हृदय का कार्य – हृदय चक्र – हृदय प्रणाली

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हृदय एक बन्द मुट्ठी के आकार का अदभुत यन्त्र है। यह अनैच्छिक मांसपेशियों से बना हुआ एक थैला सा है जो शरीर के बाँयी ओर स्थित है। इसके दोनों तरफ फेफड़े रहते हैं। हृदय दोनों फेफड़ों के बीच में, वक्ष के भीतर रहता है। युवावस्था में मानव-हृदय साढ़े चार इंच लम्बा, साढ़े तीन इंच चौड़ा और ढाई इंच मोटा होता है। इसका भार पुरुषों में 10-12 औंस तथा स्त्रियों में 8-10 औंस होता है। इसका 1/3 भाग मध्य रेखा के दांई ओर 2/3 भाग बाँयी ओर रहता है।

हृदय माँस का बना हुआ एक थैला सा है जिसमें रक्त भरा रहता है । यह भीतर से एक माँस के द्वारा दाहिनी और बाँयी दो कोठरियों में बँटा हुआ है। दाँयी ओर हमेशा अशुद्ध रक्त होता है और बाँयी ओर शुद्ध रक्त रहता है। इन दोनों कोठरियों का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं होता है। प्रत्येक कोठरी की दो मंजिलें होती हैं।

ऊपर की मंजिल को ग्राहक कोष्ठ (Auricle) और नीचे की मंजिल की क्षेपक कोष्ठ (Ventricle) कहते हैं। ग्राहक का अर्थ है – ‘ग्रहण करने वाला’ । क्षेपक का अर्थ है – ‘देने वाला’ । इस प्रकार हमारे हृदय में निम्नलिखित चार कोठरियाँ होती हैं :-

(1) दाहिना ग्राहक कोष्ठ (Right Auricle)
(2) दाहिना क्षेपक कोष्ठ (Right Ventricle)
(3) बाँया ग्राहक कोष्ठ (Left Auricle)
(4) दाहिना क्षेपक कोष्ठ (Left Ventricle)

नोट – हृदय को एक कोष्ठांग के रूप में तथा कोठरियों को अर्थात् प्रकोष्ठों को 2-2 अलिन्द तथा 2-2 निलय के रूप में हिन्दी में जाना जता है। इनको इस प्रकार से सम्बोधित करते हैं – दक्षिणालिन्द, वामालिन्द, दक्षिण निलय, वाम निलय। पुरुषों का हृदय 280 से 340 ग्राम वजन का तथा महिलाओं का 230 से 280 ग्राम का होता है।

उपर्युक्त चार कोठरियों के बीच में माँस का एक किवाड़ (Valve) लगा रहता है, इसी किवाड़ के कारण रक्त ऊपर से नीचे को (अर्थात् ग्राहक कोष्ठों से क्षेपक कोष्ठों में) जा तो सकता है किन्तु नीचे से ऊपर को (क्षेपक कोष्ठों से ग्राहक कोष्ठों में) नहीं जा सकता है। क्षेपक कोष्ठ की रक्त धारक शक्ति अर्थात् केपिसिटी 60 से 70 ग्राम के लगभग होती है, किन्तु ग्राहक कोष्ठों की क्षेपक कोष्ठों से कुछ कम होती है।

हृदय के कोष्ठों में कई रक्त नलिकाएँ होती हैं। दाहिने ग्राहक कोष्ठ में ऊपर की ओर उर्ध्व महाशिरा (Superior Vena Cava) (इसे उत्तरा महाशिरा भी कहते हैं) और नीचे की ओर अधोगा महाशिरा (इसे अधरा महाशिरा भी कहते हैं) तथा अँग्रेजी में (Inferior Vena Cava कहते हैं) खुलती है। उर्ध्व महाशिरा अशुद्ध रक्त को सिर, उर्ध्व शाखाएँ (Upper Limbs) और वक्ष के तथा अधोगा महाशिरा शरीर के नीचे के भागों से रक्त एकत्र करके लाती हैं।

हृदय के बाँये ग्राहक कोष्ठ में 4 फुफ्फुसीय शिरायें (Pulmonary Veins) खुलती है । दाँये ग्राहक कोष्ठ से फुफ्फुसियाँ धमनी (Pulmonary Artery) निकलती हैं । बाँये क्षेपक कोष्ठ के ऊपरी मोटे भाग में वृहद धमनी (Pulmonary Artery) को छोड़कर शरीर में जितनी भी धमनियाँ (Arteries) हैं वे सब वृहद धमनी (Aorta) से ही निकलती हैं। इसीलिए वृहद धमनी को महा धमनी के नाम से भी जाना जाता है।

इस प्रकार की रचना के साथ हृदय का मूल भाग दाँई तीसरी पसली की उर:फलक सन्धि से प्रारम्भ होकर दूसरी पसली की उर:फलक सन्धि के समीप तक फैला रहता है। इसका अग्रभाग बाँई तरफ पाँचवी और छठी पसली के अन्तराल में मध्य रेखा के 4 अंगुल बाहर की तरफ दिखाई देता है और स्पर्श के द्वारा सदा धड़कता हुआ अनुभव होता है। युवा व्यक्ति के हृदय का परिमाण 25 से 30 तोले तक होता है। स्त्रियों का हृदय छोटा प्राय:20 तोले या इससे कुछ अधिक हुआ करता है। हृदयावरण (पैरिकार्डियम) द्वारा आवृत रहता है यह उरोडस्थि के पीछे इस प्रकार रहता है कि व्यक्ति के शरीर की मध्यरेखा के दाँई ओर इसका एक तिहाई भाग तथा शेष भाग बाँयी ओर रहता है। शिखर से आधार तक हृदय की लम्बाई 12 सेन्टीमीटर होती है। इसका सबसे चौड़ा अनुप्रस्थ भाग 8 सेंटीमीटर का होता है तथा आगे से पीछे की ओर इसकी मोटाई 6 सेमी होती है। यह माप एक वयस्क व्यक्ति का है।

हृदय की पश्चवर्ती (Posterior) भाग आधार (Base) कहलाता है। यह कुछ-कुछ चतुष्कोणाकार या चौकोर होता है । इसका मुख पीछे तथा दाहिनी ओर को होता है। जब व्यक्ति सोया हुआ होता है तब आधार पाँचवी से आठवीं वक्ष कशेरुका तक आता है किन्तु बैठी हुई अवस्था में 6-7 वीं वक्ष कशेरुका तक इसका फैलाव होता है।

हृदय संकोच-विकास से रक्त को सदैवगतिमान रखता है अर्थात् हृदय रक्त परिचालक यन्त्र (Pump) है। इस पर मानसिक दु:ख अथवा क्रोध, प्यार, निडरता, कायरता इत्यादि का प्रभाव पड़ा करता है। यह वक्ष के वाम पार्श्व में अवस्थित होता है, इसके दोनों ओर दाँया और बाँया फुफ्फुस होता है। उसके सामने उर:फलक और बाँयी ओर दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवी पसलियाँ होती हैं। उसके पीछे अन्ननलिका, वृहद धमनी और रीढ़ होती है। नीचे की ओर महा प्राचीरा पेशी होती है जिस पर हृदय आश्रित रहता है। महा प्राचीरा के नीचे उदर गुहा में हृदय के बाँयी ओर प्लीहा और दाँयी ओर यकृत होता है। हृदय से समस्त शरीर को प्राण देने वाली वाहिनियाँ भी सम्बन्धित रहती हैं । हृदय के संकोच-विकास से इन वाहिनियों के द्वारा सम्पूर्ण शरीर को रक्त पहुँचता है और शरीर की कोशिकाओं को चैतन्य (सजीव) रखता है । हृदय इन क्रियाओं द्वारा शरीर का धारण, पोषण और रक्षण करता है। हृदय ओज को वहन करने के कारण ओज का स्थान है । प्राण का स्थान हृदय होने से धमनियाँ प्राणवह भी कहलाती हैं।

हृदय बाहर से देखने पर कौरोनरी परिखा आलिन्दों को निलय से पृथक करती है । यह परिखा अधिक स्पष्ट नहीं है इसमें कोरोनरी वाहिनियों के प्रकाण्ड या ट्रंक रहते हैं । सामने जहाँ यह परिखा अस्पष्ट होती है वहाँ फुफ्फुसी धमनी के प्रकाण्ड का मूल इसे लाँधता है। अलिन्दों के मध्य भी एक परिखा होती है जो दोनों अलिन्दों को बाहरी तल पर अलग-अलग करती है। यह परिखा सामने तो होती है पीछे साफ-साफ दिखलायी नहीं देती है । निलय भी एक दूसरे से अग्रवर्ती अन्तर्निलय तथा पश्चवर्ती अन्तर्निलय नामक दो परिखाओं से ब्रह्मतल पर अलग-अलग की जाती है। इन परिखाओं में पहली हृदय के उर: पार्श्व तल पर उसके बाँये धरातल के पास होती है। दूसरी महाप्रचीरा तल पर दाहिने तल के पास पायी जाती है। यह परिखायें हृदय के आधार (Base) भाग से ऊपर हृदय के शिखर से कुछ दाहिनी ओर तक बढ़ जाती है जहाँ शिखरीय भंगिका या खाँच पाई जाती है।

कशेरुकाओं और हृदय के बीच में उन्हें अलग करने वाली रचनाओं में हृदयावरण (पैरिकार्डियम) दक्षिणी फुफ्फुसी शिराएँ, अन्न प्रणाली (ईसोफेगस) तथा महाधमनी होती है । हृदय के इस आधार भाग का निर्माण अधिकतर तो वाम अलिन्द करता है पर दक्षिण अलिन्द का पश्चिवर्ती भाग भी कुछ हिस्सा लेता है। यह आधार ऊपरी फुफ्फुसी प्रकाण्ड जहाँ दो भागों में बँटता है वहाँ तक जाता है। नीचे इसकी सीमा कौरोनरी परिखा पश्चवर्ती भाग तक जाती है जिसमें कौरोनरी सायनस (कौरोनली सिरा नाल) रखा रहता है। दाहिनी ओर दक्षिणी अलिन्द का गोल तल इसकी सीमा बनाता है। इसी प्रकार बाँयी ओर की सीमा वामालिन्द के वामातल की गोलाई बनाती है। चारों फुफ्फुसी शिराएँ (पल्मोनरी वेन्स) 2-2 दोनों ओर यही वाम अलिन्द में खुलती है। दक्षिणी अलिन्द के ऊपरी भाग में उर्ध्व महाशिरा (सुपीरियर वेनाकाबा) और नीचे के भाग में अधरा महाशिरा (इन्फीरियर वेनकावा) खुलती है। वामालिन्द का वह भाग जो दाहिनी व बाँयी फुफ्फुसी शिराओं के मध्य में होता है, वह हृदयावरण के तिर्यक नाल की अग्रवर्ती प्राचीर का निर्माण करता है।

हृदय का शिखर (Appex) वाम निलय द्वारा बनता है इसकी दिशा नीचे सामने और बाँयी ओर की रहती है। शिखर के वाम फुफ्फुस और फुफ्फुसावरण सामने से ढके रहते हैं। हृदय का अग्रवर्ती तल आगे ऊपर तथा बाँये उन्मुख रहता है, ऊपर और दाहिनी ओर इसका अलिन्दीय भाग रहता है । निलय भाग के नीचे की ओर तथा कौरोनरी परिखा के अग्रवर्ती भाग के बाँये पाया जाता है। अलिन्दीय भाग पूरा का पूरा दक्षिण अलिन्द से बनता है । वाम अलिन्द का अधिकांश भाग आरोही महाधमनी और फुफ्फुसी प्रकाण्ड द्वारा ढका हुआ रहने से दिखलायी नहीं देता। इस तल के निलयी भाग में से एक तिहाई भाग का निर्माण वाम निलय से और दो तिहाई भाग दक्षिण निलय द्वारा किया जाता है। अग्रवर्ती अन्तर्निलयी परिखा इन दोनों भागों को एक दूसरे से अलग करती है।

हृदय का यह तल हृदयावरण द्वारा उरोस्थिकाण्ड, उर:पर्शुकीय पेशियों तथा तीसरी से छठी उपपर्शुकाओं से अलग किया हुआ रहता है। बाँयी ओर की उपपर्शुकाओं के पास इस तल का अधिकांश भाग रहता है। दाहिनी ओर की उपपर्शुकाओं, (कास्टलार्टिलेजेज) के पास कम। इस तल पर प्लूरा तथा फुफ्फुस के पतले अग्रवर्ती भाग छाये रहते हैं। एक छोटा त्रिकोणाकार भाग छूटा रहता है जो बाँये फुफ्फुस में हृद भंगिका (कार्डियक इन्सीसूरी) कहलाता है।

हृदय का अधर तल महाप्राचीर पेशीतल (डाया फ्रैग्मेटिक सरफेस) कहलाता है। यह नीचे और पीछे की ओर उन्मुख रहता है। इसका निर्माण निलयों द्वारा होता है। निलयों में भी वाम निलय का प्रमुख भाग रहता है। यह महाप्राचीरा पेशी की केन्द्रीय कण्डरा तथा उसके बाँये पेशीय अंश के एक भाग पर रखा रहता है। कोरोनरी परिखा का पश्चवर्ती भाग इसे आधार से अलग करता है। पश्चवर्ती अन्तर्निलय परिखा इसे तिरछा-तिरछा काटती है।

हृदय का ‘वाम तल’ ऊपर, पीछे और बाँयी ओर उन्मुख रहता है। यह लगभग पूरा का पूरा वाम निलय द्वारा ही बनता है, थोड़ा-सा ऊपरी भाग वाम अलिन्द द्वारा बनता है। आगे से पीछे तथा ऊपर से नीचे की ओर यह न्युब्ज (उन्नतोदर-कान्वैक्स) होता है। यह तल ऊपर के भाग में सबसे अधिक चौड़ा होता है। जहाँ इसे कौरोनरी परिखा लाँघती है। हृदयाग्र की ओर यह तंग हो जाता है। हृदयावरण इसे फ्रैंनिक नाड़ी और उसके साथ की रक्त वाहिनियों तथा वाम फुफ्फुसावरण से अलग करता हैं । साथ ही उसके द्वारा वाम फुफ्फुस का गहरा गह्वर (Deep Hallow) भी अलग किये रहता है।

हृदय की 4 धाराएँ होती हैं जिनमें अधरा धारा को छोड़कर सभी गोल-गोल तथा अनिश्चित सी होने के कारण उन्हें ठीक-ठीक पहिचानना कठिन होता है । इस कारण दाहिनी धारा को धारा न मानकर दाहिना तल ही कह दिया जाता है । दाहिना और बाँयी धाराओं को फुफ्फुसी तल की संज्ञा दी जाती है। जबकि उर:पर्शुकीय तल का भी अधिकांश फुफ्फुस और प्लुराओं से सम्बद्ध रहता है।

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