प्लीहा ( तिल्ली ) क्या है उसकी संरचना और कार्य

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प्लीहा को अंग्रेजी में स्पलीन (Spleen) कहा जाता है। अँग्रेजी में प्लीहा का स्वभाव के साथ सम्बन्ध जोड़ा गया है। (Splenic Temper) का अर्थ होता है ‘चिड़चिड़े स्वभाव वाला व्यक्ति’ इसी प्रकार बेचारी प्लीहा भी बहुत ही बदनाम है क्योंकि मलेरिया ज्वर में यह बढ़ जाती है। उसको हिन्दी में एक और नाम ‘तिल्ली’ के नाम से भी जाना जाता है । यह हमारे (मानव) शरीर में ऊपर को बाँयी ओर रहती है, उसके पीछे की ओर नवीं, दसवीं और ग्यारहवीं पसलियाँ रहती हैं । उसके आगे की ओर आमाशय (Stomach) का कुछ भाग रहता है । वृक्क (Kidneys) और आँतें भी इससे मिली रहती हैं ।

प्लीहा की बनावट

प्लीहा नीलापन लिए लाल रंग की हुआ करती है। यह प्रणाली विहीन ग्रन्थियों में सबसे बड़ी होती है । यह आमाशय के नीचे बाँयी ओर स्थित होती है । प्लीहा के हारमोन के बारे में अभी तक निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है। (नोट – ग्रन्थियों के अन्त:स्रावों को ‘हारमोन’ कहा जाता है ।) इसकी लम्बाई 4-5 इंच तथा चौड़ाई 3 इंच और मोटाई लगभग डेढ़ इंच तथा वजन लगभग 15-16 ग्राम होता है । इसका आपेक्षिक गुरुत्व 1.037 से 1.060 तक होता है। स्वस्थ शरीर में इसको टटोला नहीं जा सकता है किन्तु मलेरिया और काला जार ज्वर आदि में इसके बढ़ जाने से इसको टटोलकर स्पर्श किया जा सकता है ।

प्लीहा के कार्य

हमारे शरीर में प्लीहा क्या विशेष कार्य करती है यह अभी तक राज बना हुआ है अर्थात् वैज्ञानिकों को अभी तक इसकी जानकारी नहीं हो सकी है। यदि किसी मनुष्य के शरीर से प्लीहा निकाल दी जाये तो केवल लसीका ग्रन्थि (Lymphatic Glands) बढ़ जाती है, किन्तु उसके स्वास्थ्य में कुछ विशेष अन्तर नहीं पड़ता है फिर भी वैज्ञानिकों को इसके जो भी कुछ कार्य ज्ञात हो सके हैं, वे निम्नलिखित हैं –

• प्लीहा अनावश्यक रक्त-कणों को (R.W.C.) बिल्कुल नष्ट कर देती है ।

• प्लीहा न केवल अनावश्यक रक्तकणों को मारती है बल्कि उनको बनाती भी है ।

• प्लीहा रक्त के श्वेत कणों (W.B.C.) को भी बनाती है ।

• यह रक्त को छानकर साफ भी करती है ।

• भोजन के पचने के समय यह बढ़ जाती है ।

• प्लीहा यूरिकाम्ल (Uric acid) बनाने में सहायता पहुँचाती है ।

• ऐसा समझा जाता है कि शायद रोग पैदा करने वाले कीड़ों से भी प्लीहा शरीर की रक्षा करती है ।

• प्लीहा कैल्शियम के ‘मेटाबोल्जिम’ में भी सहायक होती है ।

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