सिकेल कौर्नूटम – Secale Cornutum

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सिकेल कौर्नूटम का होम्योपैथिक उपयोग

( Secale Cornutum Homeopathic Medicine In Hindi )

(1) गर्भपात या प्रसव के बाद जरायु का मल साफ करने के लिये स्थूल-अर्गट का प्रयोग – इस औषधि का स्थूल रूप में नातजुर्बेकार चिकित्सक या तो गर्भपात के लिये प्रयोग करते हैं, या एलोपैथी में इसके टिंक्चर का, और आयुर्वेद में इसके क्वाथ का प्रसव के बाद जरायु के मल को साफ करने के लिये प्रयोग होता है। प्रसव के बाद जो प्रसव-पीड़ाएं बची रहती हैं (Lingering pains) और जिन में जरायु के मल के पूर्ण रूप से साफ न होने के कारण थोड़ा बहुत स्राव होता रहता है, उसके लिये वैद्य लोग इसका क्वाथ दिया करते हैं। प्रसव के समय जरायु में जो शिथिलता आ जाती है उसे दूर कर इसका क्वाथ उसे संकुचित कर देता है, और जरायु अपनी पहली की-सी अवस्था में आ जाता है, जरायु का मल साफ हो जाता है, थोड़ा-बहुत होने वाला रक्त-स्राव दूर हो जाता है, दर्द जाते रहते हैं।

जहां तक गर्भपात का प्रश्न है, होम्योपैथी का शक्तिकृत सिकेल कौर गर्भपात जैसे कुकर्म में सहायता नहीं करता, अलवत: गर्भपात को रोक अवश्य देता है। इसका हम अभी आगे वर्णन करेंगे। डॉ० कैन्ट का कहना है कि कई स्त्रियां इतनी मूर्ख होती हैं कि जिस किसी तरह भी वे गर्भ गिराना ही चाहती हैं। वे प्राय: अर्गट लिया करती हैं। उन्हें नहीं मालूम कि इस प्रकार वे किसी चिर-स्थायी रोग की शिकार हो जाती हैं और अपनी आयु घटा लेती हैं। जिस प्रकार सोरा-दोष मनुष्य के रोगों को समूल नष्ट नहीं होने देता, उसी प्रकार अर्गट से गर्भपात करा लेने वाली स्त्रियां अर्गट-दोष के अधीन हो जाती हैं। उन्हें अर्गट की स्थूल मात्रा से गर्भपात होने के बाद से अनेक रोग हो जाते हैं, वे कहा करती हैं कि जब से गर्भपात हुआ तब से तबीयत ठीक नहीं रहती, स्वास्थ्य तो तब से जाता ही रहा है। डॉ० कैन्ट कहते हैं कि अर्गट के इस प्रकार के प्रयोग से जब स्वास्थ्य नष्ट हो जाता है, तब वह फिर सुधरता नहीं है। डॉ० पैगोट का कथन है कि जब तक जरायु में कुछ भी हो-भ्रूण हो, बच्चा हो, नार-बेल हो, रुधिर का थक्का ही क्यों न हो, स्थूल-अर्गट का तब तक प्रयोग नहीं करना चाहिय। अर्गट को लैटिन भाषा में सिकेल कौर्नूटम कहा जाता है।

(2) तीसरे महीने के गर्भपात को रोकने के लिये सिकेल का प्रयोग – इस औषधि की स्थूल-मात्रा से गर्भपात हो जाता है यही इस बात का प्रमाण है कि शक्तिकृत सिकेल गर्भपात को रोक देता है। जिन स्त्रियों को तीसरे महीने गर्भपात होने की प्रवृत्ति होती है उनके लिये सैबाइना की तरह यह भी उत्तम औषधि है।

(3) निरन्तर रक्त-स्राव से बेहद कमजोरी में सिकेल का प्रयोग – शरीर के किसी भी अंग से – नाक, मूत्राशय, गुदा-प्रदेश, जरायु आदि से-निरन्तर रक्त-स्राव होने पर अगर सीमातीत, बेहद कमजोरी हो जाय, तो इस औषधि से लाभ होता है। जब यह गर्भपात को रोक देता है तब अन्य प्रकार के रक्त-स्राव को रोकने में इसका उपयोगी होना स्वयं-सिद्ध है। इसके रक्त-स्राव का विशेष-लक्षण यह है कि काला, पतला रक्त-स्राव निरन्तर होता रहता है और इस से रोगी अपने को अत्यन्त दुर्बल, शक्तिहीन अनुभव करता है। जरायु से रक्त-स्राव हो, तो वह एक माहवारी से दूसरी माहवारी के बीच में लगातार बना रहता है, परन्तु उसका रूप पतला, पनीला, काला होता है, और इस प्रकार का रुधिर निरन्तर रिसा करता है। कमजोरी बेहद हो जाती है। रोगिणी को खुली हवा की उत्कट इच्छा होती है, शरीर में जलन होती है, कपड़ा ओढ़ना नहीं चाहती।

(4) प्रसव-वेदना हल्की हो तब प्रसव-वेदना बढ़ाने के भी लिये इसका प्रयोग होता है – डॉ० कौपरवेथ का कहना है कि एलोपैथी में प्राय: हल्की प्रसव-वेदना में प्रसव को सहायता देने और प्रसव-वेदना को तीव्र करने के लिये स्थूल मात्रा में इस औषधि का प्रयोग होता है। रोगिणी के भावी स्वास्थ्य के लिये यह प्रथा हानिकर है। डॉ० गुएरेन्सी का कहना है कि हल्की प्रसव-वेदना में, या जब रोगिणी प्रसव न होने से परेशान हो रही हो, तब 200 शक्ति की एक मात्रा प्रसव में अत्यन्त सहायक सिद्ध होती है। डॉ० डनहम का कहना है कि हल्की प्रसव-वेदना में लक्षणानुसार पल्सेटिला तथा नक्स वोमिका उत्तम कार्य करते हैं।

(5) पतली-दुबली, कमजोर शारीरिक-रचना की स्त्रियों तथा अत्यंत क्षीण, वृद्ध-पुरुषों के लिये उपयोगी है – इस औषधि का प्रयोग करते हुए रोगी या रोगिणी की शारीरिक-रचना पर भी ध्यान देना आवश्यक है। रोगिणी पतली-दुबली, कमजोर शरीर की होती हैं – हड्डियां निकली हुई, शरीर पर झुर्रियां पड़ी हुई, मांस-मज्जा बहुत कम। ऐसी शारीरिक-रचना की स्त्रियों के लिये यह औषधि विशेष उपयोगी है। सिकेल के रोगी का शरीर क्षीण होता है, त्वचा साफ नहीं होती, उस परे नीले-भूरे दाग और झुर्रियां पड़ जाती है। शरीर के जिन भागों में रक्त-संचार कम रहता है – हथेली के पीछे का भाग, घुटने के नीचे की टीबिया हड्डी के ऊपर की त्वचा आदि – उन पर खून कम होने के कारण धब्बे पड़ जाते हैं। ये स्थान सुन्न पड़ने लगते हैं, उनमें झनझनाहट होती है, ऐसा अनुभव होता है कि त्वचा के और मांस के बीच में कीड़े रेंग रहे हैं। अंगुलियां और पैर के अंगूठे मृत-प्राय हो जाते हैं, ऐसा लगता है मानो काठ के हों। यह अवस्था स्त्रियों में ही नहीं, वृद्ध-पुरुषों में भी पायी जाती है। रक्त संचार करने वाली प्रणालियां सिकुड़ जाती हैं, खून का खुला दौर नहीं होता। इसका यह अभिप्राय नहीं है कि स्थूल-काय व्यक्तियों में इस औषधि का प्रयोग नहीं होता, लक्षण मिलने पर उनमें भी यह औषधि लाभ करती है। इस औषधि के प्रयोग से रक्त-संचार ठीक होने लगता है, और वृद्ध-व्यक्तियों के शरीर की क्षीणता रुक जाती है। जिन वृद्ध-व्यक्तियों के शरीर में रक्त-संचार शिथिल हो जाता है, हाथ-पैर तक रुधिर नहीं जाता, अंग लकड़ी के-से प्रतीत होते हैं, उनके लिये यह औषधि उपयोगी है, रक्त-संचार में सहायता पहुंचाती है।

(6) बाहर से त्वचा ठंडी परन्तु भीतर से जलन – जलन इस औषधि का लक्षण है, त्वचा जलती है, हाथ-पैर जलते हैं। इस जलन का विशेष-लक्षण यह है कि बाहर से छूने पर तो अंग ठंडा लगता है, परन्तु भीतर से रोगी को जलन अनुभव होता है। गला, मुंह, फेफड़े, पेट, आतें-इन सब में रोगी को जलन के साथ खुश्की का अनुभव होता है।

(7) रोगी को ठंडक से आराम मिलता है – रोगी के लक्षण गर्मी से बढ़ते हैं, ठंडक से उसे आराम मिलता है। जैसा ऊपर कहा गया है, इसका विलक्षण-लक्षण यह है कि यद्यपि हाथ से छूने पर अंग बर्फ के समान ठंडे अनुभव होते हैं, तो भी रोगी ठंडक ही पसन्द करता है, शरीर पर कपड़ा रखना नहीं चाहता, दरवाजें-खिड़कियां खुली रखना चाहता है। रक्त-स्राव में, भले ही कमरा ठंडा हो, रोगी कपड़े से शरीर ढांकना नहीं चाहता। कोई जख्म हो, उसे ठंडक ही चाहिये, सेंक या गर्मी नहीं चहिये, जख्म को ढकने भी नहीं देता। पेट की शिकायत हो, आंतों की शिकायत हो, रोगी को ठंडक पसन्द है, गर्मी नहीं। बाहर ठंडक और भीतर जलन का अद्भुत-लक्षण कई बार अनेक कठिन रोगों में सिकेल द्वारा ठीक हो जाता है। इस संबंध में डॉ० चैरेट जो पहले एलोपैथ थे अपना अनुभव लिखते हुए कहते हैं कि एक रोगी जिसकी धमनियां संकुचित हो गयी थीं, जिससे पांव में रक्त न पहुंचने के कारण उनमें गैंग्रीन-सड़ांद-हो गयी थी, पैर सड़ने लग गये थे, पैरों में दर्द के कारण अत्यन्त परेशान था, उनके पास इलाज के लिये आया। एलोपैथी में इसके लिये जो दवा हो सकती थी वह उन्होंने उसे लिखकर दे दी, और कुछ दिन बाद जब उनकी रोगी से भेंट हुई, तो कहने लगा कि उसका रोग ठीक हो गया है।

डॉक्टर ने पूछा कि क्या उन पुड़ियों से पेट में दर्द तो नहीं हुआ? रोगी कहने लगा-कैसी पुड़ियां, मैंने तो तुम्हारा नुस्खा कैमिस्ट को भेज दिया था और उसने एक शीशी में कुछ द्रव-पदार्थ भेजा था, उस पर प्रतिदिन 4 चम्मच लेने के लिये लिखा था, वही मैंने लिया, पुड़िया तो कैमिस्ट ने मुझे कोई नहीं भेजी। उसी शीशी से मैं ठीक हो गया। यह सुनकर डॉ० चैरेट कैमिस्ट के पास गये, और उससे पूछा कि तुमने मेरे मरीज को क्या दवा भेजी थी। कैमिस्ट शराबी था, उसने गलती से एक दूसरे मरीज के लिये एक होम्योपैथ ने जो नुस्खा लिखा था वह दवा इस मरीज को भेज दी थी। उस नुस्खे को देखा गया, तो पता चला कि होम्योपैथ ने किसी दूसरे मरीज के गैंग्रीन के लिये शुद्ध जल में सिकेल कौर के टिंचर का एक बूंद डाल कर देने को लिखा था। डॉ० चैरेट को इससे आश्चर्य हुआ। उन्होंने होम्योपैथी की पुस्तकों से इसका लक्षण देखना चाहा। वहां लिखा था कि रोगी को अंग छूने को बर्फ-सा ठंडा होता है और फिर भी वह अंग पर बाहर ठंडक पसंद करता है। गैंग्रीन के इस रोगी का पांव छूने में अत्यन्त ठंडा था, परन्तु वह उसे बिस्तर से बाहर रखकर उस पर ठंडे पानी की पट्टी लगाता रहता था। डॉ० चैरेट तो एलोपैथ थे, इसलिये इस लक्षण को उन्होंने कोई महत्व नहीं दिया था, परन्तु अब रोगी को सिकेल कौर से आश्चर्यजनक तौर पर ठीक हुआ देखकर इस लक्षण के महत्व को उन्होंने समझा और इसके बाद वे एलोपैथ से होम्योपैथ हो गये। ये एक फ्रांसीसी डॉक्टर थे जिन्होंने आगे चलकर होम्योपैथी में बड़ा नाम कमाया।

(8) हाथ-पैर की अंगुलियां अलग-अलग फैल जाती और उल्टी तरफ मुड़ जाती है – हिस्टीरिया में इस औषधि का एक विलक्षण-लक्षण यह है कि रोगी की हाथ-पैर की अंगुलियां अलग-अलग फैल जाती हैं, और उल्टी तरफ टेढ़ी हो जाती हैं। क्यूप्रम में हाथ की अंगुलियां अन्दर की तरफ मुड़ती हैं।

(9) शक्ति तथा प्रकृति – secale cornutum 6, secale cornutum 30, secale cornutum 200 (औषधि ‘गर्म-प्रकृति के लिये है)

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