tonsil ka ilaj in hindi – टॉन्सिल का इलाज

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स्ट्रप्टो कोकस हीमोलिटिकस नामक जीवाणु टॉन्सिल के लिए जिम्मेदार है। यह रोग चौदह वर्ष तक के बालक-बालिकाओं को अधिक होता है। एक बार टॉन्सिल की बीमारी हो जाने के उपरांत रोग बार-बार हो जाने की प्रवृत्ति पैदा हो जाती है। तेज मसाले, अचार, चाट एवं स्कूलों के फाटकों पर कैथा, इमली के चूरन और बर्फ खाने तथा फ्रिज का दुष्प्रयोग इसके लिए जिम्मेदार है।

टांसिल के लक्षण

एक अथवा दोनों ओर के टॉन्सिल में तेजी से अकस्मात् सूजन उत्पन्न हो जाती है। टॉन्सिल में डंक मारने की तरह का तीव्र दर्द होता है जो कान तक जाता है। स्वर भंग, निगलने में कष्ट, सिरदर्द तथा हाथ, पैर और पीठ में दर्द बना रहता है। सिहरन के साथ-साथ बुखार आ जाता है। रोगी टॉन्सिल से गाढ़े लेसदार चिपचिपे बलगम को निकालने का प्रयत्न करता है। सांस से बदबू आती है। सूजन उपजिह्वा तक फैल जाती है और कौवा फूलकर लम्बा हो जाता है जो जीभ तक लटकता है। नये टॉन्सिल प्रदाह में प्राय: दस-बारह दिन में आराम आ जाता है। पुराने टॉन्सिल प्रदाह में रोगी को किसी तरह की सर्दी सहन नहीं होती। जरा-सी सदीं लगने एवं अन्य उत्तेजक कारणों से रोग का बार-बार आक्रमण होता है। तालु लाल और प्रदाहित हो जाता है तथा उसमें दर्द होने लगता है। यह पूरी तरह आरोग्य नहीं होता, प्रदाह और दर्द तो दब जाता है, किन्तु गत बार की अपेक्षा तालु कुछ अधिक बढ़ जाता है।

टॉन्सिल का होमियोपैथिक उपचार

• उपदंश रोगग्रस्त माता-पिता के बालक-बालिकाओं को वंशानुगत उपदंश धातुदोष प्राप्त हो जाता है। इन्हें टॉन्सिल प्रदाह होने पर तब तक कोई औषधि, चाहे वह कितनी ही समलक्षण क्यों न हो, काम न करेगी, जब तक कि उपदंश दोष दूर करने के लिए सिफिलिनम (नोसोड) का प्रयोगन किया जाए। ‘सिफिलिनम’ 200 अथवा 1000 शक्ति की एक खुराक देने के बाद ही अन्य औषधियां जो रोगी के चरित्रगत लक्षणों के अनुरूप हैं, कार्य करना आरम्भ कर देंगी।

• पीवजनित टॉन्सिल को आरोग्य करने के लिए गन पाउडर 3 × तथा ‘बेरयटा कार्ब’ 30 शक्तिक्रम से अदल-बदल कर देने से चमत्कारिक लाभ होता है। विराम काल में जब रोग सुसुप्तावस्था में होता है, तब ‘सल्फर’ 200 शक्तिक्रम से चिकित्सा प्रारम्भ करें और समयबद्ध तरीके से नियमपूर्वक सप्ताह में एक दिन दो-तीन खुराक, एक माह तक दें। सल्फर की प्रथम खुराक खाली पेट दी जानी चाहिए। इससे विशेष लाभ होता है। इसके बाद ‘कैल्केरिया कार्ब’ 200 शक्तिक्रम एक माह तक नियमानुसार दें। अंतिम चरण में ‘थूजा’ 200 शक्तिक्रम कुछ खुराकें नियमानुसार देने से रोग दूर हो जाता है। अनुगामी औषधि के रूप में ‘कैल्केरिया फॉस’ 30 शक्तिक्रम दो या तीन खुराक कुछ समय देने से रोगी का स्वास्थ्य बहाल हो जाता है।

• मर्क प्रोटो आयोड, मर्क बिन आयोड, लेकेसिस व कॉस्टिकम औषधियां भी लक्षणों की समानता के आधार पर दी जाती हैं।

एपिस मेल : दोनों ओर की तालु ग्रंथियों में अत्यधिक सूजन तथा शोथ, गला बाहर से भी शोथपूर्ण, गले में सूखापन, गलनलियों में संकुचन का भाव तथा बर्र के डंक मारने की तरह तीव्र दर्द, तालु के ऊपर धाव हो जाते हैं। उपजिह्वा बढ़ी हई तथा शोथग्रस्त, सांस लेने और निकालने में ऐसा कष्ट मालूम होता है कि गले के अन्दर मछली की हड्डी का टुकड़ा फंसा हो। प्यास बिलकुल नहीं लगती। गर्म खाद्य एवं गर्म पेय पदार्थों से कष्ट बढ़ता है।

बेरयटा कार्बोनिक : नये एवं पुराने दोनों ही तरह के टॉन्सिल प्रदाह की यह प्रधान औषधि है। सर्दी बिलकुल ही सहन नहीं होती। किसी तरह की सर्दी लगने या मौसम परिवर्तन होने पर तालुग्रंथि बढ़ जाती है। टॉन्सिल सदैव फूले रहते हैं। बढ़ा हुआ टॉन्सिल लाल और प्रदाहित रहता है। दाहिनी ओर का टॉन्सिल विशेष रूप से प्रभावित होता है और बालक बौना बना रहता है। बच्चों का कद बढ़ाने में यह दवा विशेष काम करती है। प्रत्येक बार सर्दी लगने पर समस्त लसिका ग्रंथियां, जबड़े के नीचे ग्रंथियों का आकार और कड़ापन बढ़ जाता है। गले के चारों ओर गांठों की जंजीर बन जाती है। ग्रंथियों का स्पर्श असहिष्णु रहता है, छूने से दर्द होता है। गले के अन्दर जलन व सुई चुभने जैसा दर्द रहता है। रोगी केवल तरल पदार्थ आसानी से निगल सकता है । ठोस पदार्थ लेने से कष्ट होता है।

बेलाडोना : रक्त प्रधान बालक-बालिकाओं को सर्दी सहज ही लग जाती है, हवा का झोंका सहन नहीं होता, विशेषकर जब सिर खुला होता है। रोग का आक्रमण दाहिनी ओर अधिक होता है। टॉन्सिल प्रदाह की पहली अवस्था, कौवा के दोनों ओर की तालुग्रंथियां फूली हुई, चमकीली लाल, गले में अत्यधिक सूखापन, गले और जीभ में जलन तथा डंक मारने एवं टभक की तरह दर्द होता है। मस्तिष्क में रक्त की अधिकता, जिसकी वजह से चेहरा लाल, माथे में दर्द और माथा गर्म तथा पैर ठण्डे रहते हैं। कनपटी की धमनियों में टभक होती है। गले की ग्रंथियों में सूजन रहती है एवं स्पर्श सहन नहीं होता। यह अल्पकालिक औषधि है। अत: इस औषधि को 30 शक्तिक्रम में रोग की गम्भीरता के अनुसार एक अथवा प्रति दो घंटे में चार गोली प्रयोग करनी चाहिए।

कैल्केरिया आयोड : कण्ठमाला धातुग्रस्त बालक-बालिकाएं, जिन्हें बार-बार सर्दी-जुकाम हो जाता है। पुराना टॉन्सिल्स प्रदाह में छोटे-छोटे गड़े बन जाते हैं। टॉन्सिल वृद्धि के साथ ही गर्दन की ग्रंथियां प्रवाहित रहती हैं।

कैल्केरिया फॉस : नया टॉन्सिल प्रदाह हो अथवा पुराना, यह औषधि दोनों में उपयोगी है।

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