यकृत (जिगर ) क्या है – यकृत का कार्य [ Function Of Liver ]

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मानव-शरीर में यकृत उदर में दाहिनी ओर, वक्षोदर मध्यस्थ पेशी (Diaphragm) के नीचे स्थित है। इसके नीचे की ओर पित्ताशय ( Gall Bladder) होता है। मानव-शरीर में जितने भीतरी यन्त्र हैं, यकृत उन सबमें बड़ा होता है। इसकी लम्बाई दाँये-बाँये 9 इंच के लगभग होती है और चौड़ाई 10-12 इंच के लगभग होती है । युवकों में इसका भार (वजन) लगभग पौने दो सेर होता है। इसके भार से मानव शरीर के भार से 1 अनुपात 40 की निस्बत रहती है। इसका आपेक्षित गुरुत्व 1.005 से 1.006 तक होता है। इसका रंग गहरा सुर्ख-मायल-भूरा होता है। यह ऊपर से स्पर्श करने में मुलायम और मृदु लगता है किन्तु अन्दर से ठोस होता है। यह 24 घण्टे में लगभग 600 ग्राम पित्त बनाता है।

यकृत के कार्य (Functions of Liver)

यकृत हमारे शरीर की एक बड़ी ग्रन्थि है । पाचन तथा शरीर के पोषण में इसका महत्वपूर्ण योगदान है । इससे जो पाचक रस प्राप्त (पित्त) प्राप्त होता है, वह पाचन प्रक्रिया में सहायक होता है। इसके अतिरिक्त भी यकृत के कई कार्य हैं, उनका उल्लेख निम्नवत है –

(1) Carbohydrate Metabolism:-

  • ग्लूकोज को ग्लाइकोजन के रूपमें परिवर्तित और उसका एकत्रीकरण (Storage) करना ।
  • फ्रैक्टोज को ग्लूकोज में बदलना।
  • आवश्यकता पड़ने पर Protein को Glucose में बदलना।
  • Lactic acid को Glycogen में बदलना ।

(2) Fat Metabolism :-

  • यकृत Fatty acids में से हाइड्रोजन (Hydrogen) के दो अणुओं को हटाकर उसे ऑक्सीनीकरण (oxidation) के अधिक उपयुक्त बना देता है।

(3) Protein Metabolism :-

  • यकृत प्रोटीन के अन्तिम रूप एमीनो एसिड से यूरिया (Urea) का निर्माण करता है। यकृत प्रोटीन से यूरिक एसिड का निर्माण करता है।

(4) यकृत पित्त (Bile) का निर्माण करता है।

(5) यकृत रक्त (Blood) का भी निर्माण करता है।

(अ) रक्त निर्माण के लिए आवश्यक Intrinsic Factor (आमाशय से प्राप्त) तथा Extrinsic Factor (आहार द्रव्यों से प्राप्त) का एकत्रीकरण यकृत में होता है।

(ब) मृत रक्तकणों से मुक्त लोहांश (Iron) भी यकृत में ही जमा होता है जो कि नवीन हीमोग्लोबिन के बनाने में काम आता है।

(स) भ्रूणावस्था में R. B.C. का निर्माण करता है।

(6) विटामिन के (K) की सहायता से यकृत Fibrinogen का निर्माण करता है।

(7) Heparin (Anti-Thrombin) नामक तत्त्व भी यकृत में ही उत्पन्न होता है, जो रक्त वाहिनियों में रक्त को नहीं जमने देता है।

(8) मरणासन्न रक्त कणों का भी नाश करता है।

(9) विषों का नाश करता है।

(10) विटामिन ए (A) को जमा रखता है।

सरलतम शब्दों में

  • यकृत पित्त उत्पन्न करता है।
  • यह शर्करा के आय-व्यय का हिसाब रखता है और अधिक शर्करा रक्त में नहीं जाने देता है।
  • यह मूत्र के यूरिया (Urea) और यूरिकाम्ल (Uric Acid) नामक यौगिक बनाता है।
  • यकृत आँत के विषैले पदार्थों के जहरीले प्रभावों को नष्ट करके उनसे होने वाली हानियों से हमारी रक्षा करता है।
  • यह गर्भस्थ बालक के शरीर में श्वेत रक्त कण बनाता है।

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