मेडोराइनम – Medorrhinum

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मेडोराइनम के लक्षण तथा मुख्य-रोग

( Medorrhinum uses in hindi )

(1) गोनोरिया के दब जाने से उत्पन्न होने वाले रोग – सवा सौ साल से अधिक हुआ तब अमरीका के डॉ० स्वैन ने इस औषधि की रोगों का उपचार करने में उपयोगिता पर होम्योपैथों का ध्यान आकर्षित किया था। अमरीका के अनेक डाक्टरों ने इस विषय की अपने ऊपर ‘परीक्षा-सिद्धि (Proving) की। अधिकतर परीक्षण 5c शक्ति में किये गये थे। यह औषधि गोनोरिया का विष है इसलिये इसे गोनोरिनम भी कहते हैं। गोनोरिया की तरह सिफिलिस के विष की भी ‘परीक्षा-सिद्धि’ की गई है। इन विषों को नोसोड्स (Nosodes) कहा जाता है। डॉ० बर्नेट, जिन्हें रोगियों को लक्षणानुसार नोसोड्स देने का विशेष अनुभव था, लिखते हैं कि घृणिततम पदार्थ को अगर होम्योपैथी के नियमों के अनुसार शक्तिकृत किया जाय, तो यही नहीं कि वह दोष-हीन हो जाता है अपितु सोने के समान मूल्यवान् हो जाता है। ऐसी ही मूल्यवान् औषधियां गोनोरिया के विषय से बनी मेडोराइनम तथा सिफिलिस के विष से बनी सिफिलीनम हैं।

जिसे गोनोरिया हो वह एलोपैथिक इलाज करा कर समझता है कि रोग ठीक हो गया। असल में, रोग ठीक नहीं होता, दब जाता है, और गोनोरिया दब कर ‘वात-रोग’ (Rheumatism) को उत्पन्न कर देता है। वात-रोग से पीड़ित अनेक रोगी अपने जीवन-काल में गोनोरिया के शिकार रह चुके होते हैं। जब ये लोग विवाह करते हैं, तब उनकी स्त्री को जो विवाह से पहले बिल्कुल ठीक थी अनेक रोग हो जाते हैं। यह नहीं कि ऐसे व्यक्ति की पत्नी को गोनोरिया ही हो जाय, वह तो दब चुका होता है, परन्तु जो विष रुधिर में प्राप्त हो गया है वह पुरुष में वात-व्याधि तथा पुरुष के संगम से स्त्री में डिम्ब-ग्रंथियों में दर्द, मासिक-धर्म की गड़बड़ी, रति-क्रिया के प्रति उदासीनता, चेहरे का पीलापन, स्नायु-रोग आदि उत्पन्न कर देता है। ऐसे पुरुष-स्त्री की सन्तान में भी अनेक प्रकार के रोग हो जाते हैं। बच्चा सूखने लगता है, दमे का शिकार हो जाता है, नाक बहती रहती है, आंख के पपोटे सूजे रहते हैं, सिर में दाद, चेहरा बौनों-सरीखा होता है। इन सब रोगों में जिनका आधार पुरुष का गोनोरिया से पीड़ित होना है, या जिन रोगों में वंशानुगत गोनोरिया का विष काम कर रहा होता है, यह औषधि जादू का काम करती है। परन्तु यह समझना भूल है कि क्योंकि रोग की जड़ में गोनोरिया का विष है, और क्योंकि रोगी के इस विष को मेडोराइनम सफलता से दूर कर रहा है, इसलिये रोगी को गोनोरिया हुआ ही है।

(2) गोनोरिया न होने पर भी इसका विष रोगी की प्रकृति में, उसके रुधिर में हो सकता है – हनीमैन का कहना है कि मानव-समाज सदियों से चला आ रहा है। आदि पूर्वज को क्या रोग था – इसे कौन जानता है। माता-पिता के रज-वीर्य से वंशपरंपरा द्वारा न जाने कौन-कौन-सी प्रकृति हमें विरासत में प्राप्त होती है। तीन आधारभूत विष को माता-पिता के रुधिर में वंश-परंपरा से हमें प्राप्त हो सकते हैं, वे हैं-सोरा (Psora), साइकोसिस (Sychosis) तथा सिफिलिस (Syphilis). सोरा बड़ा विस्तृत शब्द है, और यहां इसकी व्याख्या करने का स्थान भी नहीं है। ‘साइकोसिस’ गोनोरिया के विष से उत्पन्न होने वाली प्रकृति (Dyscaria) को कहते हैं; ‘सिफ़िलिस’ का अर्थ भी उपदंश के विष से उत्पन्न होने वाली प्रकृति है। हनीमैन का कथन था कि सुनिर्वाचित औषधि देने पर भी अगर रोग ठीक नहीं होता, तो इसके तीन कारण हो सकते हैं। या तो रोगी ‘सोरा’-दोष से पीड़ित है, या ‘साइकोसिस’-दोष से पीड़ित है, या ‘सिफ़िलिस’-दोष से पीड़ित है। इन दोषों को दूर करने के लिये एन्टी-सोरिक (Anti-psoric), एन्टी-साइकोटिक (Anti-sychotic) तथा एन्टी-सफ़िलिटिक (Anti-syphilitic) औषधियां देनी पड़ती हैं। ये या तो उस विष को दूर कर रोगी को ठीक कर देती हैं, या इनके द्वारा स्वस्थ होने में बाधा डालने वाली रुकावट दूर हो जाती है, और सुनिर्वाचित-औषधि अपना काम ठीक से करने लगती है। हनीमैन ने सोरा-दोष को दूर करने वाली औषधियों में थूजा तथा नाइट्रिक ऐसिड को एवं सिफ़िलिस-दोष को दूर करने वाली औषधियों में मर्क्यूरियस सौल को मुख्यता दी थी। उनके बाद, डॉ० स्वैन के परीक्षणों से गोनोरिया विष के दोषों तथा गोनोरिया-रोग के उपद्रवों को दूर करने के लिये मेडोराइनम को भी विशेष उपयोगी पाया गया है।

(3) समुद्र-तट पर दमा; वात-रोग; ड्युडिनम के अल्सर; सिर की खुजली आदि में लाभ – इस औषधि का एक प्रमुख-लक्षण यह है कि रोगी को समुद्र-तट की हवा से लाभ होता है। समुद्र-तट पर रोग में लाभ विशेष तौर पर दमे के रोग में पाया गया है। रोगी जब समुद्र-तट पर रहने लगता है तब उसका दमा ठीक हो जाता है। इसके विपरीत ब्रोमियम में नाविक लोग जब तक समुद्र के बीच में नौका या जहाज पर रहते हैं, तब तक तो उन्हें दमा नहीं सताता, परन्तु समुद्र-तट पर आने से दमा सताने लगता है। ब्रोमियम की तरह मैग्नेशिया म्यूर में भी समुद्र-तट पर रहने से दमे की शिकायत होती है, समुद्र तट से दूर रहने पर नहीं।

‘वात-रोग’ (Rheumatism) प्राय: गोनोरिया के दब जाने से हुआ करता है। अनेक वात-रोगी जो इस कष्ट से पीड़ित रहते हैं गोनोरिया के शिकार हो चुके होते हैं। बिना गोनोरिया के भी शरीर में साइकोसिस-दोष के वंशानुगत होने से वात-रोग होता है। अगर वात-रोग में समुद्र-तट की हवा से लाभ हो, तो मेडोराइनम अमोघ-औषधि है। डॉ० टायलर लिखती हैं कि एक 60 वर्ष का वात-रोगी जो मृत्यु से भय के लक्षण की शिकायत करता था, अकेला नहीं रह सकता था, जब समुद्र-तट पर रहने गया तब उसका वात-रोग दूर हो गया। उसे मेडोराइनम 30 की एक मात्रा देने से उसका मृत्यु का भय तथा वात-रोग शीघ्र जाता रहा।

एक अन्य 38 वर्ष की स्त्री का उल्लेख करते हुए वे लिखती हैं कि उसे ड्यूडीनम का अलसर था, खाने के दो घंटे बाद पेट में दर्द उठता था, पेट फूलता था, वह 8 साल से रोग से पीड़ित थी। उसकी पेट की शिकायतें समुद्र-तट पर रहने से कम हो जाती थीं। उसे मेडोराइनम (C.M.) दिया गया जिससे सब लक्षण जाते रहे।

एक पतली-दुबली स्त्री जिसके सिर में सदा खुजली मचती थी, बाल झड़ते थे, समुद्र-तट पर उसे लाभ होता था। उसे मेडोराइनम 10M दिया गया और उसकी सब शिकायतें दूर हो गई, बाल झड़ने भी बन्द हो गये।

(4) गोनोरिया-दोष की माता-पिता की सन्तान के रोग – जो बच्चे गोनोरिया-दोष के माता-पिता से उत्पन्न होते हैं, उन्हें स्वयं तो गोनोरिया नहीं होता, परन्तु ‘साइकोसिस’ के कारण उन्हें अनेक रोग हो जाते हैं, वे सूखने लगते हैं, दमा हो जाता है, नाक बहा करती है, आंखें सूजी रहती हैं, सिर दाद से भरा रहता है, बढ़ नहीं पाते। माता-पिता से चिकित्सक को पूछ लेना चाहिये कि उनके घराने में गोनोरिया तो नहीं रहा। रहने पर इस औषधि से ये सब रोग जड़-मूल से उखड़ जाते हैं।

(5) गोनोरिया-दोष से दूषित पति से पत्नी के रोग – गोनोरिया-दोष से या साइकोसिस से पति द्वारा पत्नी को अनेक रोग हो जाते हैं। विवाह से पहले वह स्वस्थ थी, विवाह के बाद उसे डिम्ब-ग्रन्थियों में दर्द होने लगा, मासिक में गड़बड़ी आ गई, जरायु-संबंधी अनेक शिकायतें होने लगीं। ऐसी हालत में भी चिकित्सक को पति को एकान्त में बुलाकर पूछ लेना चाहिये कि उसे गोनोरिया तो कभी नहीं हुआ। साइकोसिस के दोष से ये शिकायतें हो सकती हैं। इन सबको मेडोराइनम दूर कर देता है।

(6) सोराइनम, मेडोराइनम (समुद्र तट पर ठीक), सिफिलीनम (पहाड़ पर ठीक) की तुलना – सोरा-दोष में सल्फ़र और सोरिनम, साइकोसिस-दोष में मेडोराइनम, थूजा, और नाइट्रिक ऐसिड तथा सिफ़िलिस दोष में सिफ़िलीनम, मर्क सौल लाभ करते हैं। मेडोराइनम की तकलीफें दिन को, और सिफ़िलीनम की तकलीफें रात को परेशान करती हैं। मेडोराइनम का रोगी समुद्र-तट पर, और सिफिलीनम का रोगी पहाड़ पर ठीक रहता है।

मेडोराइनम औषधि के अन्य लक्षण

(i) बच्चा तकिये पर मुंह नीचा करके, या औधे मुंह घुटनों के बल या पेट पर सोता है।

(ii) रोगी के पैरों के तलुवे नाजुक होते हैं, दर्द करते हैं; कई रोगी तो इस दर्द के कारण घुटनों के बल चलते हैं।

(iii) गोनोरिया के कारण वात-रोग (Rheumatism) में यह उत्तम दवा है।

(iv) मेरु-दंड के ऊपरी भाग में बहुत गर्मी महसूस होती है।

(v) सल्फर की तरह पैर जलते हैं और जिंकम की तरह पैर टिकते नहीं, हिलते रहते हैं।

(vi) किसी भी रोग के लक्षण दिन को प्रकट होते हैं, रात को गायब हो जाते हैं – यह विचित्र लक्षण है।

(8) शक्ति तथा प्रकृति – डॉ० कैंट लिखते हैं कि इस औषधि का निम्न-शक्ति में कभी प्रयोग नहीं करना चाहिये। गोनोरिया के रोगी को देर-देर बाद 10M शक्ति की मात्रा देना उचित है। रोगी नमी में ठीक नहीं रहता परन्तु समुद्री-हवा में ठीक रहता है।

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2 Comments
  1. Rajesh Gupta says

    मैने अपनी पत्नी को 10 वर्ष पहले मेड्होरिनम दिया था रियुमेटाइड में सारे दवा व्यर्थ होने के बाद । मेड्होरिनम 1M से जादू सा असर हुआ आजतक वह ठीक है ।

    1. Dr G.P.Singh says

      Thanks.

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