विटामिन के प्रकार – Vitamins Ke Parkar

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खनिज पदार्थ और विटामिंस हमारे शरीर के लिए अत्यधिक आवश्यक हैं। ये विभिन्न भोज्य पदार्थों को पचाने, शारीरिक शक्ति प्रदान करने और शरीर की विभिन्न रासायनिक प्रक्रियाओं को सम्बल देने में योगदान करते हैं।

साथ ही ये दोनों प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट एवं वसा की विभिन्न प्रक्रियाओं को नियमित करने तथा उन्हें पचाने में सहायता करते हैं। खनिज पदार्थ और विटामिंस के अभाव में हमारा शरीर अनेक रोगों से ग्रस्त हो जाता है। अत: विटामिनों का उल्लेख जरूरी है।

मुख्यत: विटामिन ‘ए’, ‘बी’-कॉम्प्लेक्स (बी-1, बी-2, बी-4, बी-5, बी-12, बी-15), नायसिन, बायोटीन, फॉलिड एसिड, विटामिन-‘सी’, ‘डी’, ‘ई’, ‘एफ’, ‘के’, और ‘पी’ हैं। हालांकि शरीर में इनकी मौजूदगी बहुत ही कम मात्रा में होती है, परन्तु शरीर की विभिन्न रासायनिक क्रियाएं इनके सहयोग के बिना नहीं हो सकतीं। वसा, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट आदि की प्रक्रियाओं को सुचारु रूप से कार्यशील करने में इन विटामिनों की जरूरत पड़ती है। इनकी पूर्ति हमें प्राकृतिक अथवा अन्य साधनों से करनी पड़ती है, क्योंकि विटामिन ‘के’ के अतिरिक्त इनमें से किसी को भी शरीर उत्पन्न नहीं करता। यदि भोजन में उचित संतुलन और पौष्टिकता का अंश हो तो हमारे शरीर को प्रतिदिन आवश्यक विटामिन की पूर्ति हो जाती है। परंतु यह भी सच है कि सभी विटामिनों के अभाव की पूर्ति संतुलित भोजन भी नहीं कर सकता।

विटामिन हमारे भोजन को इस योग्य बना देते हैं, जिससे शरीर में भोजन भली प्रकार पच सके, ऊर्जा मिल सके, रोगों से बचाव किया जा सके और शरीर की कमजोर कोशिकाओं को पुनः शक्ति मिले। हमारे स्वास्थ्य का संवर्द्धन, संरक्षण और सुधार करने के अतिरिक्त विभिन्न खाद्य पदार्थों की उपादेयता बढ़ाने में विटामिनों की भूमिका नकारी नहीं जा सकती। दैनिक भोजन में शरीर को (प्राकृतिक/अन्य साधनों) नीचे लिखी मात्रा में विटामिनों की आवश्यकता रहती है –

विटामिन A 5000 आई. यू
विटामिन बी-1 1.25 मिलीग्राम
विटामिन बी-2 1.50 मिलीग्राम
विटामिन बी-6 2.00 मिलीग्राम
विटामिन बी12 6.0 माइक्रोग्राम
नायसिन 20 मिलीग्राम
विटामिन बी-5 10 मिलीग्राम
विटामिन सी 60 मिलीग्राम
विटामिन डी 400 आई. यू
विटामिन इ 30-400 आई. यू
बायोटीन 3 मिलीग्राम
फॉलिक एसिड 3 मिलीग्राम

विटामिन A

विटामिन ‘ए’ के अभाव से रतौंधी (रात को देख न पाना), शरीर के विकास में बाधा, भूख कम लगना आदि लक्षण देखने में आते हैं। आंखों की नजर सुधारने-बरकरार रखने, सामान्य विकास प्रक्रिया को बढ़ाने, शरीर की रोग-निरोधक शक्ति में वृद्धि, गर्भावस्था में गर्भ को पोषित करने और दूध में बढ़ोतरी करने में यह विटामिन विशेष योगदान देता है। बच्चों को विटामिन ‘ए’ और ‘डी’ की विशेष रूप से आवश्यकता होती है।

यह हमें फल, सब्जी (रंगदार), दूध व दूध के उत्पादों, अंडे की जर्दी, जिगर, मछली के तेल, गाजर आदि में सुगमता से प्राप्त हो सकता है। परन्तु इसकी निर्धारित मात्रा ही लेनी चाहिए। चिकित्सक इस बात का निर्णय करता है कि प्रभावित व्यक्ति को कैसे, कब, कितनी अवधि और मात्रा में यह विटामिन लेना चाहिए। सामान्य व्यक्ति को रोजाना 5000 आई.यू. और दूध पिलाने वाली व गर्भवती महिलाओं की 8000 आई.यू. विटामिन ‘ए’ लेना चाहिए।

विटामिन बी कॉम्प्लेक्स

बी-1 (थायामीन) : यह पाचन और कार्बोहाइड्रेट की प्रयुक्ति में मदद करता है। नाड़ी तंत्र के संचालन, दिल व मांसपेशियों की समुचित व्यवस्था और विकास के लिए यह विटामिन जरूरी है। इस विटामिन की कमी से मानसिक उदासी, नाड़ियों में तनाव, वजन कम होना, पांवों के लकवे आदि लक्षण हो सकते हैं। यह चावल की भूसी, खमीर, गेहूं के छिलके, मटर, जई, दूध, जिगर, मांस आदि में होता है। अधिकतर सब्जियों से भी इसे प्राप्त किया जा सकता है। सामान्य अवस्था में रोजाना इसकी 1.25 मिलीग्राम की मात्रा पर्याप्त होती है।

बी-2 (रिबोफ्लेविन)

सामान्य स्वास्थ को बनाए रखने, उसे उन्नत करने तथा आंखों व चर्म हेतु भोजन से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए ऑक्सीजन की मदद करना इसके मुख्य कार्य हैं। इसकी कमी से होंठों का फटना, पेट में जलन, आंखों में जलन आदि हो सकते हैं। रोजाना इसकी 1.50 मिलीग्राम की मात्रा पर्याप्त होती है। इसे अनाजों और उनके उत्पादों, दूध व दूध से बनाए जाने वाले पदार्थ, मांस, जिगर आदि से प्राप्त किया जा सकता है।

बी-6 (पाइरॉडाक्सिन)

मस्तिष्क-मांसपेशियों को सुचारु बनाने, वसा व प्रोटीन को शरीर की विभिन्न प्रक्रियाओं में मदद करने और इन्हें जज्ब करने में इस विटामिन की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। यदि हमारे शरीर में इसकी कमी हो जाए तो बालों का गिरना, चर्म पर उदभेद, मांसपेशियों पर नियंत्रण न रख पाना, नाड़ी तंत्र में अव्यवस्था आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। इसे खमीर, दूध, दाल, केला, पत्तेदार गोभी, गेहूं का चोकर, गुर्दे, जिगर, अंडे, मांस, शीरा आदि से प्राप्त कर सकते हैं। इसकी दैनिक मात्रा 200 मिलीग्राम सामान्यावस्था में पर्याप्त है। यह एक अति महत्वपूर्ण विटामिन है, जिसकी कमी शरीर में नहीं होने देना चाहिए। उक्त लक्षणों के पैदा होते ही चिकित्सक के परामर्श से इसकी मात्रा बढ़ाई जानी चाहिए।

बी-12

यह विटामिन भूख में वृद्धि करता है। इसके अन्य मुख्य कार्य हैं – रक्त में लाल कणों का निर्माण करना, नाड़ी कोशिकाओं की रक्षा करना, कार्बोहाइड्रेट वसा-प्रोटीन को इस योग्य बनाना कि वे शरीर का पोषण कर सकें तथा वृद्धों-बच्चों के लिए रसायन-सा कार्य करना आदि। इसके अभाव से थकावट, पांडु रोग व शरीर के विकास में कमी हो जाती है और यदा-कदा जीभ सूज जाती है। सामान्य स्थिति में इसकी 6.0 माइक्रोग्राम की मात्रा पर्याप्त होती है, परंतु अधिक अभाव की दशा में 500-1000 माइक्रोग्राम लेने की आवश्यकता पड़ सकती है। इसे जिगर, मांस, अंडे, दूध तथा दूध के उत्पादों से प्राप्त किया जा सकता है।

बी-5 (पैन्टोथेलिक एसिड)

हालांकि शरीर में इसकी आवश्यकता अभी निश्चित रूप से नहीं आंकी जा सकी है, परंतु इसकी कमी बहुत कम महसूस की गई है। वैसे रोजाना इसकी 10 मिलीग्राम मात्रा ही पर्याप्त है जिसे गेहूं उसके चोकर, मटर, गन्ने के शीरे, खमीर, गुर्दे और जिगर से सरलता से प्राप्त किया जा सकता है।

विटामिन c (एसकॉर्बिक एसिड)

यह बहुत ही महत्वपूर्ण विटामिन है। क्योंकि इसके अभाव में शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता कम या समाप्त हो जाती है, घाव जल्दी नहीं भरते और कोशिकाएं परस्पर स्वस्थ नहीं रह पातीं। शक्ति नाश, सर्दी-गर्मी के प्रति शरीर की क्षमता का ह्रास, पांडु रोग, मसूड़ों से खून बहना, सामान्य कमजोरी तथा स्वास्थ्य की समस्याएं होना इसकी कमी को दर्शाती है। नीबू और आंवला में इसकी सबसे अधिक मात्रा पाई जाती है। अन्य खाद्य पदार्थों-आम, टमाटर, आलू, पालक, मिर्च, पपीता और सभी खट्टे फलों से इसे प्राप्त किया जा सकता है।

सामान्य रूप से स्वस्थ व्यक्ति के लिए 60 मिलीग्राम ही पर्याप्त है, परन्तु विशेष परिस्थितियों में यह 500-1000 मिलीग्राम तक भी ली जा सकती है। जो लोग सिगरेट पीते हैं, उन्हें 250-500 मिलीग्राम विटामिन ‘सी’ का प्रयोग रोजाना करने को कहा जाता है। विटामिन ‘सी’ और ‘ई’ का प्रयोग एक साथ भी किया जाता है, ताकि सामान्य स्वास्थ्य बरकरार रहे। ये दोनों विटामिन विष तत्व का नाश करते हैं। कुछ विद्वानों के मतानुसार इनको उचित मात्रा में लेने से बुढ़ापे के आगमन को काफी हद तक टाला जा सकता है।

विटामिन D (कैल्सीफेरॉल)

दांतों-मसूड़ों का निर्माण व रखरखाव तथा फॉस्फोरस और कैल्शियम को शरीर में आत्मसात करने में इसकी मुख्य भूमिका है। जिन गर्भवती महिलाओं के शरीर में सूजन (गर्भावस्था में) आ जाती है या जिनके शरीर में कैल्शियम का संतुलन बिगड़ जाता है, उन्हें विटामिन डी-2 के प्रयोग की सलाह दी जाती है। डॉक्टर की सलाह के बिना इसका निर्धारण और प्रयोग शरीर में विषैले तत्वों को बढ़ाने में सहायक होता है। सूर्य की अल्ट्रावॉयलेट किरणें शरीर की त्वचा में व्याप्त कोलेस्ट्रॉल को विटामिन ‘डी’ में बदल देती हैं। इस प्रकार इसका उत्तम स्रोत सूर्य की किरणें हैं। जो फल-फूल, सब्जी आदि सूर्य में पनपते हैं, उनके प्रयोग से शरीर को इस विटामिन की समुचित मात्रा प्राकृतिक रूप से प्राप्त हो जाती है। जो लोग सर्दी में धूप में (विशेष रूप से सुबह के समय) बैठते हैं, उन्हें इस विटामिन की कमी नहीं होती। इसका अन्य प्राप्ति स्रोत दूध, दूध के उत्पाद और मछली का तेल है। इसकी सामान्य दैनिक जीवन में 400 अई.यू की मात्रा पर्यात है। विशेष परिस्थितियों में उक्त मात्रा को बढ़ाया जा सकता है।

विटामिन e (टोकोफेरल)

प्रायः शरीर में इस विटामिन की कमी प्राकृतिक वनस्पतियों से पूरी हो जाती है। यह विटामिन ‘ए’ और ‘सी’ के अपचयन में सहायता प्रदान करता है, वसा को सड़ने से बचाता है, रक्त में अनावश्यक थक्के बनने से रोकता है, रक्त संचार नियमित करता है और नया चर्म (पुराने की जगह) बनने में मदद करता है। विटामिन ‘सी’ और ‘ई’ का परस्पर अटूट सम्बन्ध है। इसके अभाव के कारण प्रजनन अंगों का विकास प्रभावित होता है, प्रजनन प्रक्रिया सशक्त नहीं रह पाती, बुढ़ापा जल्दी आता है और मांसपेशियों में परस्पर सहयोग कम हो जाता है। इसे मक्खन, जिगर, अंडों, हरी पत्तेदार सब्जियों, अनाज के उत्पाद और छिलकों से प्राप्त किया जा सकता है। इसकी रोजाना 300-400 या 30-40 (I.U.) की मात्रा पर्याप्त रहती है। चर्म को स्वस्थ रखने में इस विटामिन की विशेष भूमिका है। यह चर्म को रूखी, सूखी कांतिहीन होने से बचाता है।

विटामिन k

विटामिन ‘के’ शरीर के रक्त में जमने की प्रक्रिया बनाता है अर्थात जब रक्त किसी कारणवश बहने लगता है तो यह रक्त-प्रवाह के स्थान पर एक थक्का बना देता है। इसका मुख्य उद्देश्य है कि खून का रुकना संभव हो जाए। यदि रक्त में जमने की क्षमता न हो तो खून बहता रहेगा और शरीर को इस उपयोगी तत्व से हाथ धोना पड़ेगा। विटामिन के रक्त-प्रवाह को नियंत्रित करता है। यकृत की सामान्य प्रक्रिया के संचालन में भी यह विटामिन बहुत सहायता करता है। छिलकेदार अनाज, अनाजों से इसकी पूर्ति की जा सकती है। मानव शरीर की आंतों में स्थित जीवाणु इसे बनाते रहते हैं। इसलिए इसको अलग से लेने की प्राय: जरूरत नहीं पड़ती। इनके अतिरिक्त विटामिन ‘एफ’, ‘पी’, बी-15, फॉलिक एसिड, निकोटिनामाइड आदि भी हैं, जिनकी शरीर के लिए उतनी उपादेयता नहीं है। यही कारण है कि इनका वर्णन नहीं किया गया।

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