मैग्नीशिया म्यूरियेटिका – Magnesia Muriatica

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मैग्नीशिया म्यूरियेटिका के लक्षण तथा मुख्य-रोग

( Magnesia Muriatica uses in hindi )

(1) जिगर के रोग की औषधि (Liver remedy) – इसका विशेष प्रभाव जिगर पर पड़ता है। आखें पीली पड़ जाती हैं, त्वचा पीली पड़ जाती है, जिगर के दाहिनी तरफ का हिस्सा दुखता है, दायीं तरफ लेटने से दर्द होता है, टट्टी में पीला रंग नहीं रहता, हल्के रंग की होती है, जीभ पर दाँतों के निशान पड़ जाते हैं। दांतों पर निशान मर्क्यूरियस में भी पड़ते हैं, परन्तु दोनों के मल में भेद है। मैग्नीशिया म्यूर का मल भेड़ की मेंगनियों के समान होता है, मर्क में ऐसा मल नहीं होता। मर्क जिगर के हाल ही के रोगों में इस्तेमाल होता है, मैग्नीशिया म्यूर जिगर की पुरानी मर्ज में काम देता है। प्राय: चिकित्सक हर प्रकार के रोग में फॉसफोरस और सल्फर की तरफ भागते हैं, परन्तु स्नायु-प्रधान रोगियों के लिए जो जिगर के रोग से पीड़ित हों मैग्नीशिया म्यूरियेटिका उत्तम औषधि है।

भेड़ की मेंगनियों का-सा कब्ज वाला पाखाना – यह औषधि कब्ज की बढ़िया दवा है। मैग्नीशिया कार्ब दस्तों के लिये, और मैग्नीशिया म्यूर कब्ज के लिये प्रसिद्ध हैं। इसका कब्ज विशेष प्रकार का होता है। पाखाना सख्त होता है, भेड़ की मेंगनियों के समान, गुदा के बाहर आते ही किनारे से टूट-टूट कर गिर पड़ता है, इतना सख्त होता है कि पेट की मांसपेशियों पर दबाव डालकर ही पाखाना निकलता है। यह स्मरण रखना चाहिये कि जितने म्यूरेट्स हैं सब में पाखाना खुश्क और टूट-टूट कर गिरने का लक्षण मौजूद है। नैट्रम म्यूर और एमोनिया म्यूर में भी ऐसी कब्ज है।

बच्चों को दूध न पचना – दांत निकलते समय बच्चों को प्राय: दूध नहीं पचा करता। दूध से पेट में दर्द होता है और बिना पचे ही वह निकल जाता है। बच्चे में मीठे के प्रति उत्कट चाह होती है। मैग्नीशिया कार्ब और इथूजा में भी दांत निकलते समय दूध न पचने के लक्षण है, परन्तु मैग कार्ब में दस्ते आते हैं, मैग म्यूर में कब्ज होती है, और इथूजा में दूध दही की तरह फटा हुआ निकलता है। कैलकेरिया कार्ब में भी बच्चा दूध पीकर उल्टी कर देता है, परन्तु इथूजा का विचित्र लक्षण यह है कि बच्चा उल्टी करने के बाद फिर तुरत दूध पीने लगता है, कैलकेरिया में ऐसा नहीं होता। इथूजा का बच्चा या तो दूध पीते ही उसे उगल देता है, या कुछ देर रखकर दही तरह का दूध उलट देता है, और उल्टी करते ही थकान के कारण सो जाता है।

(4) हर छटे हफ्ते सिर-दर्द होना – हर छटे हफ्ते माथे और आंखों के इर्द-गिर्द सिर-दर्द होना इसका विशेष-लक्षण है। इस सिर-दर्द में कपड़ा लपेटने से, गर्मी से आराम मिलता है, ठंडक से दर्द बढ़ता है, हरकत से भी बढ़ता है।

(5) रोगी रात को बिस्तर पर आँख बन्द कर लेटने से बेचैन हो जाता है, सो नहीं सकता – यह रोगी अत्यंत बेचैन रहता है। बड़ी मुश्किल से उसे शान्त रखा जा सकता है। अगर उसे जबर्दस्ती शान्त रखने का प्रयत्न किया जाय, तो और अधिक बेचैन हो जाता है। बेचैनी उसका प्रमुख रूप है। सारे शरीर में बेचैनी भरी पड़ी होती है, टिक कर बैठ नहीं सकता, हरकत करता रहता है। किसी समय भी यह बेचैनी प्रकट हो सकती है, परन्तु रात को बिस्तर पर लेटते समय जब वह आँखें बन्द करता है, तब तो इतना बेचैन हो जाता है कि कपड़ा उतार फेंकता हैं, गहरा सांस लेता है, और इस बेचैनी से सो नहीं सकता। आँखें मूँदते ही बेचैनी आ घेरती है। आँख मूदते ही किसी लक्षण का प्रकट होना-यह बात होम्योपैथी में ही समझ में आती है, और होम्योपैथी में ही ऐसे लक्षण का इलाज है। कोनायम में आंखें बन्द करते ही पसीना आने लगता है। डॉ० कैन्ट लिखते हैं कि गोनोरिया के एक रोगी ने उनसे कहा कि सोने के लिये आंखें मीचते ही उसे पसीना आने लगता है। इस लक्षण पर कोनायम देने से उसका पसीना ही दूर नहीं हुआ, गोनोरिया भी ठीक हो गया।

(6) समुद्र के किनारे या नमक से दमा आदि तकलीफों का बढ़ना – समुद्र के किनारे पर जाने से, नमक खाने से, नमकीन जल के स्नान से, समुद्र की नमकीन हवा में सांस लेने से दमा आदि रोग उठ खड़े हों, तो इससे लाभ होता है। अगर समुद्र के किनारे रहने से पित्ती (Urticaria) उछल आये और दूसरा कोई लक्षण न हो तो, आर्सेनिक लाभ करता है; मैग्नीशिया म्यूर की शिकायत समुद्र में जाने से होती है, समुद्र से दूर रहने पर नहीं; ब्रोमियम की शिकायत समुद्र में रहने से नहीं, समुद्र से दूर जाने पर होती है। नाविक लोग जब तक समुद्र पर रहते हैं दमा तंग नहीं करता, जब किनारे आ जाते हैं तब दमा तंग करता है तो ब्रोमियम से लाभ होता है। मैडोराइनम में समुद्र-तट से रोगी की दमा आदि शिकायतें दूर हो जाती हैं।

(7) शक्ति तथा प्रकृति – 3, 6, 200 ( औषधि ‘सर्द’-प्रकृति के लिये है)

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