चर्म रोग का होम्योपैथिक इलाज [ Homeopathic Medicine For Skin Disease In Hindi ]

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चर्म रोग का होम्योपैथिक इलाज

इस लेख में हम एक केस की चर्चा करेंगे कि कैसे त्वचा पर लाल दाने, उसमे गंभीर जलन की समस्या होम्योपैथिक दवा से ठीक हुई ?

एक महिला को एक हफ्ते से टांगों में सूजन, त्वचा पर लाल दाने, उसमे गंभीर जलन और दर्द महसूस हो रहा था। पैर के त्वचा पर गहरी दरारें और सेल्युलाइटिस था। सेल्युलाइटिस होने पर बैक्टीरिया त्वचा के अंदर चले जाते हैं।

सेल्युलाइटिस बहुत तेज़ी से फैलता है, त्वचा में सूजन और लाली दिखाई देती है, इसे छूने पर दर्द होता है। त्वचा में तीव्र खुजली महसूस होना, तेज बुखार और ठंड लगना भी शामिल था।

वह बहुत बेचैन थी, उन्हें बड़ी मात्रा में ठंडे पानी की प्यास लग रही थी, तीन दिनों से कब्ज थी और पाखाना की कोई हाजत नहीं था, कठोर, सूखा मल, ठंड के साथ तेज बुखार था, पैरों को ढकना उन्हें पसंद नहीं था।

उन्हें संगति सुनना बहुत पसंद था और पैरों को छूने नहीं देती थी जैसे कि वे टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे। इस अनोखे लक्षण को मैंने नोट किया। उन्हें पिछले 2 साल से बार-बार टाँगों में सूजन भी हो जाती थी।

एक घंटे या उससे अधिक समय तक खड़े रहने और बैठे रहने पर सूजन हो जाता है। उंगली से दबाने पर गड्ढा हो जाता है। उनकी गर्दन पर छोटे-छोटे मस्से भी हो गए थे।

मस्सों और पैरों की नाजुकता की अनोखी अनुभूति के आधार पर, Thuja ही सबसे अच्छा दवा निकल कर आया।

ऐसे में Thuja 200 की हफ्ते में 1 बार मैंने लेने की सलाह दी। परिणाम यह निकला कि एक ही खुराक से एक हफ्ते के अंदर पूरी समस्या ठीक हो गई , यह है होम्योपैथी का चमत्कार।

Video On Skin Problem 

Homeopathic Medicine For Skin Disease In Hindi

होमियोपैथिक में चर्म रोग कोई विशेष प्रकार के रोग के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि शरीर के अंदर विभिन्न स्थानों में असंतुलन चर्म या शरीर के बाहरी सतह पर कष्टदायी या बिना कष्ट के अपने को स्पष्ट रूप से प्रकट करता है। बहुत से होमियोपैथ लोगों के अंदर यह धारणा है कि चर्म रोग सिर्फ सोरिक है, मगर ऐसी बात नहीं है । जैसे सफेद दाग, सुनबहरी और मोटा चमड़ा मस्सा – साइकोटिक है । सुनबहरी और मोटा चमड़ा सिफिलिटीक है । सोरा तो नहीं है । सोरा का मतलब है मानसिक खुजली । चमड़े पर प्रकट होगा तो बदन खुजलायेगा । पेट में प्रकट होगा तो पेट में दर्द होगा । श्वांस नली में प्रकट होगा तो खांसी होगी।

चर्म रोगों को चमड़े पर ही नजर आना और चमड़े पर इलाज करना मूर्खता होगा। वैसे हालात में अगर चर्मरोग को दबा दिया जाए तो भिन्न-भिन्न प्रकार की बीमारियां व कष्टदायक लक्षण प्रकट होते है।

जैसे किसी को बदन में खुजली हुई और उसको किसी तरह के बाहरी औषधि लेप या मलहम से चमड़े पर हटा दिया जाये ।
मानसिक संतुलन, बांझपन, बदन हाथ का फुलना, गुर्दा खराब होना, पेशाब का कष्ट होना, नपुंसकता स्त्री-पुरुष के जननेद्रियां शिथिल हो जाना, मधुमेह, दम फूलना इत्यादि हो सकता है। आप देखते होंगे कुछ लोग पांव हिलाते रहते है, ये पांव हिलाना सोरा का लक्षण है।

दरअसल दाग, खुजली में मलहम लगाया है वे दाग- दिनाय, खुजली रोगी के मस्तिष्क में चला गया है तो मस्तिष्क में हड्डी के अंदर नहीं खुजला सकता है तो पांव हिलाने लगता है- ये लक्षण जिंकम मेटालिकम के है।

जिंकम मेटालिकम देने से दाग दिनाय खुजली छूट नहीं जायेगा बल्कि दबा हुआ रोग बाहर आ जायेगा और मन संतुलन से मुक्त हो जायेगा । जैसे- काछ, हाथ, पांव, तलवा, तलहत्थी में नोचनी हो जायेगा। यहां लक्षण के आधार पर दवा दी जायेगी।

त्वचा के अन्य उपसर्गों की लक्षणानुसार चिकित्सा इस प्रकार है – 

शरीर का बरसात के दिनों में खुजलाना- रसटॉक्स 30- यदि बरसात के दिनों में शरीर में खुजली या जलपित्ती हो तो ऐसी अवस्था में इस दवा को दिन में तीन बार लेते रहना चाहिये । इससे प्रायः बरसात-सर्दी के दिनों में होने वाली खुजली या इसी प्रकार के चर्म-रोगों में फायदा होता है । बरसात में होने वाली खुजली या अन्य उद्भेदों में नैट्रम सल्फ का प्रयोग भी प्रायः किया जाता है, यह दवा भी बरसाती उद्भेदों आदि पर अच्छा कार्य करती है । इसे 30 शक्ति या आवश्यकता के अनुसार 200 या 1M में भी दिया जा सकता है ।

चर्म-रोग की सभी अवस्थाओं में – सल्फर 30- चर्म-रोग की प्राय: सभी अवस्थाओं में सल्फर को कदापि नहीं भूलना चाहिये । इसे 30 या निम्नशक्ति में देने से कभी-कभी चर्म-रोग कुछ बढ़ जाते हैं जो सदृश विधान के अनुसार उपयुक्त हैं परन्तु चर्म-रोग चाहे किसी भी प्रकार का हो, सुनिर्वाचित औषधि देने के पूर्व इस दवा की उच्चशक्ति की एक मात्रा अवश्य देनी चाहिये, क्योंकि अन्य दवाओं के मार्ग में आने वाले अवरोध की सल्फर खोल देती है ।

तेज खुजली में- मेजेरियम 30- तेज खुजली की अवस्था, जिसमें रोगी खुजलाते-खुजलाते परेशान हो जाता है, ऐसी स्थिति में इस दवा का प्रयोग दिन में दो या तीन बार करना चाहिये ।

खाज-खुजली के पुराने विष पर- सोरिनम 30,200- खाज-खुजली के पुराने विष को नष्ट करने के लिये इस दवा को कदापि नहीं भूलना चाहिये। निम्नशक्ति रोग को अच्छा करती है वहीं इस दवा की उच्चशक्ति इसके विष को नष्ट कर देती है ।

चर्म-रोग व अत्यधिक खुजली- फ्लोरिक एसिड 30, 200- किसी भी चर्म-रोग में अत्यधिक खुजलाहट होने पर यह दवा देनी चाहिये । इसकी खुजली शरीर की भिन्न-भिन्न जगहों पर होती है और त्वचा सूखी रहती है । ऐसी अवस्था में इस दवा का प्रयोग आवश्यकता के अनुसार किया जा सकता है ।

त्वचा पर फुन्सियाँ, छिछड़े उतरें व जलन हो- आर्सेनिक 12, 30- त्वचा पर फुन्सियाँ हों, त्वचा से छिछड़े उतरें व जलन हो तो ऐसी स्थिति में इस दवा को दिन में दो बार देना उचित है ।

सिर तथा बालों पर पपड़ी बनने पर-नैट्रम म्यूर 30- ऐसी खुजली जिसमें सिर तथा बालों पर पपड़ी जमती हो व शरीर में खुजली आदि हो तो यह दवा देना उचित है । इसमें प्रायः अण्डकोष, घुटनों के पीछे, पूरे शरीर में बड़ी-बड़ी लाल-लाल पुंसियाँ हो जाती हैं व उनमें खुजली होती है । चमड़ा सूख जाता है ।

सिर पर एग्जिमा व दाद आदि- कॉस्टिकम 30- सिर पर एग्जिमा व दाद आदि हों तो इस दवा का प्रयोग किया जाता है । यदि रोग नया व तीव्र हो तो इस दवा को सल्फर 200 देने के पश्चात्, नैट्रम म्यूर 30 के साथ पर्यायक्रम से देना चाहिये ।

सिर पर एग्जिमा- मेजेरियम 6, 30– यदि सिर पर एग्जिमा होकर पपड़ी जमे, जो वैक्सीन आदि लेने के बाद ही या बाद में अन्य चर्म-रोग उत्पन्न हो गया हो तो इस दवा का प्रयोग उत्तम है । यदि सिर में एग्जिमा हो जिसमें बाल चिपट गये हों, उसमें से पीव निकलती हो, विस्तर की गर्मी से खुजली बढ़ जाती हो तो ऐसी स्थिति में भी यह उत्तम दवा है । इसे दिन में तीन बार लेना चाहिये ।

चर्म पर काले धब्बे या उद्भेद निकलने पर- आर्जेन्टम नाइट्रिकम 30 – जब कभी त्वचा पर काले-काले उद्भेद हों, चमड़ा भूरे रंग का तना हुआ उस पर लसीला पदार्थ लगकर सूख गया हो, शरीर की त्वचा पर अनियमित चकत्ते निकलते हों जिनका रंग बदलकर भूरा या बैंगनी या ताँबिया हो गया हो तो यह दवा दिन में तीन बार दें । यदि रोग पुराना हो गया हो तो सल्फर 200 की एक मात्रा देने के पश्चात् इस दवा को प्रारंभ करें । ग्रेफाइटिस 200 या इससे भी ऊँची शक्ति में लक्षणानुसार देनी चाहिये । मध्यस्थ के रूप में सल्फर 200 भी दी जा सकती है ।

चर्मरोग चाहे किसी प्रकार का हो- एजाडिरेक्ट्टा इण्डिका (नीम) O, ओसिमम सैंक्टम (तुलसी) Q तथा कैलोट्रोपिस जाइगैण्टिया (मदार)Q- तीनों को बराबर मात्रा में तेल या ग्लिसरीन में मिलाकर लगाने से चर्म-रोग में अच्छे परिणाम मिलते हैं । इसे चर्म-रोग के मलहम की तरह भी बाह्य रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है ।

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