रोगी का भोजन

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रोगी को ऐसा भोजन देना चाहिए, जो उसके लिए लाभप्रद है। रोगी को क्रीम निकला दूध दें, मगर वसायुक्त चीजें न दें। विटामिन और खनिज तत्वों से भरपूर हरी सब्जियां, सूप और ताजे फल अधिक दें। प्रोटीन को तरल पदार्थों के माध्यम से देना चाहिए, जैसे-दाल का पानी। चीनी के बजाय उसे ग्लूकोज अधिक देना चाहिए। यह खून में बहुत जल्दी घुल जाता है। रोगी को बहुत सफाई, प्रेम और सुंदर ढंग से भोजन दें, जिससे उसकी भूख जाग्रत हो।

रोगी को सदैव ताजा भोजन दें। भोजन बनाकर रखने से उसका स्वाद बदल जाता है। साथ ही उसकी पोषकता भी नष्ट हो जाती है। बीमार को डॉक्टर की सलाह के अनुसार सादा, सुपाच्य तथा संतुलित भोजन देना हितकर सिद्ध होता है। नमक, कालीमिर्च का पाउडर तथा चीनी अलग से ट्रे में रखकर दें। भोजन एक साथ ज्यादा न देकर थोड़ा-थोड़ा दें। रोगी को दिया जाने वाला भोजन या पथ्य तीन प्रकार का हो सकता है –

(i) पतला (तरल) भोजन – दूध, चाय, जूस, मट्ठा, फटे दूध का पानी आदि।

(ii) हलवे के समान भोजन – पतली खिचड़ी, दलिया, सब्जी तथा सूजी की खीर आदि।

(iii) ठोस मिश्रित भोजन – उबली दाल या सब्जी और रोटी आदि।

तरल भोजन

अधिकांश रोगियों को सामान्यत: तरल भोजन ही दिया जाता है। इसलिए हम यहां सिर्फ इसी पर प्रकाश डालेंगे। दस्त, पेचिश, टायफाइड आदि बीमारियों में डॉक्टर से पूछकर तरल भोजन ही देना चाहिए। तरल भोजन के अन्तर्गत सुपाच्य पथ्य बनाने की कुछ विधि इस प्रकार है –

मूंग की दाल का पानी

आधी कटोरी मूंग की छिलके वाली दाल को अच्छी तरह साफ कर लें। फिर दो-तीन बार धोकर डेढ़ गिलास पानी डालकर भगोने को आग पर चढ़ा दें। उसमें चुटकी भर नमक भी डालें। जब दाल गल जाए, तो एक बड़ी कटोरी में छान लें। उसमें कालीमिर्च का पाउडर और नीबू का रस डालकर गरम-गरम पिएं। लंबी बीमारी के बाद ठोस आहार शुरू करने से पहले दाल का पानी पिया जाता है।

परवल का पानी

छह-सात ताज़े परवलों का पतला छिलका उतारकर बारीक काट लें। फिर हल्का-सा नमक डालकर उबलने के लिए रख दें। परवल के गल जाने पर एक प्याले में इसका पानी निकाल लें। उसमें नीबू का रस और कालीमिर्च का पाउडर डालकर रोगी को दें। परवल सुपाच्य होता है। इसके कतले भी दिए जा सकते हैं।

लौकी का पानी

250 ग्राम ताजी लौकी को अच्छी तरह धोकर बारीक काट लें। फिर उसमें नमक डालकर उबालें। गल जाने पर ऊपर-ऊपर का पानी कटोरी में निकाल लें। उसमें नीबू का रस, कालीमिर्च तथा भुने जीरे का पाउडर डालकर रोगी को दें। यह बहुत पौष्टिक एवं शक्तिवर्धक होता है।

पालक का पानी

200 ग्राम ताजे पालक की डंडी निकाल दें। फिर पत्तों को अच्छी तरह धोकर बारीक काटकर 150 ग्राम पानी में 3-4 मिनट उबालें। तदुपरांत चम्मच से मथकर छानें। फिर थोड़ा-सा काला नमक और पिसी कालीमिर्च डालकर नीबू निचोड़कर गरम-गरम पीने को दें। इसी तरह कई सब्जियों को एक साथ उबालकर उनका भी सूप दिया जा सकता है। यह सिर दर्द या बुखार आदि के बाद और गर्भवती महिलाओं की भूख बढ़ाने के लिए लाभप्रद है।

तरोई का पानी

एक प्रकार की मोटे छिलके वाली तरोई रोगियों को विशेष रूप से दी जाती है। तरोई को धोकर ऊपर का छिलका चाकू से उतारें। इसे खुरचकर नहीं उतारा जा सकता। फिर छोटे-छोटे टुकड़े करके हल्का-सा नमक डालकर बिना पानी डाले बहुत धीमी आग पर रख दें। पकने पर थोड़े से गूदे के साथ सारा पानी लेकर नीबू एवं कालीमिर्च डालकर पीने को दें। यह बुखार, टायफाइड, मोतीझरा आदि सभी बीमारियों में दिया जा सकता है। सादी तरोई को भी इसी तरह एक-डेढ़ गिलास पानी में उबालकर दें। यह मुंह का स्वाद बदलती है और ताकत प्रदान करती है।

टोस्ट का पानी

चार स्लाइस डबलरोटी को टोस्टर में भूरा-लाल सेंक लें। फिर इनको एक बड़े कटोरे में रखकर उन पर उबला पानी इतना डालें कि टोस्ट पानी में डूब जाएं। थोड़ी देर बाद पानी को प्याले में छानकर इच्छानुसार नमक, कालीमिर्च एवं नीबू का रस मिलाकर पीने को दें। यह बहुत जल्दी पचता है। इसे बुखार, टायफाइड (आंत्र ज्वर) और पेट के मरीज को दिया जाता है।

फटे दूध का पानी

250 ग्राम दूध को एक स्टील के भगोने में डालकर आग पर रख दें। एक उबाल आने पर उसमें आधे नीबू का रस डालकर फाड़ लें। फिर साफ धुले मलमल के कपड़े में छानकर पानी अलग कर लें। उसमें ग्लूकोज या शक्कर मिलाकर बीमार व्यक्ति को दें।

फलों का रस

संतरा, मौसमी, अनार एवं सेब का रस आमतौर पर हर रोगी को दिया जाता है। जिसका भी रस देना हो, उस फल का छिलका उतारकर बीज निकालकर रस निकालें। बीजों से रस कड़वा हो जाता है। फिर रस को छानकर प्याले में निकालें। अब एक स्टील की कटोरी को आग पर रख दें। गरम होने पर आग से उतारकर तुरन्त उसमें रस डाल दें। इस प्रकार रस गुनगुना हो जाएगा। इसमें काला नमक, कालीमिर्च का पाउडर या ग्लूकोज डालकर रोगी को दें। रस को इस प्रकार गरम करने से यह खांसी, बलगम आदि नहीं बनाता।

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