बच्चों में वायरल बुखार और होमियोपैथिक इलाज

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शिशुओं एवं बच्चों के शरीर का तापमान सामान्य रूप से 36.5 डिग्री सेल्सियस से 37 डिग्री सेल्सियस (97.5 से 98.5 फारेनहाइट) की सीमा में रहता है। 24 घंटे में थोड़ा परिवर्तन होता है, जैसे रात में तथा प्रात: काल उठने पर थोड़ा कम तथा दोपहर बाद तथा शाम के वक्त थोड़ा अधिक हो सकता है। जब शरीर का तापमान 37 डिग्री सेन्टीग्रेड या 98.5 डिग्री फारेनहाइट से अधिक होता है, तब इसे बुखार या ज्वर कहते हैं।

शरीर का तापमान कैसे नापें : मुंह से तापमान लेना, बड़े बच्चों तथा बड़ों का तापमान लेने का यह एक सबसे अच्छा तथा सही साधन है, परंतु इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बच्चा थर्मामीटर काट न ले। यदि ऐसा हो जाए, तो डबल रोटी का एक टुकड़ा खिला देना चाहिए। अगर पारा थोड़ा मुंह के अंदर भी चला जाए, तो भी डरने की कोई बात नहीं है, क्योंकि, पारा इतना कम होता है कि उससे किसी प्रकार की समस्या नहीं होगी। मुंह में थर्मामीटर करीब एक से दो मिनट तक रखना चाहिए। इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे ने बुखार नापने के आधा घंटा पहले तक कोई ठंडी या गर्म चीज न खाई हो।

बगल का तापमान : थर्मामीटर को बगल में (बांह के नीचे छाती वाले) भाग से चिपका कर रखें। यह विधि नवजात शिशु, छोटे बच्चों, बेहोश रोगी आदि में प्रयोग में लाई जाती है।

मलद्वार की ओर से तापमान लेना : इसमें मुंह की अपेक्षा एक डिग्री अधिक तापमान आता है। इसमें बच्चे को या तो बिस्तर पर या गोद में औंधे मुंह लिटा देना चाहिए। थर्मामीटर के पारे वाले भाग में चिकनाहट के लिए थोड़ी वैसलीन लगाकर मलद्वार में करीब एक इंच घुसा देते हैं। थर्मामीटर को पकड़े रहना चाहिए तथा नितम्बों को सटाकर रखना चाहिए। शिशुओं में शरीर की विभिन्न जगहों पर तापमान लगभग बराबर होता है। अत: यह गलत है कि बगल के तापमान में एक डिग्री जोड़ दिया जाए।

बुखार के कारण

1. सर्दी, जुकाम तथा श्वसन संबंधी बीमारियों, जैसे निमोनिया, टॉन्सिलाइटिस आदि के कारण, 2. छूत की बीमारियां – जैसे खसरा, मम्स (कनफड़े), छोटी चेचक, जरमन मीजल्स आदि, 3. मूत्रतंत्र में संक्रमण,4. दिमागी ज्वर, तथा दिमाग का फोड़ा, 5. अन्य संक्रमण, जो तेजी से फैलते हैं, जैसे टायफाइड, जिगर में सूजन (हिपेटाइटिस), वायरस (विषाणु) संक्रमण आदि, 6. कान तथा गले के संक्रमण, 7. परजीवी बीमारियां, जैसे मलेरिया, कालाजार, अमीबा के कारण, जिगर का फोड़ा आदि, 8. त्वचा के संक्रमण, जैसे फोड़े-फुंसी आदि, 9. हड्डी तथा जोड़ की बीमारियां, जैसे हड्डी में पस पड़ना, जोड़ों की बीमारी, रुमेटिक बुखार आदि, 10. डाक्टरी इलाज से उत्पन्न बुखार, दवा से बुखार, खून चढ़ाने से बुखार, ग्लूकोज चढ़ने से बुखार आदि।

बुखार में सावधानियां तथा घरेलू इलाज

अधिक कपड़े उतार कर हलके कपड़े पहनाने चाहिए। गर्मियों में तेज बुखार होने पर सारे कपड़े भी उतारे जा सकते हैं, किन्तु बच्चे को तेज हवा के झोंकों से बचाना चाहिए। बुखार यदि 100 डिग्री फारेनहाइट से बढ़े, तो सिर पर गीला तौलिया रखवाएं। यदि बुखार फिर भी बढ़े, तो बच्चे के सिर और कनपटी पर बर्फ की थैली रखवाएं। यदि फिर भी बुखार बढ़े, तो बच्चे का सारा शरीर बर्फ के ठंडे पानी से, तौलिए से पुंछवाएं। सीना एवं पीठ भी पूछें। इस क्रिया को कोल्ड स्पजिंग कहते हैं। 104 डिग्री के आस-पास बुखार रहने पर यह क्रिया लाभप्रद रहती है। तौलिया या रूमाल पीठ, छाती एवं जांघों पर रखें। एकदम बुखार उतरने से बच्चे को कंपकंपी हो सकती है। बुखार धीरे-धीरे उतरना ही ठीक रहता है।

तरल पदार्थ : तेज बुखार में शरीर से पानी तथा तरल पदार्थ की मात्रा कम हो जाती है। इसलिए उसे अतिरिक्त रूप में जल, शर्बत, चाय, दूध आदि देना चाहिए।

खुराक : बुखार में अक्सर बच्चे की भूख मारी जाती है। अत: उसे मनपसंद सुपाच्य हलके खाद्य पदार्थ एवं पौष्टिक पदार्थ, थोड़े-थोड़े समय पर खाने को देते रहने चाहिए।

डिहाइड्रेशन : यदि शरीर का टेम्परेचर अधिक बना रहे (लगातार), तो अधिक पसीना आने से शरीर से बहुत पानी समाप्त हो जाता है। यदि तरल खाद्य पदार्थों से इस क्षति की पूर्ति की जाए, तो गुर्दों के काम में रुकावट पड़ती है और शरीर की रसायन क्रिया गड़बड़ा जाती है।

दौरा पड़ना या अंगों की ऐंठन : प्राय: अधिक टेम्परेचर के कारण एक से तीन वर्ष की आयु के बच्चों को मिरगी जैसे दौरे पड़ने लगते हैं। 6 वर्ष की आयु के बाद प्राय: ऐसा नहीं होता।

डॉक्टर से परामर्श कब लें : 1. यदि बुखार 101 से 102 डिग्री फारेनहाइट से अधिक बढ़ता हो, 2. यदि लगातार दो-तीन टेम्परेचर (बुखार) बना रहे, 3. यदि बुखार के साथ दौरे पड़ रहे हों या दौरों का भय हो, 4. यदि आप बच्चे के प्रति बहुत चिंतित हों, 5. यदि तेज बुखार के साथ उल्टियां या दस्त होने लगें, 6.यदि बच्चा बेहोश होने लगे,7.यदि बुखार के कारण बच्चा दूध या पानी लेना बंद कर दे।

प्राथमिक उपचार

जब बच्चा छोटी-मोटी बीमारी का शिकार हो, तो माता-पिता को निम्न प्राथमिक उपचार करना चाहिए।

1. सर्वप्रथम बच्चे का पालना या बिस्तर शुद्ध, हवादार और प्रकाश युक्त स्थान पर ले जाएं, बिस्तर की चादर या ओढ़ने के वस्त्र स्वच्छ और कीटाणु रहित रखें, 2. मच्छरों की ज्यादा परेशानी हो, तो पालने या बिस्तर पर मच्छरदानी बांध दें, 3. बच्चे के प्रयोग में आने वाला पानी उबाला हुआ और स्वच्छ होना चाहिए। उसे पिलाया जाने वाला दूध भी शुद्ध एवं ताजा हो, 4. बच्चे के प्रयोग में आने वाले प्याले, कटोरी, चम्मच आदि स्वच्छ रखें, 5. बच्चे के गंदे कपड़े बदलकर उसे स्वच्छ कपड़े पहनाएं। माता-पिता या वह व्यक्ति, जो बच्चे की देखभाल करता हो, स्वयं भी स्वच्छ हो और स्वच्छ कपड़े पहने।

बीमार शिशु का भोजन (आहार) : सामान्यत: यह धारणा बनी हुई है कि ज्वर से पीड़ित बच्चे को आहार नहीं देना चाहिए। यह बात सही नहीं है। वास्तव में बुखार या अन्य बीमारी से पीड़ित बच्चे को अधिक आहार ही आवश्यकता होती है। वैसे तो बीमार बच्चा स्वयं ही आहार नहीं लेता या कम लेता है। आहार के प्रति उसकी रुचि नष्ट हो जाती है। बच्चे को बीमारी में उसकी पसंद का आहार थोड़ी-थोड़ी मात्रा में दिया जा सकता है। एक साथ अधिक मात्रा में आहार देने पर अपच तथा अजीर्ण की संभावना रहती है। थोड़ी-थोड़ी देर पर थोड़ा आहार देना हितकर रहता है। यदि बीमार बच्चे को बिलकुल आहार न दिया जाए, तो बुखार की गर्मी से उसके शरीर की मांसपेशियां जल जाएंगी और वजन घट जाएगा। आहार देने में जबर्दस्ती नहीं करनी चाहिए। इससे बीमार बच्चे को मानसिक कष्ट होता है। माता को समझदारी एवं विवेक से बच्चे को आहार खिलाना चाहिए।

बीमारी में स्नान : बच्चे को जब ज्वर न हो या कुछ आराम लगे, तो स्वच्छ कुनकुने पानी से नहलाएं या स्पंज करें। यदि बच्चा अधिक बीमार हो, तो नहलाने के बजाए सारे शरीर का स्पंज करना अधिक हितकर रहता है।

उपचार

बुखार के नियंत्रण के लिए, ‘एकोनाइट’, ‘एथूजा’, ‘ब्रायोनिया’, ‘कैल्केरिया’, ‘कैमोमिला’, ‘सिना’, ‘रसटॉक्स’, ‘डल्कामारा’, ‘आर्सेनिक’, ‘पल्सेटिला’, ‘जेलसीमियम’, अनेकों औषधियां लक्षणों की समानता के आधार पर दी जा सकती हैं।
• यदि बच्चा बुखार के साथ दूध पीते ही दही जैसी उल्टी कर दे एवं अत्यधिक कमजोरी और उनींदापन हो, तो ‘एथूजा’ 30 शक्ति में दें।
• यदि बच्चा जिद्दी हो व हरा-सफेद पाखाना हो रहा हो और चिड़चिड़ाहट भी हो, तो ‘कैमोमिला’ 30 शक्ति में दें।
• यदि बच्चे के पेट में से कीड़े निकलें, तो ‘सिना’ 30 दें।
• यदि बरसात में बुखार आए, तो ‘रसटॉक्स’ व ‘डल्कामारा’ औषधियां, एक घंटे के अंतर पर दिन में तीन बार 30 शक्ति की एक-एक गोली बुखार उतरने तक दें।
• यदि बच्चे के होंठ सूख रहें हों, जल्दी-जल्दी थोड़ा-थोड़ा पानी मांगे, तो ‘आर्सेनिक’ 30 शक्ति में दिन में तीन बार दो-तीन दिन दें।
• यदि बुखार के साथ बदन दर्द भी हो व बच्चा अधिक मात्रा में पानी पिए, तो ‘ब्रायोनिया’ 30 शक्ति में दें।
• यदि बच्चे को चाक-मिट्टी खाने की आदत हो, तो ‘कैल्केरिया कार्ब’ 30 शक्ति में दें।
• दांत निकलने के दौरान दस्त होने पर ‘कैल्केरिया फॉस’ 30 शक्ति की दो-तीन खुराकें ही पर्यात रहती हैं।
• पछुआ हवा चलने या ठंड लगने पर बुखार हो, तो ‘एकोनाइट’ 30 शक्ति की तीन-चार खुराक दें।
• यदि बुखार एक निश्चित समय पर हो जाता हो, तो ‘सिड्रान’ 30 शक्ति में दें।
• दोपहर में व रात में 12 से 2 बजे के बीच बुखार बढ़े, बच्चा पानी अधिक मांगे व होंठ सूखें, तो ‘आर्सेनिक’ 30 शक्ति में दें।
• यदि बच्चे को कब्ज हो, तो ‘नक्सवोम’ 30 शक्ति में सांझ ढले, 20 मिनट के अंतर पर तीन खुराक दें व अगली सुबह से दिन में तीन बार ‘एलूमिना’ 30 शक्ति में दो दिन खिलाएं। बच्चे मिट्टी-खड़िया भी खाते हैं। ऐसे में बच्चे को पानी खूब पिलाएं व रेशेदार पदार्थ, जैसे दलिया आदि खिलाएं।
• चाक, मिटटी खाने वाले बच्चों को चिकित्सकीय परामर्श से आयरन के इंजेक्शन भी लगवाये जा सकते हैं।

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