जटामांसी के लाभ – जटामांसी के गुण

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परिचय : 1. इसे जटामांसी (संस्कृत), बालछड़, जटामांसी (हिन्दी), जटामांसी (बंगाली), जटामांसी (मराठी), बालछड़ (गुजराती), जटामांसमु (तेलुगु), सुबुलुत्तीव (अरबी) तथा नार्डोस्टेकिस जटामांसी (लैटिन) कहते हैं।

2. इसका पौधा 1-2 इंच ऊँचा, कई वर्ष रहनेवाला और सीधा होता है। भूमि पर इसकी जड़ से 2-3 इंच लम्बी, बारीक जटाओं की तरह कई रेशायुक्त शाखाएँ निकलती हैं। इसके पत्ते पतले, लगभग 1 इंच चौड़े और 6-7 इन्च लम्बे, फूल गुलाबी, गुच्छेदार, शाखाओं के अन्त में तथा फल छोटे, गोल, रेशायुक्त होते हैं। जड़ रेशायुक्त होने के साथ सुगन्धित भी होती है।

3. यह हिमालय के वनों में 16-17 हजार फुट की ऊँचाई पर, कश्मीर, नेपाल आदि प्रदेशों में जलीय स्थानों में होती है।

रासायनिक संघटन : इसमें हरापन लिये पीला, उड़नशील, कपूर की गन्ध की तरह, कडुआ तेल मुख्य तत्व होता है। इसके अलावा राल के समान काला पदार्थ, कपूर, गोंद आदि भी पाये जाते हैं।

जटामांसी के गुण : यह रस में चरपरी, कसैली, मीठी, पचने पर कड़वी तथा गुण में तीक्ष्ण, हल्की और चिकनी होती है। इसका वातनाड़ी-संस्थान पर भूतध्न (मानसिक दोषनाशक, संज्ञास्थापक) रूप में मुख्य प्रभाव होता है। यह दाहशामक, त्वचा के रंग की ठीक करनेवाली, उत्तेजक, अग्निदीपक, यकृत की उत्तेजक, कफनिस्सारक, आर्तवजनक, केशवर्धक तथा बलप्रद है।

जटामांसी के प्रयोग

1. मानसिक विकार : इसका प्रयोग क्वाथ की अपेक्षा ‘फाण्ट’ या शीतनिर्यास के रूप में विशेष उपयोगी होता है। अत: इसका 1 तोला चूर्ण खूब उबलते आध सेर पानी में डाल ढँककर रख दें। प्रात: वह जल छानकर दिन में 4-5 बार थोड़ा-थोड़ा पिलायें। इससे अपस्मार, योषापस्मार, उन्माद आदि मानसिक विकारों में लाभ होता है।

2. हिस्टीरिया : 1-2 माशा जटामांसी के महीन चूर्ण में 4 रत्ती से 1 माशा तक श्वेत बच का चूर्ण मिलाकर शहद के साथ दिन में 3 बार सेवन कराने से हिस्टीरिया एवं मानसिक चंचलता में लाभ होता है।

3. वात रोग : 4 भाग जटामांसी के चूर्ण के साथ 1-1 भाग दालचीनी, सीतलचीनी, सौंफ और सोंठ का चूर्ण तथा 8 भाग मिश्री पीसकर मिला दें। प्रात:-सायं इसकी 3-6 माशा की मात्रा देने से वातविकार, आध्मान एवं शूल में लाभ होता है।

4. बाल झड़ना : रात में जटामांसी का एक पाव मोटा चूर्ण सेरभर पानी में भिगो दें और प्रात: मन्द आँच पर पकायें। चार भाग शेष रहने पर छानकर उसमें 1 पाव तिल्ली का तेल और 5 तोला जटामांसी का कल्क (चटनी) मिला पुन: पकायें। तेल मात्र शेष रहने पर उतार लें। इस तेल के प्रयोग से बाल झड़ना बन्द होता है, जूएँ शीघ्र नष्ट होती हैं। बाल शीघ्र बढ़ते हैं, मुलायम तथा काले रहते हैं।

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