पुराने सिर और आँख के दर्द का होम्योपैथिक इलाज | Homeopathic Treatment For Chronic Headache and Eye Pain In Hindi

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पुराने सिर और आँख के दर्द का होम्योपैथिक इलाज: आज इस लेख में हम देखेंगे कि सिर और आखों के दर्द की समस्या को होमियोपैथी से कैसे ठीक किया गया, पोस्ट को पूरा अवश्य पढ़ें, ताकि आप पूरी तरह समझ सकें।

एक रोगी आयु 32 वर्ष, जिन्हे सिर में तथा आँखों में सदा दर्द रहा करता था। दर्द की शिकायत दिनोंदिन बढ़ती जाती थी। जब दर्द शुरू होता था, तो 3 दिन से 3 सप्ताह तक बना रहता था। इतना दर्द होता था कि समझ नहीं पड़ा था कि क्या करे। सिर को छुआ नहीं जा सकता था। पिछली बार जो दर्द हुआ, तो 10 घंटे तक तकलीफ़ बनी रही और हर 10 मिनट बाद उल्टी आती रही। दर्द सदा बना रहता था, कुछ खा नहीं सकता था, इसलिए बेहद कमज़ोर हो गया था। उसका एक विलक्षण लक्षण यह था कि रोग के आक्रमण होने से पहले वह अनुभव करता था कि उसकी तबीयत बहुत अच्छी है।

उसके लक्षणों का इतिहास लेने से पता चला कि किसी खास बात से रोग के लक्षणों में कमी नहीं आती थी। जब सिर-दर्द होता था तब सिर को तकिये में धंसाता था। आँखों में कोई दोष नहीं था, उनका आँख का टेस्ट हाल ही में हुआ था। जीभ पर दाँतों के निशान पड़ते थे। खाना खाने के बाद महसूस करता था कि दम घुटने लगा है जिससे सिर-दर्द और बढ़ता जाता था। चर्बी, घी-दूध के प्रति अनिच्छा थी। 8 बजे ही नींद आने लगती थी और बहुत उत्तेजना वाले स्वप्न आते थे। कहीं-कहीं से बाल झड़ते थे। गर्मी तथा बिजली की गड़गड़ाहट से तबीयत बिगड़ती थी; सान्त्वना से और अधिक गुस्सा हो जाता था; अकेला पड़े रहना चाहता था। नींद के बाद सिर-दर्द बढ़ जाता था।

अब होम्योपैथिक दृष्टि से इलाज करते हैं। सबसे पहले औषधियों का ( Elimination): गर्मी से तबीयत बिगड़ती थी इसका यह अर्थ हआ कि यह रोगी ऊष्णता-प्रधान था। इसलिए शीत-प्रधान औषधियों को लिस्ट में से निकाल कर सिर्फ ऊष्णता-प्रधान औषधियों पर ही विचार किया जायेगा। जिन मख्य लक्षणों पर मुख्य विचार किया गया उन लक्षणों की औषधियाँ निम्न है :-

सान्त्वना से रोग-वृद्धि : लाइकोपोडियम; नैट्रम म्यूर (3); प्लैटिनम (2); थूजा।

अंधड़, तूफान से रोग-वृद्धि : ऑरम; ब्रायोनिया; कैलि बाइकार्ब (2); लैकेसिस (2); लाइकोपोडियम (2); नैट्रम म्यूर; पल्साटिला; सल्फर; थूजा; टुबरकुलीनम।

चर्बी पदार्थों में अरुचि : ब्रायोनिया; नैट्रम म्यूर (2); प्लेटिना (3); पल्साटिला (3); सल्फर (2)।

दूध के प्रति अरुचि : ब्रायोनिया (2); पल्साटिला (2); सल्फर (2)।

नींद के बाद सिर-दर्द बढ़ जाना : अर्जेन्टम नाइट्रिकम; ऑरम (2); ब्रायोनिया (2); कैली बाइक्रोम (2); लैकेसिस (3); लाइकोपोडियम (2); नैट्रम म्यूर (3); पल्साटिला; सल्फर (2); थूजा (2)

अब निष्कर्ष निकलते हैं : उक्त औषधियों में हमने देखा कि लैकेसिस 2 बार ; लाइकोपोडियम 3 बार ; नैट्रम म्यूर 4 बार, पल्साटिला 4 बार; सल्फ़र भी 4 बार; और थूजा 3 बार आया है। अब इन औषधियों में नैट्रम म्यूर तथा पल्साटिला पर ही विचार किया जा सकता है क्योंकि दोनों के लक्षण आस-पास हैं। परन्तु रोगी को सान्त्वना से रोग में वृद्धि होती थी,जब कि पल्साटिला सान्त्वना चाहता है, इसलिए इस मानसिक लक्षण के आधार पर पल्साटिला इस रोगी की औषधि नहीं हो सकती थी। इस प्रकार नैट्रम म्यूर ही क्षेत्र में रह जाती थी जिसमें सान्त्वना से रोग का बढ़ जाना पाया जाता है।

रोगी को नैट्रम म्यूर 30 की 2 बून्द दिन में 3 बार मैंने लेने को कहा। सिर्फ एक दिन ही दवा लेने को मैंने कहा था, फिर दवा को बंद कर देना था। 15 दिन बाद उसने कहा कि 1 हफ्ते से उसे सिर-दर्द नहीं हुआ, परन्तु अभी भी तबीयत अच्छी नहीं मालूम होती। सर्दी लग गई थी, जुकाम हो गया था, सिर भारी रहता है। उसे कोई दवा नहीं दी, मैंने कहा एक हफ्ते और इंतज़ार करें। एक हफ्ते बाद उसने आकर कहा कि सिर-दर्द का एक हमला इस बीच हुआ परन्तु उसे हफ्ते भर लेट जाना पड़ता था, इस बार ऐसा नहीं हुआ। उसने कहा कि वह अपने को स्वस्थ अनुभव करता है। स्वप्न वैसे ही आते हैं जैसे पहले आते थे; बाल जो जगह-जगह से झड़ते थे उनमें कोई फ़र्क नहीं आया।

फिर से मैंने उसे नैट्रम म्यूर 30 की 2 बून्द दिन में 3 बार लेने को कहा। दवा इसलिए दी गई क्योंकि इस बीच उसे फिर से सिर-दर्द का दौरा पड़ा था। 15 दिन के बाद उसने कहा कि इस बार सिर-दर्द के 4 आक्रमण हुए इसलिए इस बार उसे ब्रायोनिया 30 की 2 बून्द 3-3 घंटे बाद लेने को मैंने कहा और वह ठीक हो गया।

इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जब क्रोनिक रोग में कुछ लक्षण बढ़ रहे हों और वे एक्यूट रोग से लक्षण हों, तब क्रोनिक-रोगों की औषधि न देकर, एक्यूट-रोगों की औषधि देकर, रोग को शांत कर देना चाहिए। उदाहरणार्थ, इस रोगी का सिर-दर्द क्रोनिक-रोग था। नैट्रम म्यूर भी क्रोनिक रोगों में दी जाने वाली दवा है, गहराई में जाती है, इसका देर तक असर रहता है । क्योंकि रोगी नैटम म्यूर के असर में था, इस बीच उसे सिर-दर्द हो गया, तब यदि सिर-दर्द की हालत में नैट्रम म्यूर दे दिया जाता, तो उसका कष्ट और बढ़ जाता। इसलिए नैटम म्यूर जो क्रोनिक-रोगों की दवा है और जिसके असर में रोगी चल रहा था, उसे न देकर, रोगी को ब्रायोनिया दिया गया जो अल्प-कालिक दवा है। ऐसी अवस्थाओं में गहरा प्रभाव करने वाली दवा देना अनुचित है, तब ऐसे में अल्प-कालिक दवा दे देनी चाहिए ताकि गहराई में काम करने वाली दवा का असर बना रहे। इस प्रकार अगर किसी रोगी को कैलकेरिया कार्ब दिया हुआ है, और बीच में उसे उसी प्रकार के लक्षणों की दवा देने की जरूरत पड़ गई है, तो बेलाडोना दे देना उचित है, कैलकेरिया को बार-बार दोहराया नहीं जाता क्योंकि वह दीर्घ-कालिक औषधि है, बेलाडोना को बार-बार दोहराया जा सकता है क्योंकि वह अल्प-कालिक औषधि है। दीर्घ-कालिक के बीच में अल्प-कालिक दवा दी जा सकती है।

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