प्लम्बम मेटैलिकम – Plumbum Metallicum

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प्लम्बम मेटैलिकम का होम्योपैथिक उपयोग

( Plumbum Metallicum Homeopathic Medicine In Hindi )

जो लोग पेन्टिंग का या छापेखानों में कम्पोजिंग का काम करते हैं, उन्हें दिन-रात सीसे के संपर्क में आना पड़ता है। पेन्ट में सीसा होता है, और टाइप तो सीसे का ही होता है। नये पेन्ट हुए मकान में सोने से अनेक व्यक्तियों को पेट-दर्द होने लगता है जिसे ‘सीसे का दर्द’ कहा जा सकता है। कम्पोजीटरों को इसी प्रकार का पेट-दर्द तथा अंगों का पक्षाघात पाया जाता है। नये पेंट हुए मकान में पेंट का क्या सूक्ष्म तत्व है जो मनुष्य को रुग्ण कर देता है, या सीसे के टाइप में क्या सूक्ष्म-तत्व है जो कम्पोजीटरों को पक्षाघात की तरफ ले जाता है? इसका उत्तर सिवाय इसके क्या हो सकता है कि सीसे के सूक्ष्म-अणु जो माइक्रोस्कोप से भी नहीं देखे जा सकते, व्यक्ति की जीवनी-शक्ति पर आक्रमण करते हैं, और पेट-दर्द या पक्षाघात की-सी अवस्था उत्पन्न कर देते हैं। होम्योपैथी की दृष्टि से वे सीसे की ‘परीक्षा सिद्धि’ (Proving) के शिकार हो रहे होते है। किसी रोग में इस प्रकार के लक्षणों के उत्पन्न हो जाने पर प्लम्बम लाभदायक सिद्ध होता है।

(1) पेट-दर्द के साथ रोगी अनुभव करता है कि उसके पेट की पेशी को किसी ने पीछे पीठ की ओर खींच रखा है – पेट दर्द ऐसा होता है मानो पेट को कोई पीछे से रीढ़ की हड्डी की तरफ रस्सी से खींच रहा है। यह खिंचाव या तो सिर्फ अनुभूति के रूप में होता है, या तो पेट सचमुच पीछे की ओर पिचक जाता है और पीठ के साथ लग जाता है। दर्द से रोगी बेचैन हो जाता है। दर्द अगर नीचे की तरफ फैलता है तो पांवों में ऐंठन होती है, ऊपर की ओर फैलता है तो बेहोशी आ जाती है। रोगी अपने शरीर को लम्बा फैलाने की कोशिश करता है, परन्तु किसी करवट उसे चैन नहीं मिलता। इस दर्द के साथ प्राय: कब्ज रहती है। पेट-दर्द में इसका मुख्य-लक्षण दर्द के साथ पेट का पीठ के साथ सट जाना है। पेट का दर्द बेलाडोना, कौलोसिन्थ, क्यूप्रम, मैग फॉस और डायोस्कोरिया में भी है, परन्तु इनका भेद निम्न है:

बेलाडोना का पेट-दर्द – यह चलता-फिरता पेट-दर्द है जो यकायक आता है और यकायक चला जाता है। रोगी ऐसा अनुभव करता है मानो पेट में कील घुसेड़ी जा रही है। थोड़ी भी स्पर्श से दर्द बढ़ जाता है, रोगी पेट-दर्द के स्थान को छूने नहीं देता, परन्तु जोर से दबाने से आराम आता है।

कौलोसिन्थ का पेट-दर्द – यह पेट-दर्द प्लम्बम के दर्द जैसा है, जो कि नाभि-प्रदेश के केन्द्रीय-स्थान से उठता है, वहां से उठकर सारे पेट में तथा छाती तक फैल जाता है। रोगी ऐसा अनुभव करता है मानो उसकी आंतें पत्थरों के दो पाटों में पिसी जा रही है। रोगी दर्द से दोहरा हुआ जाता है। दोहरा होने से पेट जब दबता है तो उसे आराम आता है। अगर रोगी किसी सख्त वस्तु के साथ पेट को दबाता है तो पेट-दर्द हल्का पड़ जाता है।

क्यूप्रम का पेट-दर्द – इसमें पेट में भयंकर ऐंठन पड़ती है। आंतों के एक अंश के दूसरे अंश में घुस जाने पर जो भयंकर पेट-दर्द होता है, जिसमें रोगी की चीखें निकल जाती हैं, उल्टी होने लगती है, उसमें यह औषधि आश्चर्यजनक कार्य करती है।

मैग फॉस का पेट-दर्द – इसका दर्द सेंक से, टांगों को सिकोड़ कर लेटने से दबाने से ठीक होता है, परन्तु विशेष-लक्षण सेंक से दर्द का कम होना है।

पेट-दर्द में प्लम्बम और प्लैटिनम की तुलना – पेट-दर्द में नाभि-प्रदेश से पीठ की तरफ रस्सी से खिचें जाने का अनुभव प्लैटिनम में भी पाया जाता है। पेंटरों के पेट-दर्द में दोनों दवाओं के लक्षण मिलते हैं, परन्तु इनके मानसिक लक्षण एक-दूसरे से भिन्न हैं। प्लम्बम का रोगी उपेक्षा-वृत्ति (Indifference) का, शोकातुर (Melancholy) होता है, प्लैटिनम का घमंडी, उद्धत तथा अपने को सबसे बड़ा समझता है।

(2) धीरे-धीरे होने वाला पक्षाघात – यह पक्षाघात धीरे-धीरे बढ़ता है। त्वचा की, आंतों की, मूत्राशय की, मन की शिथिलता बढ़ती जाती है, पहले भिन्न-भिन्न अंगों का और अन्त में संपूर्ण-शरीर का पक्षाघात हो जाता है।

(3) त्वचा की शिथिलता या संवेदन-शीलता का ह्रास – रोगी की त्वचा की संवेदनशीलता धीरे-धीरे कम होती जाती है। उदाहरणार्थ, साधारण तौर पर अगर किसी व्यक्ति की चूंटी काटी जाय तो वह झट प्रतिक्रिया करता है, परन्तु प्लम्बम के रोगी को चूंटी काटी जाय, तो थोड़ी देर बाद वह कहता है ओह! इससे स्पष्ट है कि उसकी संवेदनशीलता शिथिल पड़ती जा रही है। अंगुलियां सुन्न पड़ने लगती है, हथेली और पांव के तलवे सुन्न होने लगते हैं, त्वचा में भी सुन्नपन आने लगता है। शरीर के अन्य सब अंगों का काम धीमा पड़ने लगता है। स्नायु-संस्थान पहले जैसी सजगता से काम नहीं करता। मांस-पेशियां भी अपने काम में ढीली पड़ जाती हैं। इस प्रकार शुरू में ‘हल्का पक्षाघात’ दिखलाई देता है, किसी-किसी अंग में सुन्नपन आने लगता है, और अन्त में ‘पूर्ण-पक्षाघात’ (paralysis) हो जाता है।

(4) कलाई गिर पड़ती है (Wrist drop) – इसका भी त्वचा की शिथिलता से ही संबंध है। रोगी की वे मांसपेशियां जिन की शक्ति से हाथ या पांव को इच्छानुसार घुमाया-फिराया जा सकता है – जिन्हें अंग्रेजी में ‘एक्सटेंसर मसल्स’ कहते हैं – शिथिल पड़ जाते हैं, और हाथ की मांसपेशी की शिथिलता के कारण रोगी की कलाई गिर पड़ती है। वह हारमोनियम तथा पियानो नहीं बजा सकता, कलम हाथ में लेकर लिख नहीं सकता, अंगुलियों का इच्छानुसार संचालन नहीं कर सकता। जब मांसपेशी से अधिक काम लिया जाता है तब भी थक जाने के कारण वह काम नहीं कर सकता, थकी हुई हालत में भीग जाने से भी मांसपेशियां जवाब दे देती हैं। ऐसी हालत में रस टॉक्स लाभ करता है, परन्तु रस टॉक्स दीर्घगामी औषधि नहीं है, हल्के रोगों में इसका उपयोग किया जाता है, गहरे तथा क्रौनिक लक्षणों में प्लम्बम से ही लाभ होता है।

(5) आँतों की शिथिलता (कब्ज) – इस औषधि की चरित्रगत शिथिलता का प्रभाव आँतों पर भी पड़ता है जिससे आंतें शिथिल हो जाती हैं, मल को बाहर नहीं धकेल सकतीं। आंतों में मल सूख जाता है, मल की गांठे पड़ जाती हैं, वह भेड़ की मेंगनी की तरह का हो जाता है। ओपियम में भी ऐसा गठीला मल पाया जाता है। ओपियम के रोगी को ऊंघाई रहती है, प्लम्बम में स्नायविक-शिथिलता रहती है। अगर प्लैटिना के लक्षणों पर कब्ज में लाभ न हो। तो प्लम्बम से लाभ होता है। अगर गुदा में खुश्क मल बहुत-सा इकट्ठा हो जाय, और गुदा की मांस-पेशियों की शिथिलता के कारण वह न निकले, तो प्लम्बम से मल आ जाता है। सख्त कब्ज की यह उत्तम औषधि है।

(6) मूत्र द्वार की शिथिलता ( पेशाब रुक जाना ) – शिथिलता का मूत्र द्वार पर प्रभाव पड़ने पर रोगी का पेशाब रुक जाता है। डॉ कैन्ट एक स्त्री रोगिणी का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि वह दो दिन तक बेहोशी में पड़ी रही और इस अर्से में उसका पेशाब रुका रहा। प्लम्बम की उच्च शक्ति की एक मात्रा से वह होश में भी आ गई और उसे पेशाब भी आने लगा।

(7) शक्ति – 3, 30, 200

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