वेरेट्रम विरिडि [ Veratrum Viride Homeopathy In Hindi ]

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[ कैनाडा के मैदान में एक तरह का पौधा होता है, उसकी जड़ से टिंचर तैयार होता है ] – बुखार का उत्ताप जब बहुत अधिक बढ जाता है, यहाँ तक की टेम्परेचर (शरीर का ताप ) 105-106 डिग्री तक चढ जाता है, उस समय इसके प्रयोग से बहुत थोड़े समय में उत्ताप घट जाता है और 101-102 तक उतर आता है । वेरेट्रम विरिडि का अधिक मात्रा में प्रयोग करने पर हृत्पिण्ड की क्रिया नाश हो जाती है, इससे रोगी की मृत्यु तक हो सकती हैं, इसलिए इसका प्रयोग करने के समय हृत्पिण्ड की अवस्था खूब अच्छी तरह जांच लेनी चाहिये और दो-तीन मात्राओं से ज़्यादा कभी प्रयोग नहीं करना चाहिये ।

निमोनिया में बहुत तेज बुखार के साथ रोगी को साँस लेने और छोड़ने में बहुत तकलीफ, नाड़ी पूर्ण और कठिन, बहुत सिर-दर्द, अगर चेहरे का रंग नीला रहे और पहली अवस्था मे जब तक फेफड़े में रक्त की अधिकता हो, तब तक इससे विशेष लाभ होता है।

टंकार – प्रसूता का टंकार, मस्तिष्क में रक्त-संचय, रोगिणी बहुत बेचैन हो पड़ती है, उसे बिलकुल ही ज्ञान नहीं रहता, खींचन का दौरा समाप्त हो जाने पर भी ज्ञान का लक्षण नहीं पैदा होता, चुपचाप पड़ा रहता हैं, मालूम होता है मानो ठीक सो रहा है, इसके बाद ही फिर अकड़न पैदा हो जाती है, इस तरह के लक्षण में – वेरेट्रम विरिडि फायदा करता है । सेरिब्रो-स्पाइनल मेनिनजाइटिस, इसके साथ ही जोर का बुखार ।

वृद्धि – शरीर हिलाने पर, सवेरे नींद खुलने के बाद, सर्दी आदि लगने पर।

ह्रास – स्थिर भाव से रहने पर, दबाने पर, रगडने या मलने पर ।

सदृश – एकोन, एन्टिम टार्ट, बैप्टी, बेल, ब्रायो, डिजि, फेरम एसे, जेल्सि, ग्लोनोयिन, नक्स, हेलिबोरस, हायो, फॉस, टैबाक ।

क्रम – 3x,6 शक्ति ।

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