सिना (cina) होम्योपैथिक दवा

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(1) पेट में कीड़ों की दवा – यह मुख्य तौर पर बच्चों की दवा है। इसे प्राय: कृमि-धातु के बच्चों के लिये प्रयुक्त किया जाता है। ये कृमि गोल और गिंडोये जैसे (Round worms) होते हैं। कैन्ट का कहना है कि यह औषधि Thread worms के लिए नहीं है। Thread worms वे छोटे-छोटे कृमि हैं जो बच्चों के मल-द्वार से बाहर आते-जाते रहते हैं, और गुदा-प्रदेश में सुर्खी और चिरमिराहट पैदा करते हैं। उनका कहना है कि इसे कृमि की औषधि समझ कर ही दे देना उपयुक्त कारण नहीं है। इस औषधि को देने के मुख्य-कारण दो होने चाहियें : एक तो बच्चे का नाक की खुजली के कारण नाक में बार-बार ऊँगली घुसेड़ते रहना, यहां तक कि कभी-कभी खुजलाते-खुजलाते खून तक निकाल डालना, सोते हुए दांत किटकिटाना या सोते हुए चौक उठना, अंगों का थर-थराना, फुदकना; और दूसरा, कैमोमिला की तरह चिड़चिड़ा होना। अपने मानसिक स्वभाव के कारण बच्चा नर्स को लात मार देता है, हर समय गोद में रहना चाहता है, झूले में झुलाया जाना चाहता है, कभी यह और कभी वह वस्तु चाहता है, परन्तु जब दी जाय तब लेने से इन्कार कर देता है। डॉ० नैश लिखते हैं कि वे टाइफॉयड के एक बच्चे का इलाज कर रहे थे, टाइफॉयड के लिये पुस्तकों में जितनी दवाएं लिखी गई हैं वे सब दी गई, परन्तु रोगी ठीक नहीं हो रहा था। लक्षण उसके सिना के थे, परन्तु यह औषधि कहीं टाइफॉयड के लिये किसी पुस्तक में निर्दिष्ट नहीं थी। अंत में लक्षणों के आधार पर उन्होंने सिना की ही कुछ मात्राएं दीं और वह ठीक हो गया। इससे यह बात और पुष्ट हो गई कि होम्योपैथी में चिकित्सक को रोग के नाम से चिकित्सक न करके लक्षणों के आधार पर चिकित्सा करनी चाहिये। डॉ० नैश का कथन है कि यह औषधि 200 शक्ति में अच्छा काम करती है।

(2) सिना तथा कैमोमिला की तुलना – सिना और कैमोमिला के स्वभाव में बहुत-कुछ समानता पायी जाती है, परंतु इन दोनों में अंतर है। सिना का बच्चा सदा भूख-भूख चिल्लाता है। खाने के बाद फिर भूखा, उसकी भूख कभी संतुष्ट नहीं होती। यह बात कैमोमिला में नहीं है। सिना के बच्चे की दोनों गालों का रंग गर्म-लाल होगा, मालूम पड़ेगा बड़ा स्वस्थ है, कभी फीका, रोगग्रस्त होगा, मालूम पड़ेगा की कब का रोगी है, कभी एक-साथ लाल-पीला होगा – गाल लाल परन्तु मुख तथा नाक के आस-पास फीकापन। यह सिना का मूर्त-रूप है। अगर चेहरा एक गाल में लाल-गर्म हो, और दूसरी गाल में फीका और ठंडा हो, तो यह कैमोमिला का लक्षण है। इन लक्षणों के साथ नाक का खुजलाना, सोते हुए दांत किटकिटाना और अंगों का थरथराना अलग लक्षण हैं जो कैमोमिला में नहीं है। सिना के बच्चे के पेशाब को रखा जाय, तो कुछ देर के बाद उसका रंग दूधिया हो जाता है, कैमोमिला का पेशाब पीला रहता है।

सिना औषधि के अन्य लक्षण

(i) बिस्तर में पेशाब – कृमि की खुजलाहट की वजह से यह बच्चा रात को बिस्तर में पेशाब कर देता है। बिना कृमियों के भी पेशाब कर देने को यह ठीक कर देता है।

(ii) अंगों का थरथराना और ऐंठन – कृमि की वजह से सोते समय इस बच्चे के अंग थरथराते हैं, ऐंठन हो जाती है। सिना द्वारा कृमि मर नहीं जाते, परंतु शरीर का विकास इस प्रकार का होने लगता है कि उसमें कृमि पनप नहीं पाते। कुछ कृमियों के नाश से और कृमि पैदा हो सकते हैं, परन्तु शरीर का ‘धातु-क्रम’ (Constitution) बदल देने से कृमियों का उत्पन्न होना रुक जाता है।

(iii) गिंडोये-जैसे कृमि – बच्चों के पेट में तीन प्रकार के कृमि होते हैं: Thread worms, गिंडोये जैसे गोल-गोल कृमि और टेप जैसे लम्बे कृमि (Tape worms) इनमें से गिंडोये जैसे कृमियों के लिये सिना काम करता है, अन्य कृमियों के लिये नहीं। चिलूणे वे छोटे-छोटे कृमि हैं जो मल-द्वार से बाहर आते-जाते रहते हैं, और बच्चे के गुदा प्रदेश में खुलाहट पैदा करते हैं। इसका इलाज यह है कि बच्चे के गुदा-प्रदेश में ओलिव ऑयल लगा दिया जाय। ये चिलूणे कुछ खाने के लिए और अपने वंश की वृद्धि के लिए बाहर आते हैं। ओलिव ऑयल के कारण वे अपना काम नहीं कर पाते और धीरे-धीरे नष्ट हो जाते हैं। टेप-कृमि बहुत ही लम्बे होते हैं। ये प्राय: मांसाहारियों के पेट में पाये जाते हैं। इनको नष्ट करने का दूसरा ही उपाय है। इन कृमियों को बड़े कद्दू का बीज खाने का बड़ा शौक होता है। बच्चे को भूखा रख कर घंटे-घंटे बाद बड़े कद्दू की छिलके रहित गिरी तीन-चार बार खिला दी जाती है। ये टेप-वर्म उसी गिरी को बड़े शौक से खाते हैं और बेहोश हो जाते हैं। या तो ये स्वयं निकल जाते हैं या कैस्टर ऑयल देने से ये निकल जाते हैं। जब ये निकल रहे हों तब एक बात का ध्यान रखना चाहिये कि कृमि जब निकले तब उसे सारे-का-सारा निकलने देना चाहिये, नहीं तो वह बीच में टूट जाता है, और बचा हुआ हिस्सा बढ़ कर फिर पूरा कृमि बन जाता है।

चिलूंणे और गोल कृमि के लिये चेलोन उत्तम औषधि है। इस औषधि के मूल-अर्क के 4-5 बूंद देने से ये दोनों प्रकार के कृमि नष्ट हो जाते हैं। कई चिकित्सक बच्चों के पेट के कृमियों के लिये इसी औषधि का प्रयोग करते हैं और उनका कहना है कि इससे उन्हें बहुत सफलता मिलती है।

(4) शक्ति – 30, 200

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