Shighrapatan Ka Gharelu ilaj – शीघ्रपतन का घरेलु इलाज

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प्रथम तो आपके शरीर के अन्दर ही जो स्नायुगत कोशिकाएँ हैं उनमें ही रोगों से लड़ने और उनको शमन करने के लिए औषधियाँ छिपी हैं जिनसे प्रकृति स्वयं हमको समय-समय पर उपचारित करती रहती है। दूसरे, हमको स्वयं शीघ्रपतन निरोधी जीवन शैली को अपना कर स्वयं ऐसी क्रियाएँ करनी चाहिए जिनसे शीघ्रपतन न होने पाए और संभोग क्रिया सफल रहे और स्त्री को तृप्ति प्राप्त हो जाये ।

तीसरी बात हम दोनों पक्षों-स्त्री-पुरुष-से कहना चाहते हैं कि वे इस मैथुन क्रिया में परस्पर ऐसा समझौता करें कि उन दोनों को ही सन्तुष्टि मिले । इसके लिए वे अपनी स्थिति के अनुसार आसन का प्रयोग करें । कुछ ऐसी क्रियाएँ करें जिससे यदि रतिकाल थोड़ा हो तो दोनों उसमें ही अपनी-अपनी सन्तुष्टि कर लें । उदाहरणार्थ – पुरुष अपने लिंग मुण्ड या उँगली से स्त्री की जननेन्द्रिय में भगनासा को धीरे-धीरे उत्तेजना दे, उसको रगड़े तथा स्तनों को स्पर्श कर उनको मसले, चुम्बनों का आदान-प्रदान होने लगे । इसके बाद इच्छानुसार बैठकर लेटकर सम्भोग-क्रिया करें ।

मैथुन-क्रिया का प्राकृतिक ढंग तो यह है कि पुरुष स्त्री के ऊपर लेटकर अपने अधरों से स्त्री के अधर, वक्ष से वक्ष मिलाकर अपने लिंग को योनि में प्रवेश कराएँ और आगे-पीछे होकर धक्के मारे । स्त्री भी इसमें सहयोग देकर आलिंगन की जड़कन और कामुक-क्रियाओं का सम्पादन, चिकारी काटना, चुम्बन आदि से आनन्द को बढ़ाए । लेकिन इस तरह की क्रिया सभी स्त्री-पुरुषों को उपयोगी नहीं होती । कहीं स्त्री लेटती है और पुरुष बैठकर संभोग कार्य करे और स्त्री दुर्बल हो और पुरुष मोटा और अधिक भारी हो तो स्त्री को पुरुष अपने ऊपर लिटाये । पुरुष का लिंग अधिक लम्बाई रखता हो तो स्त्री अपनी जाँघं फैलाए और छोटा लिंग होने पर स्त्री अपनी जाँघों को भींचकर अपनी योनि को संकुचित कर सन्तुष्टि प्राप्त करें ।

स्त्री लेटकर बैठे हुए पुरुष के कन्धों पर अपनी टाँगें रखे तो योनि का मुख काफी फैल जाएगा और लम्बे लिंग से स्त्री को कष्ट नहीं होगा। छोटा लिंग हो तो पुरुष अपनी टाँगों पर स्त्री को बैठाकर क्रिया पूर्ण करे। कहने का तात्पर्य यह है कि दोनों को तालमेल बिठाकर यह क्रिया सम्पन्न करना ही दोनों के लिए हितकारी तथा संतोषजनक होगा । दोनों के परस्पर के सहयोग, सहानुभूति, सांत्वना, संतोष की बातों के द्वारा कोई कमी भी हो तो उसे मन से निकाल दें और एक-दूसरे को उत्साहित करते हुए आनन्दपूर्वक जीवन गुजारें ।

शीघ्रपतन के दोष से ग्रसित व्यक्ति को यदि स्त्री मनमोहक बातों से लानत-मलामत या व्यंग वचनों के बजाय सहानुभूति दर्शाकर उसे उत्साहित करे, उसे वीर्य के पुष्ट होने के लिए आहार का प्रबन्ध करे तो आगे ऐसा न होगा क्योंकि शीघ्रपतन का रोग सदा रहनेवाला नहीं है ।

शीघ्रपतन के रोगी के लिए पथ्य और अपथ्य

ऐसा आहार जो वीर्य को पुष्ट करे, समय-समय पर मिलने वाले फल जो सुपाच्य और पौष्टिक हो, ऐसा ही भोजन, घी, दूध, मक्खन, मिठाई, सूखे मेवे आदि सेवन करना चाहिए । उसे स्वस्थ रहने के लिये प्रतिदिन पौष्टिक किन्तु सात्विक आहार लेना ही उचित है । तेल की मालिश के बाद स्नान आदि सुगन्धित और नृत्य-संगीत और धार्मिक वातावरण में रहना चाहिए ।

अपथ्य के रूप में माँस-मदिरा, नशा, सिगरेट का अत्यधिक व्यवहार, बासी भोजन, गरिष्ठ पदार्थ जो कब्ज को बढ़ाएँ तथा तामसी आहार कर वस्तुएँ-पदार्थ जिनसे वीर्य पतला और जल्दी-जल्दी बहने का कारण बने, न करें । गरम-सूखा तथा उष्णता पैदा करने वाले पदार्थों से बचना होगा ।

यदि अधिक मैथुन करने के कारण यह रोग लगा है तो कुछ समय के लिए मैथुन त्याग दें, काम-क्रियाओं में कमी करें और दूध, मक्खन, मलाई, घी का प्रयोग जारी रखें । सम्भोग के समय प्रसन्नता का वातावरण बनाए रखें । भय, शोक, चिन्ता अपने दिमाग से निकाल दें । ये मानसिक विकार लिंग की तंत्रिकाओं में विकृति लाते हैं और लिंग में तनाव नहीं आ पाती तथा वीर्य का शीघ्रपतन होता है ।

इस रोग में वीर्यदोष को दूर करने का प्रयत्न करना जरूरी है । इसके लिए कुछ प्राकृतिक जड़ी-बूटियों के योग हम दे रहे हैं जिनसे लाभ अवश्य मिलेगा ।

● वंशलोचन और सत गिलोय समभाग कूट-पीसकर 2 ग्राम की मात्रा शहद के साथ लेने से वीर्य में गाढ़ापन एक सप्ताह में आ जाएगा । वंशलोचन असली होना चाहिए ।

● इमली के बीज रात को भिगोकर छीलकर बारीक पीस लें और गुड़ के साथ 5-5 ग्राम की गोली बनाकर सुखाकर रख लें । दूध के साथ एक गोली सुबह और एक शाम को लेने से वीर्यदोष दूर होता है ।

● बादाम को पानी में भिगोकर छील लें और कालीमिर्च के साथ घोंट-पीसकर दूध के साथ लगातार कुछ दिन सेवन करें | 6 बादाम और 6 कालीमिर्च एक खुराक है जिसे एक बार सुबह लेना चाहिए।

● लौंग चबाने से जो लार बने उसे लिंग पर लगाकर सहवास करने से शीघ्रपतन न होकर स्तम्भन शक्ति में वृद्धि होगी ।

● आम की गुठली की गिरी का चूर्ण बनाकर रख लें । इसे 3 ग्राम की मात्रा में दूध के साथ प्रतिदिन लेने से वीर्य में गाढ़ापन आयेगा।

● पोस्त दाने 5 ग्राम और कौंच के बीज की गिरी 5 ग्राम पीसकर मिश्री मिलाकर इस चूर्ण को दूध के साथ नित्य लेने से वीर्य गाढ़ा और वृद्धि को प्राप्त होगा ।
● लाजवन्ती के बीज और चीनी (यदि देशी खाँड़ मिले तो ज्यादा अच्छा है) समभाग लेकर चूर्ण बनाकर 5 ग्राम नित्य प्रतिदिन लेने से शीघ्रपतन में लाभ होगा ।

● आँवलों का मुरब्बा एक फल नित्य खाने से स्वप्नदोष में लाभ होगा और वीर्य भी गाढ़ा होगा।

● वीर्य का पतलापन दूर करने के लिए बरगद के फलों को छाया में सुखाएँ और समभाग मिश्री मिलाकर चूर्ण बनाकर रख लें । 5 ग्राम सायंकाल हल्के गर्म दूध से सेवन करें ।

● असगन्ध नागौरी का चूर्ण 3 ग्राम गाय के दूध के साथ नित्य लेने से शारीरिक शक्ति बढ़कर शीघ्रपतन होना रुकेगा । दूध को मीठा करने के लिए शहद मिला सकें तो और अच्छा होगा । यह मसाने की दुर्बलता दूर कर मस्तिष्क और शरीर को शक्ति देगा ।

● बहुफली का 5 ग्राम चूर्ण कुछ समय दूध से लेने से लाभ होगा ।

● सफेद मूसली 3 ग्राम दूध में औटा कर मीठा मिलाकर नित्य लेना अच्छा है ।

● ब्रह्मदण्डी का सात ग्राम चूर्ण सुबह शहद से या दूध से लेने से लाभ होगा ।

● गुठली निकाल कर दो छुआरे दूध में पकाएँ और रात को उन्हें खाकर दूध पीयें । संभोग से पूर्व लेने से स्तम्भन होगा । वैसे कुछ दिन सेवन तथा ब्रह्मचर्य रहने से वीर्य में गाढ़ापन आएगा ।

कुछ क्रियात्मक कार्य

इस विषय में काम सम्बन्धी ग्रन्थों में इस समस्या के निवारण के लिए कुछ ऐसी क्रियाएँ और उपचार लिखे हैं जिनसे इस समस्या का निवारण हो सकता है ।
शीघ्रपतन के रोगी को संभोगावसरों पर उतावलेपन और जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए । लिंग को योनि में प्रवेश करने से पूर्व अपने साथी के साथ ऐसी काम-क्रियाएँ करनी चाहिए जिनसे आनन्द ज्यादा बढ़े । मीठी-मीठी काम सम्बन्धी बातों के साथ मुख, कपोल, कण्ठ और पीठ को सहलाना, चुम्बन लेना, गुदगुदाना चाहिए । दोनों जाँघ, दोनों काँख, भगप्रदेश, स्तन के अग्र प्रदेश के साथ क्रीड़ा करके उसके भगांकुर को मसलना चाहिए । यह मैथुन क्रिया से पूर्व करने के काम हैं ।

पुरुष अपनी पौरुष ग्रन्थि को हल्के हाथों से मालिश करके भी शीघ्रपतन का उपचार कर सकते हैं । एक यौन चिकित्सक के अनुसार हाथ पर दस्ताना चढ़ाकर मध्य उँगली को गुदा में डाल कर पौरुष ग्रन्थि की मालिश करनी चाहिए । रबड़ चढ़ी उँगली पर देशी घी या वैसलीन लगाकर उँगली को प्रवेश करना चाहिए । इस चिकित्सा के अनुसार इससे पौरुष ग्रन्थि एवं वीर्य की थैली को पुष्टता मिलती है । यह ग्रन्थि संभोगावसरों पर नियंत्रण करने वाले कपाट का काम करती हैं ।

कुछ यौन विशेषज्ञों का कहना है कि लिंग पर निरोध चढ़ाकर संभोगरत हुआ जाए । यह उस समय चढ़ाएँ जब संभोग के लिए बिल्कुल तैयार हो । यह अनुभव की बात है ।

यदि अण्डकोष के सिकुड़ने व फैलने की कमी से शीघ्रपतन का रोग हो तो एक यौन चिकित्सक का सुझाव है कि काँसे के कटोरे में ठण्डा पानी भरें और उसमें दस मिनट के लिए अण्डकोषों को डुबोकर रखें और फिर वस्त्र से पाँछकर दोनों हाथों के अँगूठे और उँगलियों से हल्की-हल्की मालिश करें । ऐसा कुछ देर करने से अण्डकोषों में रक्त का संचार होगा और वह फूल जायेंगे । ऐसा होने पर उनको प्राकृतिक रूप में आने दें और मन में इस बात का विचार लाएँ कि आपको लाभ होगा तथा आप प्रसन्नता प्राप्त करेंगे ।

निरन्तर स्वस्थ चित्त एवं प्रसन्न रहें, ऐसी हमारी कामना है ।

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