डिफ्थेरिनम [ Diphtherinum Homeopathic Medicine In Hindi ]

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[ यह डिफ्थीरिया के बिष से बनी हुई एक दवा है। ऐलोपैथ चिकित्सकगण डिफ्थीरिया की बीमारी में जैसे ‘ऐण्टि-टॉक्सिन’ इन्जेक्शन दिया करते हैं, उसी तरह होम्योपैथी में हमलोग भी कुछ शक्तिकृत दवाएं ‘ऐण्टि-टॉक्सिन’ के रूप में सेवन कराकर कितने ही जगहों में आशा से अधिक फायदा उठाते है ] –डिफ्थीरिया की प्रधान दवा – मर्क्युरियस, सियानेटस, फाइटोलेक्का, कैलि बाइक्रोम, लैक कैनाइनम, ऐसिड कार्बोलिक, ऐसिड म्युर, ऐसिड नाइट्रिक, एपिस, कैलि क्लोर, लैकेसिस इत्यादि अनेक प्रकार की दवाओं में से लक्षण-अनुसार कोई एक या कई एक व्यवहार करके जब उनसे पूरा फायदा होते न देखे और बीमारी की लक्षण बढ़ती हुई पायें तो तुरंत – डिफ्थेरिनम उच्च क्रम की एक मात्रा देकर दो-एक दिन राह देख सकते है l

गले के भीतर अच्छी तरह परीक्षा कर के तथा अन्य लक्षणों से जब यह तय हो जाय कि बीमारी वास्तव में डिफ्थीरिया ही है, तो – डॉ० ऐलेन का उपदेश है कि पहले ही डिफ्थेरिनम 200 या 1M शक्ति की एक मात्रा देनी चाहिये। उनका कहना है कि इतने ही से बीमारी की तेजी घट जायगी, और ऐसा भी हो सकता है कि किसी दूसरी दवा की ज़रुरत ही न पड़े। रोगी, थोड़े ही समय में धीरे-घीरे आरोग्य ही जायगा। इस दवा की 30 से नीची शक्ति व्यवहार करने से लाभ के बदले हानि की सम्भावना अधिक है ; और साथ ही-कभी इसका दुबारा प्रयोग भी नहीं करना चाहिये। डिफ्थेरिनम के प्रधान लक्षण है – बीमारी शुरू से ही घातक रुप धारण कर लेती है, सर्वाइकल ग्लैंड ( गले की ग्रंथि) और जीभ फूल जाती है, जीभ लाल हो जाती है और ज्यादा मैली नहीं रहती; नाक, मुँह और थूक, बलगम इत्यादि सभी स्रावों और श्वास-प्रश्वास में बड़े जोर की सड़ी बदबू रहती है, तालु-मूल और उसके अगल-बगल की जगह फूल जाती हैं और काली दिखाई देती है, झिल्ली मोटी और उसका रंग काला हो जाता है । रोग आरम्भ होते ही नाक से खून निकलता है और बहुत कमजोरी हो जाती है, शरीर का ताप स्वाभाविक की अपेक्षा भी घट जाता है, नाड़ी तेज और क्षीण हो जाती है, रोगी अर्द्ध-चेतन अवस्था में पड़ा रहता है, कोई भी पीने की चीज सहज में पी लेता है किंतु पीने के बाद या तो कै हो जाती है या नाक से बाहर निकल जाती है।

डिफ्थीरिया आरोग्य हो जाने के बाद अगर पक्षाघात ( लकवा ) हो जाय, तो भी इससे फायदा होता है।

डिफ्थेरिनम – डिफ्थीरिया रोग की प्रतिषेधक दवा हैं। डॉ ० ऐलेन ने एक जगह कहा है – उन्होंने पच्चीस वर्ष के अन्दर प्रतिषेघक ( preventive ) दवा के रूप में जिन रोगियों को ‘डिफ्थेरिनम‘ सेवन कराया है, उनमें से किसी को भी डिफ्थीरिया नहीं हुआ।

क्रम – 200 से ऊंची शक्ति।

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