रुमेक्स क्रिस्पस – Rumex Crispus

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रुमेक्स क्रिस्पस का होम्योपैथिक उपयोग

( Rumex Crispus Homeopathic Medicine In Hindi )

इस औषधि के प्रभाव-क्षेत्र के तीन स्थान हैं: वे हैं – (1) श्वास-प्रणालिका (Respiratory organs), (2) आंतें (3) त्वचा (Skin)

श्वास-प्रणालिका पर के प्रभाव से यह खांसी की, आँतों पर के प्रभाव से यह दस्तों की, और त्वचा पर के प्रभाव से यह खुजली की औषधि है।

(1) रुमेक्स का श्वास-प्रणालिका पर प्रभाव – सांस में जरा-सी भी ठंडी हवा के आने से गले में सुरसुराहट के साथ लगातार सूखी खांसी छिड़ जाना – होम्योपैथी में ऐसी दूसरी कोई दवा नहीं है जिसमें ठंडी हवा का श्वास प्रणालिका पर इतना जबर्दस्त प्रभाव होता हो जितना रुमेक्स का होता है। रोगी अपने सिर को बिस्तर में ऐसे ढांप लेता है कि किसी कोने से भी ठंडी हवा सांस में न आने पाये। डॉ० चौधरी एक गर्भवती स्त्री की खांसी का उल्लेख करते हुए लिखे हैं कि उसे ऐसी सख्त सूखी खांसी थी कि खांसते-खांसते सारा जिस्म हिल जाता था, गर्भपात न हो जाय ऐसा डर लगता था। अनेक औषधियां जो निर्दिष्ट लगती थी दी गई परन्तु कोई लाभ न हुआ। अन्त में, इस लक्षण पर कि वह ठंडी हवा बर्दाश्त नहीं कर सकती थी, उसे रुमेक्स की कुछ मात्राएं दी गई और खांसी जाती रही। जब भी उसे देखा गया वह अपने मुंह को कपड़े से ढांपे पड़ी होती थी और ठंडी हवा को सांस में लेने की परेशानी से बचने की कोशिश करती थी। डॉ० कैन्ट लिखते हैं कि इस औषधि में जुकाम तथा खांसी का प्रमुख स्थान है। नाक, आंख, छाती, संपूर्ण, श्वास-प्रणालिका से बहुत अधिक परिमाण में श्लैष्मिक-स्राव बहता है। उन्होंने लिखा है कि नाक तथा आभ्यन्तर श्वास-प्रणालिका से जुकाम और खांसी के रूप में उन्होंने इतना अधिक सफेद, झागदार पानी जैसा पतला-स्राव निकलते देखा है, ढेर-का-ढेर, कि थोड़ी देर में ही प्याला भर गया है। ऐसे जुकाम तथा खांसी में जब रोगी अपने सिर को ठंडी हवा से बचाने के लिये इस प्रकार ढक ले कि उसके सांस में ठंडी हवा न जा सके, जाये तो एकदम जोर का जुकाम और खांसी उठ खड़ी हो, तब यह औषधि एकदम असर करती है और जुकाम और खांसी को ठीक कर देती है।

(i) ठंडी सांस लेने से खांसी के लक्षण में रुमेक्स, स्पंजिया और फॉस की तुलना – ठंडी सांस लेने से खांसी उभर आने का लक्षण रुमेक्स के अतिरिक्त स्पंजिया और फॉस में भी पाया जाता है, परन्तु रुमेक्स में यह सब से ज्यादा है। स्पंजिया की खांसी में खांसने के समय सूखा हिस-हिस या आरे से लकड़ी को चीरने का-सा शब्द सुनाई देता है, फॉस में बाईं करवट सोने से खांसी बढ़ जाती है।

(ii) रुमेक्स की खांसी रात को 11 बजे छिड़ती है और क्षय-रोग में रात को 2 बजे – इस औषधि की खांसी रात के 11 बजे छिड़ती है। 11 बजे खांसी छिड़ने वाली दो हैं औषधियां – रुमेक्स तथा लैकेसिस है। बच्चा 11 बजे तक जागता रहे तो खांसी न हो, किन्तु अगर जल्दी सो जाय तो 11 बजे खांसी छिड़ जाय, ऐसी हालत में लैकेसिस औषधि है क्योंकि नींद में रोग का बढ़ना इसका लक्षण है। लैकिसस में बच्चा 11 बजे तक नहीं सोया तो खांसी नहीं छिड़ी, सो गया तो 11 बजे खांसी ने जगा दिया। रुमेक्स में तो बच्चा चाहे जागता रहे, चाहे सो-जाय, 11 बजे रात को उसे खांसी आती ही है।

रुमेक्स क्षय-रोग की खांसी में भी लाभ करता है। क्षय-रोग की खांसी जब रात को 2 बजे छिड़े तब इससे लाभ होता है।

(iii) गर्म स्थान से ठंडे स्थान में जाने से खांसी का बढ़ना – अगर रोगी गर्म-स्थान से ठंडक में जाता है, गर्म कमरे में से बाहर ठंडक में जाता है, तो खांसी बढ़ जाती है, या न हो तो आने लगती है। नैट्रम कार्ब में इस से उल्टा है। इस में ठंडक से गर्म कमरे में जाने से खांसी आने लगती है, या बढ़ जाती है। ब्रायोनिया में गर्म से सर्द या सर्द से गर्म होने से जुकाम-खांसी-बुखार हो जाता है।

(2) रुमेक्स का आतों पर प्रभाव – प्रातः काल भूरे रंग के दस्त खांसी सहित; क्षय-रोग में भी ऐसे दस्त आना, श्वास-प्रणालिकों के अतिरिक्त इसके प्रभाव का दूसरा क्षेत्र आंतें है। रोगी को सवेरे ही दस्त आते हैं। बिस्तर से उठते ही सवेरे दस्त आने में नैट्रम सल्फ, एलो, सल्फर और पोडोफाइलम मुख्य औषधियां हैं, परन्तु रुमेक्स के प्रात:काल के दस्त बादामी रंग के होते हैं, इन दस्तों में खांसी का लक्षण भी साथ रहता है। जैसे सल्फर में रोगी उठते ही बाथरूम को भागता है, वही लक्षण इस औषधि में भी है। क्षय-रोग की बढ़ी हुई अवस्था में यह लक्षण पाया जाता है। क्षय-रोगी भी दस्त के वेग के कारण प्रात:काल उठते ही बाथरूम की ओर भागता है, उसे खांसी भी होती है, इसलिये खांसी के साथ क्षय-रोग के प्रात:काल के इन दस्तों में यह औषधि लाभप्रद है।

(3) रुमेक्स का त्वचा पर प्रभाव – त्वचा पर ठंड लगने से या कपड़े उतारते हुए ठंड लगने से खुजली – त्वचा पर ठंड के प्रभाव से खुजली, जबर्दस्त खुजली इसका तीसरा लक्षण है। सोते समय जब व्यक्ति कपड़े उतारता है, तब हवा की ठंडक से उसे अत्यंत खुजली होने लगती है। त्वचा पर फुन्सियां हो जाती हैं या पित्ती उछल आने की-सी (Urticaria) दशा हो जाती है। रुमेक्स की खुजली ठंडक से होती है, परन्तु गर्मी से खुजली बढ़ जाना, खासकर बिस्तर की गर्मी से खुजली बढ़ जाना मर्क सौल का लक्षण है।

(4) सर्व-प्रधान लक्षण है ठंडी हवा के सांस से रोग बढ़ना – ऊपर जिन लक्षणों का हमने उल्लेख किया, उनमें आधारभूत लक्षण इस औषधि की प्रकृति है। खांसी ठंडी हवा के सांस लेने से बढ़ जाती है, रोगी अपना सारा शरीर-आँख, नाक, कान, मुँह-सब कुछ कपड़े से इस प्रकार लपेट लेता है कि किसी छिद्र से भी ठंडी हवा का प्रवेश न हो सके।

(5) शक्ति तथा प्रकृति – 3, 6, 30 (औषधि ‘सर्द’-प्रकृति को लिये है)

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