विटामिन डी ( Vitamin D ) की कमी से होने वाले रोग

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अस्थि-शोथ (Rickets) – यह (रिकेट्स) रोग संसार भर में फैला हुआ है। बच्चे तो 75 से 97% तक इस रोग से ग्रसित हैं । यूरोप, अमेरिका के बच्चे इस रोग से अधिक ग्रसित हैं। परन्तु भारत और एशिया, अफ्रीका और दूसरे गरम देशों में यह रोग कम होता है ।

अस्थि-मृदुता (Osteomalacia) – यह रोग भारत, चीन, जापान में बहुत है । इस रोग में हिन्दू, जैन, परदा में रहने वाली स्त्रियाँ और बड़े शहरों की स्त्रियाँ विशेष रूप से ग्रसित हैं ।

धनुर्वात, अपतानक (Tetany) – यह रोग अस्थि-शोथ और अस्थि-मृदुता के रोगियों को विशेष रूप से होता है । यह तीनों रोग शरीर में विटामिन ‘डी’ की कमी से हो जाते हैं ।

श्वास रोग (Asthma) – यह रोग भारत तथा एशिया महादेश के कई गरम देशों में बहुतायत से होता है। विटामिन ‘डी’ की कमी से यह रोग शरीर में व्याप्त हो जाता है । इस रोग में दम फूलने लगता है ।

सन्ध्विात (Arthritis) – विटामिन ‘डी’ की कमी से आमवात से उत्पन्न होकर सन्धि-शोथ (अर्थराइटिस) हो जाया करता है । विटामिन ‘डी’ का प्रयोग कराने और आमवात नाशी औषधि का इन्जेक्शन लगाने पर यह रोग दूर हो जाता है ।

शीतपित्त (Urticaria) – विटामिन ‘डी’ की कमी से रोगी को शीत-पित्त नामक (पित्ती उछलने वाले) रोग हो जाते हैं। विटामिन ‘डी’ के कैपसूल सुबह-शाम खिलाकर भोजन के बाद एक्टिफेड गोली ‘बी. डब्ल्यू कम्पनी द्वारा निर्मित’ (अथवा अन्य कोई भी एन्टी हिटामीन एविल आदि) 1-2 टिकिया खिलाने से यह रोग शान्त हो जाता है।

जीर्ण प्रतिश्याय (Chronic Coryza) – विटामिन ‘डी’ की कमी से पुराना प्रतिश्याय हो जाता है जो विटामिन ‘डी’ के पर्याप्त प्रयोग से दूर हो जाता है ।

जीर्ण कास – यह रोग भी विटामिन ‘डी’ के यथोचित प्रयोग से दूर हो जाता है।

शारीरिक दुर्बलता – जब जटिल रोगों को भोगते-भोगते शरीर दुर्बल पड़ जाता है अथवा अन्य कारणों से शरीर क्षीण पड़ जाता है तो विटामिन ‘डी’ के इन्जेक्शन लगाने से रोगी हष्ट-पुष्ट और बलवान बन जाता है । विटामिन ‘डी’ के साथ विटामिन ‘ए’ का भी सम्यक् प्रयोग किया जाये तो उत्तम रहता है ।

विशेष नोट – स्त्रियों को दूध और विटामिन ‘डी’ युक्त खुराक अधिक मात्रा में खिलानी आवश्यक है। जब बच्चे की आयु तीन सप्ताह हो तो उसको 800 यूनिट विटामिन ‘डी’ प्रति सप्ताह खिलाना आवश्यक है । इसलिए शिशुओं को शार्क लीवर ऑयल, काड लीवर ऑयल या हेलीबुट लिवर ऑयल अथवा विटामिन ‘डी’ से निर्मित अन्य औषधियाँ दें। जो बच्चे समय (9 मास) से पहले पैदा हुए हों उनको तीन हजार यूनिट तक विटामिन ‘डी’ प्रतिदिन खिलानी अति आवश्यक है। दूध पीते बच्चों को एक कच्चा अण्डा यदि प्रतिदिन खिलाया जाता रहे तो विटामिन ‘डी’ की कमी से वे बचे रहते हैं। बच्चों को विटामिन ‘डी’ की कमी दूर करने के लिए 6 लाख यूनिट विटामिन डी की एक मात्रा का इन्जेक्शन एक मास आयु के बच्चे को लगाया जाता है अथवा विटामिन ‘डी’ की ऐसी ही एक मात्रा खिला दी जाती है, इसके 6 मास बाद पुन: इसी प्रकार दूसरी मात्रा प्रयोग की जाती है । सर्दियों में विटामिन ‘डी’ खिलाने की अधिक जरूरत पड़ती है । छोटे बच्चों को शार्क लीवर ऑयल अथवा काड लीवर ऑल प्रतिदिन देते रहने से उनको अजीर्ण हो जाता है, इसलिए यह तेल बच्चों को कभी-कभी देकर इसके बाद विटामिन ‘डी’ से बनी अन्य औषधियों का प्रयोग कराते रहना चाहिए। शरीर पर तेल की मालिश करके धूप में बैठे रहने से शरीर को विटामिन ‘डी’ काफी मात्रा में मिल जाता है ।

विटामिन ‘डी’ की एक निश्चित मात्रा शरीर के लिए आवश्यक है । बच्चों और युवाओं के रक्त में 66 से 165 यूनिट विटामिन डी प्रति 100 घन सेन्टीमीटर के हिसाब से पाया जाता है। एक युवा पुरुष को स्वस्थ रहने के लिए विटामिन ‘डी’ की औसत दैनिक आवश्यकता लगभग 500 से 1000 यूनिट है जोकि निम्न पदार्थों में से किसी एक से उसके साथ दिये गये परिमाण में प्रयोग करने से प्राप्त हो सकती है :

0.025 मिलीग्राम कैल्सिफेराल । 3 से 6 बूंद हैलीबुट लिवर ऑयल अथवा 2 चम्मच काड लिवर ऑयल । 1 पाव मक्खन अथवा 1 गैलन दूध ।

विटामिन ‘डी’ की कमी से रक्त में फास्फेटेस की मात्रा अनिवार्यत: बढ़ जाती है । मल में कैल्शियम और फॉस्फोरस की मात्रा बढ़ जाती है, मूत्र में कम हो जाती है । ऐच्छिक माँसपेशी की टोन कम हो जाती है और लिगामेंट ढीले पड़ जाते हैं । आँतों की अनैच्छिक माँसपेशियों की टोन कम हो जाती है, परिणामस्वरूप आँतों में खाना अधिक देर तक रुकता है और आँतों के भीतर की प्रतिक्रिया क्षारीय होने लगती है ।

विटामिन ‘डी’ की अधिकता होने पर रक्त में कैल्शियम और फॉस्फोरस की मात्रा बढ़ जाती है। शरीर के मृदु तन्तुओं में कैल्शियम जमा होने लगता है । (प्राय: गुर्दों में और रक्त वाहिनियों में जमा होता है) अत: वृक्क और हृदय रोगों की उपस्थिति में इसका अधिक मात्रा प्रयोग नहीं करनी चाहिए। इसकी अधिकता से भूख की कमी, भार कम होना, जी मिचलाना, वमन और अतिसार, मूत्र की अधिकता, थकावट, कमजोरी, उदासीनता, सिरदर्द, हाथ-पाँवों में झनझनाहट और स्मृति पर प्रभाव होता है। कोई स्थायी विकार नहीं होता है ।

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