सनस्ट्रोक या लू लगने का उपचार [ Sunstroke Treatment In Hindi ]

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इसे सनस्ट्रोक या हीट स्ट्रोक के नाम से अंग्रेजी में जाना जाता है । यह ज्वर बहुत-से लोगों को हो जाता है। गर्मी में चलने से सिरदर्द, सिर चकराना, कै, मितली, प्यास की अधिकता व शरीर में दर्द होता है। रोगी घबराकर छाया में आते-आते बेहोश हो जाता है। नाड़ी तेज परन्तु कमजोर हो जाती हैं, साँस जल्दी-जल्दी चलती है, चर्म शुष्क, आँखों की पुतलियाँ फैल जाती हैं, रोग की तीव्रता में आँखें लाल हो जाती हैं। ज्वर 99.1 से 104.7 डिग्री फारेनहाईट तथा गम्भीर अवस्था में 107.2 फारेनहाईट (43 डिग्री सेण्टीग्रेड) तक हो जाने से मृत्यु तक ही जाती है । चेहरा पीला या नीला, त्वचा बिल्कुल शुष्क होना इस बात का लक्षण है कि रक्त और शरीर का तरल गर्मी से शुष्क हो चुका है । तापमान अधिक बढ़ जाना खतरे का लक्षण है । कई बार ज्वर की अधिकता के कारण मस्तिष्क खराब हो जाने से रोगी पागल तक हो सकता है और बेहोश होकर कुछ ही मिनटों में मर भी जाता है ।

सनस्ट्रोक का एलोपैथिक चिकित्सा

मामूली रोग में, ठण्डे पानी में थोड़ा नमक मिलाकर बार-बार पिलाते रहें। नाड़ी कमजोर हो जाने पर 20 बूंद स्प्रिट अमोनिया एरोमेटिक पानी में मिलाकर पिलायें और कैम्फर इन ऑयल का इन्जेक्शन मोटी सुई से त्वचा अथवा माँस में लगायें ।

रोगी को तुरन्त ठण्डे एवं अन्धेरे कमरे में उसके आवश्यक कपड़े उतारकर बिना बिस्तर की चारपाई पर लिटायें । बिजली का पंखा जोर से चलाकर यथासम्भव ठण्डक पहुँचायें । ठण्डा पानी (44.6 फारेनहाईट) फव्वारे की भाँति रोगी के समस्त शरीर पर ऊपर व नीचे से प्रत्येक अंग-प्रत्यंग पर छिड़कें । हाथ से झलने वाले गीले पंखे से रोगी की हवा करें । कमरा ठण्डा रखने का प्रयत्न करें जिससे रोगी का तापमान 106 या 105 फारेनहाईट से गिरकर कम हो जाये और एक घण्टे के अन्दर उसकी गुदा के अन्दर का तापमान गिरकर 102 डिग्री फारेनहाईट पर आ जाये। यदि बिजली का पंखा न हो तो चादर को पानी से गीला करके रोगी को सिर से पैर तक ढक दें । चादर हर समय गीली रखें । प्रत्येक 20-30 मिनट के बाद रोगी का तापमान बढ़ने पर पानी में बर्फ डालकर इस ठण्डे पानी को स्टमक ट्यूब द्वारा रोगी के आमाशय में प्रविष्ट करें। इसके साथ ही उस पर ठण्डा पानी फव्वारे की भाँति छिड़कते भी रहें और पानी से भीगे हाथ से झलने वाले गीले पंखे से हवा भी करते रहें। रोगी की नाक बचाकर उसको ठण्डे पानी से भरे टब में 20-25 मिनट तक लिटाये रखें I

लार्जेक्टिल (एम. एण्ड बी. कम्पनी) 100 मि.ग्रा. का मांस में इन्जेक्शन लगा देने से ताममान गिर जाता है और कम्पन भी दूर हो जाता है ।

पेरल्डी हाईड 5 से 10 मि.ली. का माँस में इन्जेक्शन लगा देने से रोगी के आक्षेप दूर हो जाते हैं।

शरीर का तरल और रक्त का पानी गर्मी की औधिकता के कारण कम हो जाने को दूर करने के लिए आधा लीटर बर्फ के ठण्डे पानी में 8 ग्राम सोडियम क्लोराइड (शुद्ध नमक) डालकर एनिमा की ट्यूब में बारीक कैथेटर फिट करके टोंटी का पेंच कम-से-कम खोलकर गुदा में बूंद-बूंद प्रवेश करें। बूंद-बूँद पानी समस्त शरीर तथा रक्त में मिलते रहने से रक्त और शरीर में तरलता की कमी दूर हो जायेगी ।

एमाइल नाइट्रेट को रूमाल पर डालकर बार-बार सुघाये । रोगी को वायुरोधक स्थान पर ठण्डे जल में गले तक डुबाये रखें । सिर पर गीला कपड़ा रखें । एक घण्टे के बाद रोगी को जल से निकाल लें तथा ठण्ड लगने पर कम्बल उढ़ा दें तथा गरम दूध, चाय आदि गरम पेय पिलायें ।

कार्डियाजाल (बी. नाल. कम्पनी) – बच्चों को चौथाई से 1 मि.ली. की मात्रा में इन्जेक्शन माँस या शिरा में धीरे-धीरे लगायें ।

पिराटाम सीरप (बिड्डल साबर कम्पनी) – बच्चों को 60 मि.ग्रा. प्रतिकिलो शारीरिक भार के अनुसार प्रतिदिन की मात्रा को 3 बराबर भागों में बाँटकर पिलायें ।

नोट – वृक्क, यकृत की विकृति तथा हृदय की क्रिया अनियमित होने की दशा में इसका प्रयोग बड़ी सतर्कता के साथ करें।

डायनासिल (हिन्दुस्तान एण्टी बायोटिक) – बच्चो को 250 मि.ग्रा. वाले वायल की आधी मात्रा का प्रत्येक 6-6 घण्टे के अन्तराल से धीरे-धीरे शिरा या माँस में इन्जेक्शन लगायें ।

क्लोरोमायस्टीन (पी.डी.कम्पनी) – कम्पनी का विथ विटामिन-बी कॉम्पलेक्स पामीटेट बच्चों को 1.25 से 5 मि.ली. तक आयु तथा शारीरिक भार के अनुसार बराबर जल मिलाकर प्रत्येक 4-6 घण्टे पर पिलाते रहें ।

नोट – बच्चों के इस रोग से ग्रसित हो जाने पर विशेष सावधानी बरतें क्योंकि बच्चा कष्ट की तीव्रता के कारण 2-4 मिनटों से लेकर 1-2 घण्टे में ही मर सकता है। इस रोग में उसकी आँखों में लाली छा जाती है, पैर के तलवे तथा हाथ की हथेली अग्नि की भाँति जलती हैं, गला सूखता है। मूत्र गर्म, अल्प एवं कत्थई गहरे रंग का आता है । पसीना एकदम नहीं आता है, कभी-कभी वृक्क क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, बारम्बार शरीर में रोमांच हो आता है । बच्चा विक्षिप्त-सा हो जाता है। उपरोक्त लक्षणों में यह रोग शीघ्र ही पहचाना जा सकता है।

सरसाम हो जाने पर गुलरोगन 1 तोला, अर्क गुलाब 5 तोला, सिरका 2 तोला बर्फ में डालकर उसमें कपड़े की गद्दी गीली करके सिर पर बार-बार रखें ।

आम के बहुत छोटे-छोटे फल जिनमें गुठली न बन पायी हो आग में भूनकर उसका रस पानी में निचोड़कर 5-5 तोला दिन में 3-4 बार पिलायें ।

नोट – कई बार इस रोग में तापमान नार्मल से भी कम हो जाता है। ऐसी अवस्था में रोगी को गरम चाय, दूध, बार-बार पिलायें ।

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