Homeopathic Medicine For Gangrene In Hindi [ गैंग्रीन का होम्योपैथिक इलाज ]

1,906

माँस के सड़ाव को ‘गैंग्रीन‘ कहा जाता है। जब किसी जख्म (घाव) में माँस सड़ने लगे तो उसे इसी रोग का लक्षण समझकर चिकित्सा करनी चाहिए।

इस रोग में लक्षणानुसार निम्नलिखित औषधियाँ लाभ करती हैं :-

लैकेसिस 30, 200 – फोड़ा होने अथवा चोट लगने के पश्चात् यदि वह स्थान नीला पड़ जाय अथवा उसमें से नीला मवाद या रक्त निकलने लगे, फोड़े के किनारे बाहर की ओर उभर कर, ऊपर की ओर उल्टे मुड़ने लगें, फोड़े को छुआ न जा सके, रोगी का शरीर ठण्ड के कारण ठिठुरता हो तथा हाथ-पाँव ठण्डे हो गये हों या उसके स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ गया हो, तब इस औषध का प्रयोग करना चाहिए । ‘लैकेसिस 6‘ का लोशन तैयार करके एक या दो ड्राम की मात्रा में जख्म पर लगाना चाहिए ।

एकिनेशिया Q – यह औषध रक्त को शुद्ध करती है। इसके मूल-अर्क को 1 से 10 बूंद तक की मात्रा में लक्षणानुसार प्रति दो घण्टे के अन्तर से देना चाहिए। रक्त दूषित हो गया हो, सैप्टिक की अवस्था हो तथा गैंग्रीन हो तो – ऐसी स्थिति में यह औषध विशेष लाभ करती है। इसे सम-भाग जल में मिलाकर तथा उसमें भिगोई हुई कपड़े की पट्टी को घाव के ऊपर रखना चाहिए।

ऐन्थ्राक्सीनम 30 – जिन फोड़े-फुन्सियों के केन्द्र में पस भरा हो, उनके लिए यह औषध लाभकारी है। सड़े तथा गन्दे फोड़े एवं एक के बाद एक निकलने वाले दुर्गन्धित गन्दे फोड़ों में इस औषध के प्रयोग से लाभ होता है ।

एकोनाइट 30 – यदि सड़े फोड़े (जख्म) के साथ तीव्र ज्वर हो, त्वचा खुश्क तथा गरम हो, प्यास, बेचैनी एवं परेशानी के लक्षण हों, रोगी यह कहता हो कि अब उसके बचने की आशा नहीं है, तो इस औषध का प्रयोग बहुत लाभ करता है ।

बेलाडोना 30 – यदि सड़े फोड़े अथवा घाव के रहते हुए रोगी को डिलीरियम हो जाय एवं चेहरा लाल तथा तमतमाया हुआ हो तो इस औषध का प्रयोग करें ।

आर्सेनिक 30 – वृद्ध-व्यक्तियों की खुश्क गैंग्रीन में यह औषध लाभकारी है। रोगाक्रान्त स्थान में जहाँ जलन तथा दुखन हो, वहाँ यदि गरम सेंक से रोगी को आराम मिलता हो तो इस औषध का उपयोग करना चाहिए। इस औषध के रोग में सड़न के साथ जलन तथा कतरने जैसा दर्द होता है, जिसके कारण रोगी को ऐसा प्रतीत होता है, मानो उस जगह पर दहकते हुए अंगारे रखें हों। यदि सामान्य जलन हो तो यह औषध लाभ नहीं करती । इस औषध के रोग में फोड़े का रंग नीला अथवा काला होना आवश्यक है। जलन के साथ दर्द, बेचैनी, घबराहट तथा प्यास के लक्षण होने भी आवश्यक हैं ।

कार्बोवेज 30 – यदि रोगाक्रान्त स्थान बर्फ की भाँति ठण्डा तथा नीला-सा हो, पाँवों में पसीना आता हो, परन्तु इन लक्षणों के साथ बेचैनी न हो तो इसका प्रयोग करना चाहिए। वृद्ध मनुष्यों की पाँव की अंगुलियों से आरम्भ होकर ऊपर की ओर जाने वाली ‘गैंग्रीन’ में यह विशेष हितकर है ।

सिकेलि-कोर – रक्त के त्वचा में कहीं ठहर जाने पर यदि वह स्थान सड़ने लगे (ऐसा प्राय: अँगुलियों में हुआ करता है) तथा अन्य खुश्की के लक्षण ‘आर्सेनिक’ जैसे होते हुए भी ठण्ड से आराम मिलता हो (‘आर्सेनिक’ की भाँत गर्मी से नहीं) तो इस औषध का प्रयोग लाभकर सिद्ध होता है ।

टिप्पणी – गुदा का ‘नासूर’ भी एक प्रकार का व्रण ही है, जो त्वचा के आर-पार होता है । नासूर में ‘सल्फर 30’ का प्रयोग पहले किया जाता है, तत्पश्चात् लक्षणानुसार अन्य औषधियाँ दी जाती हैं।

Ask A Doctor

किसी भी रोग को ठीक करने के लिए आप हमारे सुयोग्य होम्योपैथिक डॉक्टर की सलाह ले सकते हैं। डॉक्टर का consultancy fee 200 रूपए है। Fee के भुगतान करने के बाद आपसे रोग और उसके लक्षण के बारे में पुछा जायेगा और उसके आधार पर आपको दवा का नाम और दवा लेने की विधि बताई जाएगी। पेमेंट आप Paytm या डेबिट कार्ड से कर सकते हैं। इसके लिए आप इस व्हाट्सएप्प नंबर पे सम्पर्क करें - +919006242658 सम्पूर्ण जानकारी के लिए लिंक पे क्लिक करें।

Loading...

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.