पेचिश ( अतिसार ) की दवा [ Aav Ki Bimari Ka ilaj ]

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अतिसार का रोग प्राय: खान-पान की गड़बड़ी के कारण से हुआ करता है । रोगी जो भोजन करता है वह पच नहीं पाता है और प्रवाहिका (अतिसार या पतले दस्तों अथवा पेचिश) के रूप में पचा और अपचा भोजन निकलने लग जाता है। वैसे यह सामान्य तथा पूर्णतयः साध्य रोग है । उचित चिकित्सा से यह रोग शीघ्र ही शान्त हो जाता है ।

यहाँ पेचिश का अंग्रेजी दवा बताया गया है :-

इंजेक्शन डाइहाइड्रो इमेटिन (निर्माता रोश) – 30 से 60 मि.ग्रा. की एक एम्पूल नित्य प्रति अथवा एक दिन बीच में छोड़कर माँस में कुल 6 से 10 इंजेक्शन लगायें।

नोट – अतिसार के लिए वैसे कोई पेटेंट इंजेक्शन नहीं आते हैं। इस रोग में विटामिन्स, फोलिक एसिड तथा लीवर एक्सट्रेक्ट के संयुक्त अथवा असंयुक्त योग ही व्यवहार में लाये जाते हैं। इसके लिए प्रुक्टोडेक्स इनसैलाइन 10% (रेपटाक्स कम्पनी) अथवा सोडियम क्लोराइड सी डेक्स्ट्रोज 5% (निर्माता डेज, डूफार और एलेम्बिक आदि औषधि निर्माता कम्पनियाँ इत्यादि) का व्यवहार डिहाईड्रेशन अर्थात् पानी की कमी को पूरा करने के लिए कर सकते हैं। ड्रिप मेथड से नॉर्मल सैलाइन या मोलार (सोडियम लैक्ट्रेट 1/6) शिरा में धीरे-धीरे 1 से 3-4 बोतल तक आवश्यकतानुसार 40 से 50 बूंद प्रति मिनट ड्रिप मेथड से दे सकते हैं। आवश्यकतानुसार और भी अधिक बोतलें प्रयोग में लायी जा सकती हैं ।

एमीओवाइटक (फाईजर) – दो कैपसूल दिन में चार बार । स्थायी लाभ के लिए 10 से 14 दिन तक सेवन करायें ।

स्टेप्ट्रोपाराक्सिन कैपसूल (बी. नाल कंपनी) – 1-2 कैपसूल दिन में 3 बार दें ।

क्वीनोसोन (रिसर्च एण्ड रेमेडीज) – 1-2 कैपसूल दिन में 4 बार दें ।

इण्टेस्टोपान फोर्ट (सैण्डोज कंपनी) – प्रयोगविधि उपर्युक्त की भाँति ।

क्लोरोस्ट्रेप (पी. डी. कंपनी) – इन्टेरोस्ट्रेप (डेज) टाइफोस्ट्रेप (स्टैण्डर्ड) रिओफीन (रालीफिशन) इत्यादि में से कोई भी सभी समान रूप से गुणकारी । वयस्कों को 1-2 कैपसूल प्रत्येक 6-6 घण्टे पर – यही मात्रा 3-4 दिनों तक दी जा सकती है। बाद में यथा आवश्यक कम कर दें । यह औषधि ऐमेबिक एवं बेसिलरी डिसेन्ट्री, आन्त्र प्रदाह, पेचिश, संक्रामक अतिसार, जठरान्त्र प्रदाह में लाभकारी है।

डी-हाइड्रो इमेटिन (रोश कम्पनी) – 1-2 टैबलेट दिन में 3-4 बार 6 से 10 दिनों तक स्थायी लाभ हेतु सेवन करायें ।

एमिक्लीन (ग्रिफान कम्पनी) – दो टैबलेट दिन में 4 बार खाली पेट दें। स्थायी लाभ के लिए दो सप्ताह तक निरन्तर सेवन करायें । स्टैण्डर्ड कम्पनी एलीक्वीन फोर्ट टिकिया उसी के समान गुणकारी है ।

एण्टामीजोल (बूटस कम्पनी) – दो टैबलेट दिन में 3 या 4 बार चार दिनों तक दें ।

एण्टोबैक्स (सीबागायगी कम्पनी) – 2 टैबलेट दिन में 4 बार । दस दिनों तक दें ।

फ्लेजिल 200 या 400 (में एण्ड बेकरकम्पनी) – 1-2 टैबलेट दिन में 4 बार सेवन करायें।

इण्टेसेप (डूफार कम्पनी) – दो टैबलेट दिन में 3 या चार बार ।

यूनिडेज कम्पाउण्ड (यूनिकेम कम्पनी) – मात्रा उपर्युक्त औषधि की ही भांति ।

इण्टोस्टेपान (सैण्डोज कंपनी) – वयस्कों को 2-4 टैबलेट दिन में तीन बार। बच्चों को 1-3 टैबलेट दिन में 3 बार (आयु के अनुसार) ।

स्ट्रेप्टोमैग्मा (जोहनवाइथ) – 1 या 2 टैबलेट दिन में 3 बार । बच्चों को आयु के अनुसार । इसका संस्पेशन भी उपलब्ध है । वयस्कों को टिकिया प्रयोग करायें ।

फ्यूरोक्सोन (एस. के. एफ.) – 100 मि.ग्रा. की एक टैबलेट दिन में 4 बार । 5 वर्ष से ऊपर आयु के बच्चों को 1/4 टैबलेट दिन में 4 बार सेवन करायें ।

रैनोकैब (जी. मैनर्स) – 1-2 टैबलेट दिन में 3-4 बार ।

फ्यूरोक्सोन संस्पेंशन (एस. के. एफ.) – व्यस्कों को 15 मि.ली. दिन में 4 बार। 5 वर्ष से ऊपर बच्चों को 5 से साढ़े सात मि.ली. दिन में 4 बार, 1 से 4 वर्ष की आयु के बच्चों को ढाई से 5 मि.ली. दिन में 4 बार ।

ग्वानीमायसिन संस्पेंशन फोर्ट (ग्लैक्सो) – व्यस्क 15 से 25 मि.ली. दिन में 4 बार प्रत्येक 3-3 घण्टे के अन्तराल से ।

सल्फाग्वानीडीन संस्पेंशन (डेज) – बच्चों को 10 से 15 मि.ली. दिन में 4 घण्टे पर । शिशुओं को 5 मि.ली. प्रत्येक 4-4 घण्टे के अन्तराल से ।

पैक्टोकैब संस्पेंशन (कैमोफार्मा) – व्यस्क 10-15 मि.ली. दिन में 3 बार ।

रैनोकैब संस्पेंशन (जी. मैनर्स) – बच्चे 2.5 मिली. दिन में 3 बार । शिशुओं को आयु तथा रोगानुसार ।

गैस्ट्रोमायसिन संस्पेंशन (मेप्रालैब्स) – शिशु आधी चम्मच दिन में 4 बार। बच्चे को 1 चम्मच दिन में 4 बार । शिशु को 1-2 चम्मच दिन में 4-5 घण्टे के अन्तराल से।

स्ट्रेप्टोमैग्मा संस्पेशन (जोहन वाइथ) – बच्चे को 2-3 चम्मच 4-6 घण्टे पर ।

अरिस्ट्रोजिल सीरप (एरिस्टो) – शिशु को 1-2 चम्मच दिन में 3-4 बार । छोटे बच्चों की आधी चम्मच दिन में 3-4 बार ।

काल्टिन विद नियोमायसिन (अब्बट) – मात्रा उपर्युक्त की भाँति ।

फ्राममाईसेटिन (framycetin) (राऊसेल फार्मास्युटिकल्स) – बच्चों के दस्तों को बन्द करने के लिए एक नई एण्टी बायोटिक दवा सल्फेट में पेकटिन और केयोलिन मिलाकर सीफ्राके संस्पेशन के नाम से बनाई गई है । इस सोफ्राके संस्पेशन के प्रयोग से रक्त व शरीर का तरल कम हो जाना, पेट फूल जाना (दस्तों के साथ) इत्यादि में भी लाभ प्रदान होता है । यह दवा 1 माह के बच्चे का आधा छोटा चम्मच, 1 वर्ष के बच्चे को 1 छोटा चम्मच, 1 से 3 वर्ष की आयु के बच्चे को 2 छोटे चम्मच, 3 से 6 वर्ष की आयु के बच्चे को 3 छोटे चम्मच तथा इससे बड़े बच्चों को 4 छोटे चाय के चम्मच भर दवा दिन में 4 बार पिलाने से प्राय: 24 घण्टे में ही दस्त आना बन्द हो जाते हैं ।

क्रीमो सेक्सीडीन (एम. एस. डी.) – यह दवा बैसीलरी पेचिश, गर्मी के दस्त (समर डायरिया) टायफाईड ज्वर के दस्त और नवजात शिशुओं के कीटाणुओं के संक्रमण से पैदा दस्तों की बहुत ही सफल दवा है। सूजी हुई अन्तड़ियों के कष्टों को दूर करती है और पाखाना बँधकर आने लग जाता है। भार (वजन) के अनुसार-7 से 16 कि. ग्रा. (रोगी बच्चों को) 2.5 से 7.5 मि.ली. 16 से 34 कि.ग्रा. 7.5 से 15 मि.ली. । 6 कि.ग्रा. से कम भार वाले को 1.25 से 2.5 मि.ली. दिन में 3-4 बार पूर्ण लाभ होने तक पिलाते रहें ।

नोट – सल्फा औषधियों के अति सुग्राही रोगियों में तथा आन्त्र अवरोध में इस औषधि का प्रयोग न करें । कै को रोकने के लिए ट्रिक्लोरल तथा विटामिन बी-6 की टिकिया दें ।

पेसुलिन या पेसुलिन ‘ओ’ संस्पेंशन (कैडिला) – बच्चों को आयु तथा शरीर भार के अनुसार 5 मि.ली. तथा नवजात शिशुओं को 5 से 10 बूंद प्रतिदिन पिलायें ।

आल्डियामाइसिन (अल्केम) – नवजात शिशुओं को 1.25 से 2.5 मि.ली. तथा बच्चों को 5 मि.ली. प्रत्येक 6 घण्टे के बाद दें ।

नोट – आयोडीन तत्त्व के एलर्जिक रोगियों को तथा (Hyperthyroidism) रोग में इस औषधि का प्रयोग न करें ।

एमीक्लीस प्लस (ग्रिफॉन) – बच्चों को उनकी आयु के अनुसार चौथाई से आधी टिकिया दिन में तीन बार मधु या मात दूध के साथ दें ।

बैक्टोमेप्ट (रैनबक्सी) – संस्पेंशन-2 से 12 मास की आयु वर्ग के शिशुओं को 1.25 से 2.5 मि.ली. तक, 1 से 4 वर्ष आयु वर्ग के शिशु को 2.5 से 5 मिली. तक तथा 5 से 12 आयु वर्ग के बच्चों को 5 से 10 मि.ली. तक 6-6 घण्टे के अन्तराल से दें । अतिसार, बैसीलरी, डिसेन्ट्री तथा जियार्डिया के दस्तों की लाभकारी औषधि है।

बेस्कोट्रिम पी. के. (ब्लूशील्ड) – 6 से 12 वर्ष के बच्चों को 10 मि.ली. । 5 मास से 6 वर्ष तक आयु वर्ग के शिशुओं को 5 मि.ली. तथा 6 सप्ताह से 5 मास के बच्चों को 2.5 मि.ली. की मात्रा में 12-12 घण्टे के अन्तराल से सेवन करायें ।

क्लोरैम्बीन संस्पेंशन (ए. एफ. डी.) – बड़े बच्चों का 5 मि.ली., 2 वर्ष तक के शिशुओं को 2.5 मि.ली. तथा नवजात शिशु से 12 मास तक आयु वर्ग के शिशु की 1.25 मि.ली. की मात्रा में दिन में 3-4 बार पिलायें । इसकी टिकिया भी उपलब्ध है । बच्चों के दस्त रोकने की दिव्य औषधि है ।

क्रीमोमायसिन (एम. एस. डी.) – बच्चों को 1.25 से 2.5 मि.ली. तथा शिशुओं को 5 से 10 बूंद दिन में 2-3 बार पिलायें ।

फुरोक्सोन संस्पेंशन (एस्कायलैब) – 1 वर्ष से कम आयु के बच्चों को 1.25 से 2.5 मि.ली. । 1 से 4 वर्ष के बच्चों को 5 मि.ली. तथा 5 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के बच्चों को 5 से 7.5 मि.ली. तक दिन में 4 बार पिलायें ।

जेटोसेक 5 सीरप ( निर्माता एथनार ) – पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों को 1.5 मि.ली. तथा 5 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के बच्चों को 5 मि.ली. की मात्रा में दिन में 3-4 बार सेवन करायें । दस्तों एवं पेचिश की अचूक औषधि है ।

ड़िपेन्डाल (एस. के. एफ.) – 5 वर्ष से ऊपर के बच्चों को आधी टिकिया तथा 1 से 5 वर्ष के बच्चों की 1/4 टिकिया दिन में 3 बार दें ।

नोट – इसका संस्पेंशन भी आता है जो 5 वर्ष से बड़े बच्चों को 20 मि.ली. 1 से 5 वर्ष के मध्य आयु वर्ग के बच्चों को 10 मि.ली. तथा 1 वर्ष और इससे छोटी आयु के शिशुओं को 2.5 से 5 मि.ली. तक दिन में तीन बार तक दें ।

विशेष सावधानी – 1 वर्ष से कम आयु के शिशुओं को टिकिया सेवन न करायें।

विशेष नोट – बच्चों के अनेक घातक रोगों में इस रोग का प्रमुख स्थान है। गर्मियों में यह रोग प्राय: होता है । अजीर्ण, अफारा, पेट की गड़बड़ी के कारण बच्चों में यह रोग खतरनाक हो जाया करता है। बहुधा इसका आरम्भ उल्टी, पेट दर्द और दस्तों से होता है। रोग जैसे-जैसे बढ़ता जाता है दस्तों का रंग क्रमश: पीला, सफेद या हरा हो जाता है। फेनयुक्त मल में से खट्टी दुर्गन्ध युक्त बदबू आती है। मल में अपच पदार्थ भी शामिल रहते हैं । दस्तों से पेट में वायु उत्पन्न हो जाती है और शारीरिक तापमान क्रमश: बढ़ता चला जाता है । यदि समय पर उचित चिकित्सा नहीं की गई तो स्थिति सन्यास तक भी जा सकती है। अत: दूध पीते और छोटे बच्चों को दस्त लग जाने पर चिकित्सा करने में बहुत ही सावधानी की आवश्यकता है । दूध पीते बच्चों को कई बार बड़े-बड़े दस्त आ जाने से उसके रक्त व शरीर का पानी एवं आवश्यक खनिज दस्तों में निकल जाता है । जब इस प्रकार की स्थिति बच्चों अथवा बड़ों में हो जाती है तो इस दशा को डॉक्टरी में डीहाइड्रेशन (Dehydration) कहा जाता है । बहुत अधिक दस्त आ जाने से रक्त का पानी निकल जाने से खून गाढ़ा हो जाता है। इसके कारण शरीर में संचार न हो सकने से रोगी की मृत्यु हो सकती है। दस्तों तथा उल्टी के माध्यम से शरीर का पानी निकलकर (दस्तों में कमी या अधिकता) के अनुसार लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं ।

ज्वर, चिड़चिड़ापन, भूख न लगना, कै होना, चेहरा पीला पड़ जाना, बेहोशी, आँखें अन्दर गड्ढे में दब जाना, सिर के तालु की हड्डी दबकर वहाँ गड्ढा पड़ जाना तथा मूत्र कम आने लगना । बच्चों में दस्त आने के कारण उनके आमाशय और अन्तड़ियों में तीव्र सूजन हो जाया करती है । आदि पशु का अथवा डिब्बों का पाउडर मिल्क पीने वाले बच्चों को E.Coli कीटाणुओं के संक्रमण से उनका आमाशय और अन्तड़ियों में तीव्र सूजन (गैस्ट्रोएंट्राइटिस) का रोग धीरे-धीरे 6 माह से 2 वर्ष आयु के बच्चों को शुरू हो जाता है। इस रोग में पहले पतले हरे रंग के बदबूदार पाखाने आते हैं। शीगेला कीटाणुओं के संक्रमण 6 महीने और इससे बड़े बच्चों में हो जाने पर बच्चे को तीव्र ज्वर और श्वासांगों में कष्ट तथा दस्तों में आँव भी आ सकता है । सोलयोनेला कीटाणुओं का संक्रमण होने पर दस्तों के साथ बच्चों को अत्यधिक कै भी आती हैं और पेट में दर्द भी होता है।

दस्तों के लगातार आते रहने से शरीर व रक्त का तरल सोडियम, पोटाशियम इत्यादि आवश्यक खनिज लवण भी निकल जाते हैं । यदि दस्तों के साथ रोगी को कै भी आ रही हो तो शरीर का तरल निकल जाने और खुराक अर्थात् भोजन न ले सकने के कारण रक्त में अम्लता बढ़ जाने के कारण विषैले प्रभाव कीटोसिस पैदा हो सकते हैं। दूध पीने से बच्चों को दस्त आने पर दूध पिलाना बन्द कर दें । मीठे सेब का रस कपड़े से छानकर बार-बार पिलाने से दस्त भी रुक जाते हैं और रक्त व शरीर के तरल की कमी भी दूर होने लग जाती है। जौ का पानी या अण्डे की सफेदी को पानी में घोलकर बार-बार थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पिलाते रहना लाभदायक है । फलों के रस, सब्जियों के पके रस, और पानी बार-बार पिलाते रहने से रक्त में तरल पहुँच जाता है। नवजात शिशुओं में दस्त रोकने हेतु एण्टी बायोटिक औषधियों का अधिक सेवन हानिकारक सिद्ध हो सकता है । यदि दस्तों की रोकथाम न हो पा रही हो तो रोगी को तत्काल किसी सुविधा सम्पन्न अस्पताल में भेज देना चाहिए।

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