नवजात शिशु में सांस संबंधी परेशानियों का होम्योपैथिक इलाज

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नवजात-शिशु के रोगों पर ध्यान न देने से उनकी मृत्यु होने की सम्भावना रहती है। हमारे देश में अधिकांश नवजात-शिशु इसी कारण मृत्यु का शिकार बनते हैं । अत: हम सर्वप्रथम नवजात-शिशु के सम्बन्ध में सावधानियों, उनके कष्ट निवारण के उपायों तथा रोगों की चिकित्सा का ही उल्लेख करेंगे ।

श्वास-प्रश्वास का रुकना

विवरण – नवजात-शिशु के श्वासावरोध के अनेक कारण हो सकते हैं, जैसे – प्रसव के समय बच्चे के सिर का अधिक समय तक प्रसव-मार्ग में अटके रहना, संडासी की सहायता से प्रसव कराया जाना, गले में आंवल-नाल का लिपट जाना, श्लेष्मा जैसे पदार्थ द्वारा शिशु की नाक अथवा मुँह का अधिक समय तक ढके रहना तथा आंवल-नाल में अधिक रक्त-संचय हो जाना आदि । अस्तु, सर्वप्रथम श्वासावरोध का कारण जानना आवश्यक है ।

नवजात-शिशु जन्म लेते ही रो उठता है तथा साँस लेने लगता है । यदि नवजात-शिशु की साँस न चले, परन्तु उसकी नाड़ी की गति अत्यन्त धीमी हो और उसमें स्पन्दन हो रहा हो तो आंवल-नाल को काटने में शीघ्रता नहीं करनी चाहिए । यदि नाड़ी में तनिक भी स्पन्दन न हो तो बच्चे का बचना असम्भव हो जाता है। ऐसी स्थिति में नाल को तुरन्त काटकर, बच्चे को जीवित करने का प्रयत्न करना चाहिए।

यदि आँवल-नाल न काटा गया हो और बच्चा शान्त-स्वभाव से पड़ा हो तो उसे गरम-फ्लैनेल में लपेटकर माता के पास सुला देना चाहिए, ताकि उसका शरीर सूखा एवं गरम बना रहे । इस विधि से 1-2 मिनट के भीतर ही यह पता चल जायेगा कि बच्चे को बचाया जा सकता है अथवा नहीं । यदि यह उपाय सफल न हो तो बच्चे को माता से अलग करके उसे तुरन्त ही गरम पानी से स्नान कराना उचित रहेगा। बार-बार गुनगुने (पानी) में शीघ्रता से डुबकी लगाने के बाद उसे बारी-बारी से गरम तथा ठण्डे पानी में नहलाना भी आवश्यक है। इससे उसकी श्वास चलने में सहायता मिलेगी।

शिशु की नाक अथवा मुँह पर लगे श्लेष्मा जैसे पदार्थ को एक मुलायम कपड़े से पोंछकर तथा उसके शरीर को गर्म फ्लैनेल से ढँककर, उसके मस्तक तथा मुख पर ठण्डे जल के छींटे मारने से भी श्वास चलने लगती है । इससे लाभ न होने पर, अंगुलियों से उसके नासा-छिद्रों को दबाकर तथा उसके मुँह पर अपना मुँह रखकर जोर-जोर से फूंक मारनी चाहिए, ताकि उससे फेफड़ों में वायु का प्रवेश हो सके। फेफड़ों से वायु को बाहर निकालने के लिए उसकी छाती पर हाथ रखकर धीरे से दबाना चाहिए । इस क्रिया को 1 मिनट में 14-15 बार दुहराना चाहिए । इससे 10 मिनट के भीतर ही शिशु द्वारा श्वास लेने की क्रिया आरम्भ हो सकती है।

उक्त क्रिया द्वारा 10 मिनट के भीतर कोई लाभ होता दिखाई न दे तो बच्चे के मुँह तथा छाती पर एक बार गरम (गुनगुने) पानी तथा दूसरी बार ठण्डे पानी का छींटा मारना चाहिए । यह सभी क्रियाएँ बड़ी सावधानी के साथ करनी चाहिएं। इन उपायों से मुर्दे की भाँति जन्म लेने वाले शिशु भी 3 घण्टे के बाद तक साँस ले सकते हैं ।

चिकित्सा – उक्त क्रियाओं के साथ ही निम्नलिखित चिकित्सा भी करें:-

एण्टिम-टार्ट 30 – शिशु की जीभ के अग्र भाग में इसकी 1-2 बूंद लगा दें। इस औषध को हर 15 मिनट के अन्तर से लगाते रहें ।

ओपियम 30 – यदि एण्टिम-टार्ट के प्रयोग से 15 मिनट के भीतर ही कोई सुधार होता दिखाई न दे तथा शिशु के मुँह पर नीलापन प्रतीत हो तो इसे उसकी जीभ के अग्र-भाग पर इसे लगायें । इसे भी हर 15 मिनट के अन्तर से दिया जाता है।

आर्निका 3, 30 – यदि शिशु का जन्म अस्त्र-प्रयोग से हुआ हो और वह मुर्दे जैसा प्रतीत हो तो इस औषध की 2-3 बूंदें उसके जीभ के अग्र-भाग पर लगा देनी चाहिए । हर 15 मिनट के अन्तर से इसे भी देना चाहिए ।

चायना 30 – यदि श्वासावरोध के कारण शिशु का मुँह फीका तथा क्षीण प्रतीत हो तो इस औषध की एक बूंद उसकी जीभ पर हर 15 मिनट के अन्तर से लगायें ।

ऐकोनाइट 30 – यदि पूर्वोक्त उपचारों से शिशु में जीवन के लक्षण दिखाई पड़े तथा श्वास-प्रश्वास की क्रिया आरम्भ हो जाय, साथ ही उसके मुख पर किंचित लाली अथवा नीलापन दिखाई दे तो इस औषधि को उसकी जीभ के अग्र-भाग पर, प्रति 15 मिनट के अंतर से लगाएं।

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