प्लैटिनम – Platinum Metallicum Homeopathy Uses, Benefits & Dosage In Hindi

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प्लैटिनम का होम्योपैथिक उपयोग

( Platinum Homeopathic Medicine In Hindi )


(1) मानसिक-दृष्टि से अपने को सबसे बड़ा समझना –
यह हिस्टीरिया-ग्रस्त उन रोगियों की दवा है जो अपने को दूसरों से बड़ा समझते हैं। स्त्री घमंड में अपने को इतना बड़ा समझती है कि दूसरों को तुच्छ, अत्यन्त छोटा समझने लगती है। रानी की तरह गर्दन तान कर चलती है मानो उसके चारों तरफ के लोग तुच्छ, घृणित जीव हों। उन पर नजर उठा कर देखना भी अपनी शान के खिलाफ समझती है। उन्हें अपनी स्थिति से बहुत नीचे का प्राणी खयाल करती है, मानो उसके सामने सब कीड़े-मकौड़े हो। अपने रिश्तेदारों को अपने वंश से बहुत हीन समझती है।

(2) शारीरिक-दृष्टि से भी अपने को सबसे बड़ा समझती है – इस मानसिक-विक्षेप का असर यहां तक होता है कि वह दूसरों को शारीरिक-दृष्टि से भी अपने से बहुत छोटा देखती है। उसे ऐसा लगता है कि उसका शरीर बहुत बड़ा है, उसके शरीर के मुकाबले में दूसरों का शरीर उसे बहुत छोटा दिखलाई देता है। दूसरों की तुच्छता, क्षुद्रता, छोटेपन को देखकर उनके प्रति उसके मुख पर घृणा का भाव झलकता है। छोटे-छोटे मामलों में जिनमें गंभीरता का कोई स्थान नहीं होता वह गंभीर-मुद्रा धारण कर लेती है, और जरा-जरा-सी बात पर चिढ़ने लगती है, मुंह फुला लेती है।

(3) कभी दु:खी कभी प्रसन्न – परिवर्तित मानसिक-मुद्रा में रहती है – उसकी मानसिक-मुद्रा बदलती रहती है। कभी वह दु:खी दिखलाई देती है, कभी प्रसन्न। इस प्रकार मानसिक-मुद्रा का परिवर्तन इग्नेशिया, क्रोकस, नक्स मौस्केटा, पल्स तथा एकोनाइट में भी पाया जाता है। ये सब हिस्टीरिया-ग्रस्त रोगी के लक्षण हैं।

(4) जीवन से घृणा परन्तु मृत्यु से भय – भय इस औषधि का प्रमुख लक्षण है। उसे डर लगा रहता है कि कुछ अनहोनी बात न हो जाय, ऐसा न हो कि उसका पति जो रोज लौट आया करता है आज न लौटे। वह जीवन से घृणा करती है, चिड़चिड़ा स्वभाव होता है, डर लगता है, परन्तु मरने से भी डरती है। उक्त प्रकार की अवस्था डर जाने, रंज, गुस्सा, अहंकार, विषय-वासना आदि से उत्पन्न हो सकती है।

(5) दर्द धीरे-धीरे बढ़ता और धीरे-धीरे घटता है – इसका दर्द धीरे-धीरे बढ़ता है, और उच्च शिखर पर आ जाने के बाद धीरे-धीरे घटता है, और दर्द का स्थान सुन्न पड़ जाता है। स्टैनम के दर्द में भी यही लक्षण हैं, परन्तु स्टैनम में छाती की अत्यधिक कमजोरी होती है। जो प्लैटिनम में नहीं है। बेलाडोना और मैग फॉस में दर्द एकाएक शुरू होता है और एकाएक ही समाप्त हो जाता है। सल्फ्यूरिक ऐसिड में दर्द धीरे-धीरे बढ़ता है, परन्तु एकाएक हट जाता है।

(6) शारीरिक तथा मानसिक लक्षणों का पर्याय-क्रम – इस औषधि का एक विशेष-लक्षण यह है कि जब शारीरिक-लक्षण प्रकट होते हैं, तब मानसिक लक्षण नहीं रहते, जब मानसिक-लक्षण प्रकट होते हैं, तब शारीरिक-लक्षण नहीं रहते। डॉ० नैश ने एक पागलपन के रोगी का उल्लेख किया है जिसके मानसिक-लक्षण तथा रीढ़ की हड्डी-मेरु-दंड-में दर्द के लक्षण एक-दूसरे के बाद आते-जाते रहते थे। जब मानसिक-लक्षण प्रकट होते थे तब स्पाइन का दर्द गायब हो जाता था, जब स्पाइन का दर्द प्रकट होते थे मानसिक लक्षण नहीं रहते थे। वह इस औषधि से ठीक हो गया।

(7) गुदा-प्रदेश में टट्टी चिकनी मिट्टी की तरह चिपक जाती है – मल गुदा-प्रदेश में चिकनी मिट्टी की तरह चिपट जाता है। कब्ज में जब नक्स-वोमिका से भी फल नहीं मिलता तब यह उसे दूर कर देता है।

(8) अप्राकृतिक मैथुन की प्रवृत्ति – जिन लोगों में अप्राकृतिक-मैथुन की घृणित प्रवृत्ति पायी जाती है उनकी इस प्रवृत्ति को यह रोक देता है।

(9) रजोधर्म समय से पहले, देर तक रहने वाला, स्याह रंग का होता है – माहवारी अपने नियमित समय से बहुत पहले होती है, देर तक रहती है। और खून का रंग स्याह, जमा हुआ और बदबूदार होता है। बच्चेदानी में दर्द होता है, खुजली होती है, और ऐसा लगता है कि मानो लटक रही है।

(10) स्त्रियों में अत्यन्त काम की प्रवृत्ति – स्त्रियों में, विशेषकर कुमारियों में अत्युत्कट काम-भावना इस औषधि में पायी जाती है। सेक्स की चेतना का समय से पहले जाग उठना इसका निर्देशक लक्षण है। जननेन्दिय इतनी संवेदनशील होती है कि चिकित्सक परीक्षा करने के लिये भी उसे छू नहीं सकता, छूते ही उसे ऐंठन पड़ जाती है। ऐसी स्त्रियां मैथुन से बेहोश हो जाती हैं। ऐसी स्त्रियों के बांझपन को प्लैटिनम दूर कर देता है।

काम-प्रवृत्ति के इलाज की मुख्य-मुख्य औषधियां

प्लैटिनम – नवयुवतियां जिनके गुप्तांग तथा काम-वासना समय से पहले जाग उठते हैं, जिन्हें काम-चेष्टाएं आ घेरती हैं, और बुरी आदतों की लत पड़ जाती है उनके लिए यह उपयोगी है। गर्भवती स्त्रियों को संगम की प्रबल इच्छा होने पर यह लाभप्रद है। गुप्तांग इतने नाजुक होते हैं कि चिकित्सक उनको छूकर परीक्षा नहीं कर सकता।

एस्टेरियस – विषय-तृष्णा इतनी जबर्दस्त होती है कि मैथुन से भी दूर नहीं होती। स्त्री तथा पुरुष दोनों के लिये उपयोगी है।

एपिस – विधवाओं की अत्यधिक विषय-भोग की इच्छा।

कॉफ़िया – जननांगों में विषय-भोग की खुजली, जननांगों का नाजुक (Sensitive) होना।

ग्रैटिओला तथा प्लैटिनम – गर्भवती स्त्रियों की विषय-भोग की इच्छा।

हायोसाएमस – रोगी की विषय-भोग की इतनी उत्कट इच्छा होती है कि गुप्तांगों को खोलकर दिखलाता है।

कैलि फॉस – अविवाहिता लड़कियों में प्रत्येक माहवारी के बाद विषय-कामना की उत्तेजना।

लिलियम टिग – डिम्ब-ग्रन्थि की शिकायतों के साथ विषय-वासना का होना।

म्यूरेक्स – विषय-भोग की प्रबल इच्छा की दृष्टि से इसके मुकाबले में दूसरी दवा नहीं है। रोगी अपने को वश में नहीं रख सकता। विषय-भोग की इच्छा उसे पागल-सी कर देती है।

औरिगेनम – विषय-भोग की इच्छा से बाधित होकर रोगी हस्त-मैथुन करने लगता है।

फ़ॉसफ़ोरस – बाधित-संयम के कारण विधवाओं की काम-प्रवृत्ति। रोगी हायोसाएमस की तरह गुप्तांगों को खोलकर दिखलाता है।

(11) शक्ति तथा प्रकृति – 6, 30 (रोगी ठंडी हवा में घूमना पसन्द करता है)

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