Shighrapatan Ke Karan Aur Upay – शीघ्रपतन के कारण

मैथुन के समय वीर्य का शीघ्र स्खलित हो जाना, लिंग के योनि में प्रवेश से ही शुक्र-क्षरण हो जाना अथवा प्रेयसी का ध्यान आने एवं कामोत्तेजना मात्र से ही वीर्य स्खलित हो जाना-इन सबकी गणना शीघ्रपतन के अन्तर्गत की जाती है ।

हस्त-मैथुन अथवा बहु-मैथुन के कारणों से लिंग का निर्बल, ढीला, पतला अथवा टेढ़ा पड़ जाना, उचित रूप में लिंग का उत्थान न हो पाना, लिंग की उत्तेजना का कुछ ही क्षण में लोप हो जाना, आकस्मिक रूप से लिंग का शिथिल हो जाना-ये सब शीघ्रपतन (ध्वज-भंग) के लक्षण हैं । ध्वज-भंग के कारणों से भी शीघ्र-पतन होता है ।

अन्य कारणों में, कामेच्छा का उदभेक न होना, कामेच्छा का उदभेद होने पर भी लिंग में उत्तेजना न आना, उत्तेजित होने के बावजूद भी लिंग का मैथुन-क्रिया में प्रवृत्त न हो पाना और वीर्य-स्खलित हुए बिना ही अथवा शीघ्र वीर्य स्खलित हो जाने के कारण शिथिल पड़ जाना-ये सब नपुन्सकता अथवा नामर्दी के लक्षण हैं । ये सब लक्षण ही शीघ्रपतन को जन्म देते हैं ।

मिथ्या आहार-विहार, हस्त-मैथुन, अप्राकृतिक-मैथुन, बहु-मैथुन तथा अन्य कारणों से वीर्य का पतला पड़ जाना, वीर्य का अपने आप स्रवित होते रहना, अंशलील स्वप्न देखने के बाद स्वप्नदोष हो जाना, मन में अशलील विचारों का आते रहना और उसके कारण बिना मैथुन किये ही वीर्य-स्खलित होना, तनिक-सी उत्तेजना होते ही वीर्य-स्खलित हो जाना, श्रृंगार-रस पूर्ण उपन्यास, कहानी आदि पढ़ने तथा सिनेमा नाटक, नौटंकी आदि देखने, काम विषयक चर्चाओं में भाग लेने अथवा किसी सुन्दर स्त्री को देखने या उसका ध्यान करने मात्र से ही अपने-आप शुक्र-स्खलन हो जाना-ये सब प्रमेह रोग के लक्षण हैं और इन सबके कारण भी शीघ्रपतन रोग का जन्म होता है ।

शीघ्रपतन के अन्य कारण मानसिक होते हैं । अर्थात्-(1) अनिच्छित स्त्री के साथ सम्भोग में प्रवृत्त होना, (2) मैथुन करते समय कोई देख न ले, इस भय का संचार होना, (3) आरम्भ में अधिक मैथुन करते रहना, बाद में दीर्घकाल तक मैथुन न करना, तत्पश्चात् मैथुन-क्रिया में प्रवृत्त होना-ये सब भी शीघ्रपतन के कारण हैं । पत्नी से बहुत दिनों तक अलग रहने के बाद, फिर जब उसके साथ सहवास-क्रिया में प्रवृत्त हुआ जाता है, तब भी शीघ्रपतन हो जाता है । अत्यधिक कामोत्तेजना भी शीघ्र-पतन का एक कारण है । परस्त्रीगमन के समय लोक-लज्जा तथा भय आदि की आशंका भी शीघ्रपतन का कारण बनती है । मद्यपान तथा अन्य प्रकार के मादक-द्रव्यों का सेवन, उष्णतावर्द्धक पदार्थों का सेवन तथा वीर्य का पतला करने वाली वस्तुओं का सेवन भी शीघ्रपतन के कारण हैं।

इसी प्रकार अन्य कारणों से जब वीर्य में पतलापन आ जाता है, तब वह भी शीघ्रपतन को जन्म देता है ।

शीघ्रपतन के कारण

वीर्य के पतलेपन तथा शीघ्र-स्खलन के और भी बहुत-से कारण होते हैं, जिनमें से कुछ को नीचे लिखे अनुसार समझना चाहिए।

(1) वीर्य निकालने वाली नली में तरी तथा खुश्की के कारण जब कमजोरी आ जाती है, तब वीर्य-स्खलन जल्दी हो जाता है । इस स्थिति में वीर्य पतला तथा उसका रंग सफेद होता है और उसमें गर्मी के चिन्ह नहीं पाये जाते ।

(2) जब किसी कारणवश शरीर में रक्त तथा वीर्य उचित से अधिक मात्रा में बढ़ जाते हैं, तब भी वीर्य-स्खलन जल्दी हो जाता है । ऐसी स्थिति में वीर्य न अधिक गाढ़ा होता है और न अधिक पतला परन्तु लिंग में कड़ापन अधिक होता है ।

(3) वीर्य-नली में सुस्ती अथवा ढीलापन आ जाने से वह वीर्य रोक पाने में असमर्थ हो जाती है, ऐसी स्थिति में वीर्य अपने आप निकल जाता है । वीर्य-नली की न्यूनाधिक कमजोरी के आधार पर ही वीर्यस्खलन के समय न्यूनाधिक चेतना का अनुभव होता है ।

(4) वीर्य-वर्द्धक औषधियों के सेवन से जब शरीर में अधिक वीर्य जमा हो जाता है, तब मैथुन के समय वह शीघ्र तथा अधिक परिमाण में निकलता है । ऐसा वीर्य न अधिक गाढ़ा होता है और न अधिक पतला ।

(5) यदि वीर्य में अधिक गर्मी अथवा तेजी होती है तो उस स्थिति में शीघ्र-स्खलन होता है । ऐसे वीर्य के स्खलन के समय थोड़ी सी जलन अथवा चुभन का अनुभव होता है और उसका रंग पीला होता है। किसी-किसी को पेशाब के समय भी जलन होती है ।

(6) दिल-दिमाग आमाशय व गुर्दे आदि अवयवों के कमजोर हो जाने से भी वीर्य-स्खलन शीघ्र होता है ।

(7) कामशक्ति की कमी का मूल कारण भी शरीर में वीर्य की कमी का होना ही समझना चाहिए । कामशक्ति की न्यूनता वाले लोगों का वीर्य भी शीघ्र स्खलित होता है ।

(8) हस्त-मैथुन, अप्राकृतिक-मैथुन, बहुमैथुन, उष्ण पदार्थों के अधिक सेवन आदि पूर्व वर्णित कारणों से वीर्य जब पतला हो जाता है तब वह मैथुन के समय शीघ्र स्खलित हो जाता है । कब्ज भी शीघ्रपतन का एक मुख्य कारण है ।

(9) भय, चिन्ता, क्रोध, घृणा आदि मानसिक विकार भी शीघ्र-पतन के कारक हैं ।

आवश्यक कर्तव्य

शीघ्रपतन के रोगियों के लिए आवश्यक कर्तव्य निम्नलिखित हैं । उन्हें इनका पालन अवश्य करना चाहिए

(1) शीघ्रपतन का कारण – कब्ज, तरी, खुश्की अथवा सर्दी हो तो सर्वप्रथम कोई अच्छी दस्तावर, औषध लेकर कोठा साफ कर लेना चाहिए। कोष्ठ शुद्धि हो जाने पर रोग दूर होने में सफलता मिलेगी । दस्तावर औषध से शरीर शुद्ध हो जाने के बाद ही किसी धातु पुष्टिकर अथवा बाजीकरण औषध का सेवन करना चाहिए अन्यथा ऐसी औषध लाभ नहीं करेगी ।

(2) कोष्ठ-शुद्धि के लिए जुलाब के साथ ही यदि आवश्यक हो तो किसी वमनकारक औषध का भी सेवन करना चाहिए, ताकि शरीरस्थ कफ-विकार बाहर निकल जाये ।

(3) शरीर में रक्त तथा वीर्य की अधिकता के कारण शीघ्रपतन हो तो फस्द खोलना, भोजन की मात्रा घटा देना, माँस तथा शराब आदि पदार्थों का सेवन न करना, शिकन्जी, मीठे अनारों का रस, नारंगी अथवा अंगूर का शर्बत, सिरका, मसूर आदि पदार्थों का सेवन करना तथा अधिक स्त्री-प्रसंग करना हितकर रहता है ।

(4) पित्त-वर्द्धक आहार-विहार के कारण शीघ्रपतन हो और वीर्य निकलते समय जलन आदि का अनुभव होता हो तो शर्बत खसखस, ईसबगोल की भूसी को सुबह ही फाँककर ऊपर से धारोष्ण दूध पीना आदि उपचार करने चाहिए ।

(5) शारीरिक अवयवों की कमजोरी के कारण शीघ्रपतन की शिकायत हो तो बल-वीर्यवद्धक एवं दिल-दिमाग में तरावट लाने वाले पदार्थो-फल, बादाम, मलाई, उड़द की दाल, खीर, मक्खन, गेहूँ की रोटी, शहद, सूजी का हलुआ, मेवे की खिचड़ी, पेठे की मिठाई, आलू, परवल का साग आदि प्रभृति पदार्थों का अधिक सेवन करना चाहिए । खूब नींद भरकर सोना चाहिए, मैथुन का परित्याग कर देना चाहिए । बाग-बगीचों की सैर, संगीत-गायन में अभिरुचि तथा चित्त को प्रसन्नता प्रदान करने वाले उपायों का आश्रय लेना चाहिए ।

(6) मैथुन के समय भय, लज्जा, संकोच, क्रोध, ईष्र्या, घृणा आदि भावनाओं को मन में तनिक भी स्थान नहीं देना तथा स्वयं को पुन्सत्वहीन कदापि अनुभव नहीं करना चाहिए ।

(7) वृद्धा, कुरूपा, गन्दी, बहुत बड़ी आयु वाली, कर्कशा, वेश्या तथा कफ-प्रवृत्ति वाली स्त्रियों के साथ मैथुन नहीं करना चाहिए ।

(8) हस्त-मैथुन, अप्राकृतिक-मैथुन, बहु-मैथुन आदि दुष्कर्मो को त्याग देना चाहिए ।

(9) कामोत्तेजक कार्यो, चिन्तन, अध्ययन एवं दृश्यावलोकनों का परित्याग कर देना चाहिए ।

(10) भोजन ऐसा करना चाहिए, जो सुपाच्य होने के साथ ही पौष्टिक भी हो ।

(11) वीर्य-विकार, शुक्र-ताराल्य, प्रमेह तथा नपुन्सकता आदि कारणों के निवारणार्थ उचित औषधियों का सेवन करना चाहिए ।

(12) यदि लिंग शिथिल पड़ गई हो अथवा हस्तमैथुन अथवा बहुमैथुन के कारण छोटी, ढीली, टेढ़ी और पतली हो गई है, उसमें कम उत्तेजना होती हो अथवा उस पर नसें उभर आई हो तो लिंग-पुष्टिकर, तिला, लेप, तेल आदि का मर्दन करना चाहिए ।

(13) बाजीकरण तथा स्तम्भक औषधियों का आवश्यकतानुसार सेवन करना चाहिए । परन्तु इन्हें सेवन करते रहने का आदी नहीं बनना चाहिए । ऐसे उपाय करने चाहिए, जिससे धातु पुष्ट होकर स्तम्भन-शक्ति में स्वाभाविक वृद्धि हो ।

(14) व्यायाम, टहलना, धूप -स्नान, ठण्डे जल से स्नान, शारीरिक अंगों की पूर्णतः सफाई, चित्त की प्रसन्नता, सुपाच्य तथा पुष्टिकर भोजन व् संयम – ये सभी रोगों में हितकर है, अतः शीघ्रपतन के रोगियों को भी इन नियमों का पूरा पूरा पालन करते रहना चाहिए।

Comments (2)
Add Comment
  • Mohammed Javed

    I need homeopatheic medicine name to cure the problem of premature ejaculation also my penis is to small due to some child hood sickness could not growth please give the name of any oil to develop this.

    • Dr G.P.Singh

      Don’t be dis hearten. Every thing is possible in this world if you try patiently. you write to us your problem as we want for facilitating in the direction of selection of medicine to be beneficial for you. For this either you try to write us in detail (ie details of your disease, your ht. your colour your age,effect of coldness and heat, hurydness, fear, anger,sensitivity etc. or try to meet the doctor at Patna. For immediate relief you may try Lycopodium 200 at 7 days interval, Acid Phos 30 in morning and Nux Vomica 30 at bed time daily . May God bless you.