैं। यह रोग छोटे बच्चों से 45 वर्ष की आयु तक के लोगों को होता है।

इस ज्वर के प्रारम्भ में माथे में तीव्र दर्द होने लग जाता है, गर्दन अकड़ जाती है, रोगी टाँगे सीधी नहीं कर सकता है ! एक टाँग सिकुड़ने पर दूसरी टाँग भी खिच जाती है । शरीर और विशेषकर शरीर के निचले धड़ व भागों पर कालापन लिये धब्बे निकल आते हैं, बाद में रोगी बेहोश हो जाता है । यह रोग बसन्त ऋतु में अधिक होता है। यह ज्वर प्राय: 5 वर्ष और इससे कम आयु के बच्चों को हुआ करता है। गर्दन की पिछली ओर की माँसपेशियाँ अकड़ जाती हैं, सिर आगे झुकाने पर गर्दन में दर्द और कष्ट होता है ।

गर्दन तोड़ ज्वर नाशक पेटेंट औषधियाँ

• सल्फाडायजीन (मे एण्ड बेकर कंपनी), सायनास्टेट (राउसेल), सेप्ट्रान (वरोज वेल्कम) आदि । एक गिलास सोडा-बाई-कार्ब युक्त जल से रोग व आयु के अनुसार मात्रा में सेवन करायें ।

पेनिसिलिन – रोग बढ़ जाने और खाने की दवाओं से लाभ न होने पर वयस्क रोगी को 1 लाख यूनिट का इन्जेक्शन प्रत्येक 4 घण्टे बाद लगायें अथवा रोशिलीन (रैनबैक्सी क.) आवश्यकतानुसार 250 से 500 मि.ग्रा. के वायल में वाटर फॉर इन्जेक्शन पर्याप्त मात्रा में भली-भाँति घोलकर प्रत्येक 12 से 14 घण्टे बाद गहरे माँस में लगायें। इस औषधि के मुख से प्रयोग हेतु कैप्सूल, सीरप तथा पेडियाट्रिक ड्राप्स भी आते हैं।

मात्रा – आवश्यकतानुसार 50 से 200 मि.ग्रा. प्रति कि.ग्रा. शारीरिक भार के अनुपात से प्रतिदिन 4 बराबर मात्राओं में बाँटकर प्रयोग करायें ।

नोट – पेनिसिलीन के एलर्जिक रोगियों में इसका प्रयोग न करें।

• अवस्था चिन्ताजनक हो जाने पर सेपोरन (ग्लैक्सो कम्पनी) बच्चो को 15 से 30 मि.ग्रा. प्रति कि.ग्रा. शारीरिक भार के अनुपात से प्रतिदिन कई मात्राओं में विभाजित कर तथा वयस्कों को 500 मि.ग्रा. से 1 ग्राम का माँस में अथवा शिरा में इन्जेक्शन लगायें।

नोट – इस औषधि के मूलद्रव्य के एलर्जिक रोगियों में इसका प्रयोग न करें।

• ई-मायुसिन (निर्माता : थेमिस) – वयस्कों को प्रारम्भ में 250 से 500 मि.ग्राम और इसके बाद 250 मि.ग्रा. प्रत्येक 6 घण्टे बाद दें । बच्चों को 100 से 200 मि.ग्रा. प्रारम्भ में और बाद में 100 मि.ग्रा. प्रत्येक 6 घण्टे पर फलों के रस के साथ दें। पीने के लिये गेन्यूल्स रूप में ड्राई सीरप भी आता है, जिसे जल में घोलकर प्रयोग किया जाता है ।

नोट – गर्भावस्था में तथा इरीथ्रोमायसिन के एलर्जिक रोगियों में इसका प्रयोग न करें । रोगी को दूध, जौ का पानी ही दें । ठोस भोजन बिल्कुल न दें।

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