Tonsillitis Treatment In Homeopathy

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तालूमूल-ग्रन्थि के प्रदाह को टॉन्सिल या टॉन्सिल होना कहते हैं । यह रोग मूल रूप से सर्दी लगने, वर्षा-पानी में भीगने, ठण्डे पदार्थ ज्यादा खाने आदि के कारण होता हैं ।

(A) गले के दाँई तरफ टॉन्सिल होना

लाइकोपोडियम 200, 1M – यह दवा पहाड़ी सेवार (पाषाणभेदी) से बनाई जाती है । इस दवा की प्रधान क्रिया मानव शरीर में दाहिनी ओर देखी जाती है । यह एक सोरा दोष नाशक दवा है तथा इस दवा का असर स्थायी होता है । अतः इसका प्रयोग जल्दबाजी में न कर फल की प्रतीक्षा करनी चाहिये । इस दवा का प्रभाव पुरुष-इन्द्रियों पर भी प्रधान रूप से देखा जाता है । टॉन्सिल या गले के उदभेद की स्थिति में इस दवा के अधिकार क्षेत्र के रोग का आक्रमण सर्वप्रथम दाहिनी ओर होता है जैसे- टॉन्सिल की स्थिति में दर्द व सूजन पहले दाँई तरफ होती है फिर आक्रमण बाँई ओर देखा जाता. है । दूसरा प्रमुख लक्षण यह है कि रोगी को गरम चीजें खाने-पीने की इच्छा होती है, गर्मी से रोगी को आराम मिलता है व ठंडी वस्तुओं से रोग में वृद्रि होने के कारण वह ठंडी वस्तुओं से घृणा करता है । न्यूमोनिया में भी यदि पहले आक्रमण दाँये फेफड़ों से होकर धीरे-धीरे बॉई ओर बढ़े तो इस दवा को कदापि नहीं भूलना चाहिये । न्यूमोनिया की अन्तिम अवस्था में तो यह दवा मंत्रवत कार्य करती है । फेफड़ों के भीतर जमा हुआ बलगम ढीला कर देती हैं ।

बेलाडोना 30, 200 – इस दवा कां अधिकतर प्रभाव शरीर के दाँई तरफ होता है और गले में दाहिनी तरफ रोग का आक्रमण होता है । यदि दोनों तरफ आक्रमण समान रूप से हुआ तो दाहिने हिस्से में दर्द अधिक होगा। बॉये हिस्से में उतना दर्द या सूजन नहीं देखी जायेगी । दवा का विशिष्ट लक्षण है- रोगी सर्दी से डरता है | वह शीत प्रधान होता है । ठंड से रोग-वृद्रि होने पर भी उसे रोगग्रस्त स्थान पर जलन होती है- यही दवा का प्रधान लक्षण है । रोगी त्वचा पर हाथ नहीं रखने देता क्योंकि त्वचा पर गर्मी होती है । दर्द अचानक और एकदम होता है तथा एकाएक चला जाता है । यदि टॉन्सिल की सूजन के साथ दर्द तथा ज्वर के लक्षण हों, सूजन वाले स्थान पर लालिमा हो तो इस दवा का अच्छा परिणाम सामने आता है ।

एपिस मेल 30, 200 – इस दवा का रोग क्षेत्र भी दाँई ओर है अर्थात् रोगी को गले में दाँई तरफ दर्द व उद्भेद होते हैं, परन्तु इस दवा की बीमारी में दर्द अधिक नहीं होता । गले या टॉन्सिलों में भूरे रंग के जख्म दिखलाई देते हैं जिनमें से गंदला रस जैसा स्राव निकलता है । प्रमुख लक्षणों में रोगी को प्यास नहीं लगती तथा गले में घुटन का अनुभव होता है । तेज बुखार, पेशाब में दर्द आदि के साथ शोथ या डंक मारने जैसी जलन, जो दाँयी तरफ से प्रारम्भ होकर बॉयी तरफ जाती है । जलन में ठंडक से आराम, गर्मी का सहन न होना अर्थात् गरम वस्तुओं से घृणा आदि मुख्य लक्षण हैं ।

लैक कैनाइनम 30 – इस दवा का आक्रमण पहले एक जगह से प्रारम्भ होकर पुनः उसी जगह पर लौट आता है । अर्थात जब टॉन्सिल का आक्रमण पहले दाँयी ओर से प्रारम्भ होकर बाँयी तरफ जाता है फिर पुनः दाँयी तरफ लौट आये तो इस दवा को याद रखना चाहिये । डॉ० सत्यव्रत ने लिखा है कि यदि लाइकोपोडियम के लक्षणानुसार दवा देने पर भी लाभ न हो तो टॉन्सिल की इस अवस्था में लैक कैनाइनम दवा को अवश्य ही देकर देखना चाहिये ।

मर्क प्रोटो आयोड 30 – इस दवा के अधिकार क्षेत्र में आने वाली गले की बीमारियों का प्रभाव दाँयी तरफ से शुरू होता है जिसमें जीभ की गहराई में गाढ़े पीले रंग का स्राव देखा जाता है । प्रायः टॉन्सिल की इस प्रकार की अवस्था हो तो इसे अवश्य ही दें ।

(B) गले के बॉयी तरफ टॉन्सिल होना

लैकेसिस 30, 200- यह दवा सर्प-विष से बनाई जाती है । इस दवा का अधिकार क्षेत्र शरीर के बाँई ओर अधिक है । बैंगनी रंग के दाने आदि भी उभर आते हैं । रोगी स्पर्श सहन नहीं कर सकता । इस दवा का परीक्षण डॉ० कान्स्टेनटाइन हेरिंग ने किया था । वे जीवित साँपों को हाथ से पकड़ लेते थे । एक बार एक सर्प ने उन्हें काट लिया । सर्प के काटने के बाद वे बेहोश हो गये थे और जब उन्हें होश आया तो उन्होंने अपनी पत्नी से पूछा कि उन्हें सर्प द्वारा काटने के बाद क्या हुआ । जो लक्षण उस वक्त उभरे थे उन्हें वह नोट करते गये ।

इस औषधि का प्रधान लक्षण है कि नींद के बाद रोग में वृद्धि होती है । गर्म जल या गरम वस्तु के सेवन से गले में दर्द बढ़ जाता है । ऐसी स्थिति गले या मुँह के भीतर देखी जाये या टॉन्सिल की अवस्था भी हो तो इस दवा को अवश्य दें । रोगी खुली हवा चाहता है और ठंडे पानी से उसे आराम मिलता है । रोग का आक्रमण बॉयी तरफ से प्रारम्भ होगा और फिर दाहिनी ओर जाता है । रोगी बिस्तर से चौंककर उठ जाता है । इस दवा का काफी अच्छा परिणाम मुझे देखने को मिला है । इसी संदर्भ में एक घटना है- एक बच्ची, करीब दस वर्ष उम्र की होगी, उसके चेहरे पर पुंसी (कुछ मस्सेनुमा ही) थीं, उसकी माँ उसके इलाज के लिये आई । मैंने उसे हुआ । उसकी माँ ने बतलाया कि अकसर ये बॉयी तरफ ही ऐसे बैंगनी मस्से निकलते हैं । लड़की की माँ गोरी थी परन्तु बच्ची का रंग काला एवं चेहरा मुरझाया हुआ था। बैंगनी रंग के मस्सों को बाँयी तरप, देखकर जब मैंने उसे लैकेसिस दी तो बड़ा ही आश्चर्य हुआ, मस्से तो ठीक हुये ही और लड़की का रंग व चेहरा पुनः माँ की तरह चमक उठा ।

एक नगरपालिका अधिकारी के साथ भी गले के बॉयी ओर घाव की यही स्थिति थी । उन्होंने कई दवायें करा ली थीं । किसी ने उन्हें होमियोपैथिक दवा कराने की सलाह दी तो वे हँसने लगे और कहा कि ऐसी दवा से क्या होगा । उनकी बच्ची ने मेरा लेख आदि पढ़ा होगा, इसलिये एक दिन वह मेरी डिस्पेन्सरी में आई व उसने मुझे बतलाया । मैंने उससे उसके पिताजी को लाने को कहा तो वह कहने लगी कि वे इस दवा पर विश्वास नहीं करते। मैंने उसी बच्ची से तमाम लक्षण पूछे और उसने सभी लक्षण विस्तार से मुझे बतलाये जो इस प्रकार थे- ‘पापा के गले के अन्दर बाँई ओर एक छाला है, जो नीले रंग का दिखता है । उन्हें खाते-पीते नहीं बन रहा है, केवल फल व दूध ले रहे हैं । गरम चीजें तो बिल्कुल नहीं खा पाते और बाहर बगीचे में खुली हवा में बैठे रहते हैं । रात को चौंककर उठ बैठते हैं । यहाँ तक कि कमीज तक उतार फेंकते हैं ।’ मुझे कुछ लक्षण अच्छे लगे, इसलिये मैंने लैकेसिस 30 तथा मर्कसॉल दवा लिक्विड में दी और उन दवाओं को पानी के साथ देने की सलाह दी | लड़की ने दवायें चुपचाप बिना बतलाये अपने पापा को देना शुरू कर दिया । एक दिन रास्ते में वह मिली तो कहने लगी – ‘पापा रात में आराम से सो लेते हैं व अब सब कुछ खाने लगे हैं। घावों की सूजन भी कम हो गई है और उन्हें काफी आराम है । मैंने पापा दवाओं से काफी प्रभावित थी अतः उसने स्वयं होमियोपैथिक पुस्तकों का अध्ययन करना शुरू कर दिया था ।

बैराइटा कार्ब 30, 200 – इस दवा में टॉन्सिल का प्रभाव, सूजन, दर्द आदि पहले दाहिनी तरफ से प्रारम्भ होते हैं । व्याधि का प्रभाव इस प्रकार होता है कि थूक निगलना भी मुश्किल हो जाता है। इसका रोगी जरा सर्दी लगते ही टॉन्सिल की चपेट में आ जाता है परन्तु यहाँ इतना भेद है कि जाते हैं । टॉन्सिल पकता धीरे-धीरे है । बेलाडोना और हिपर सल्फर में टॉन्सिल का आक्रमण वेग से एकाएक होता है अर्थात् जिस रात सर्दी लगती है, उसी रात टॉन्सिल सूज जाते हैं एवं जल्दी पकते भी हैं। इस दवा के रोगी के पैरों के तलुये हमेशा पसीने से भीगे रहते हैं एवं उनमें ठंडापन देखा जाता है।

(C) गले की दोनों तरफ टॉन्सिल होना

फाइटोलक्का 30 – यह दवा ग्लैण्ड्स की बीमारियों की दवा है । जब कभी टॉन्सिल पक जायें तब इसका प्रयोग कदापि नहीं भूलना चाहिये । टॉन्सिल में तेज लाल रंग देखा जाता है, साथ ही, सफेद निशान भी पड़ने लगते हैं । टॉन्सिल की ग्रंथियाँ सूज जाती हैं एवं सख्त हो जाती हैं । गले में दर्द भी होता है और रोगी गर्म पानी नहीं पी सकता । टॉन्सिल का आक्रमण दोनों तरफ देखा जाता है । गलसुआ प्रतिरोधक के रूप में फाइटोलक्का की उच्च शक्ति की एक मात्रा देने से इस रोग से पूरा-पूरा बचाव हो सकता है, ऐसा मेरा अनुभव है ।

हिपर सल्फर 200 – जब अन्य दवाओं के देने से भी लाभ न हो तो दूक आदिकथितमदतक्या कड्यक्तिसे अस्थापत्या मिलता है ।

जैबोरैण्डी 30 – गलसुओं की प्रत्येक अवस्था में यह एक उपयुक्त दवा हैं । इस दवा को पाइलोकार्पस भी कहते हैं ।

मर्कसॉल 30 – डॉ० घोष लिखते हैं कि टॉन्सिल फूल जायें या उनमें पीव हो तो मर्कसॉल की उच्चशक्ति की एक मात्रा देकर परिणाम देखना चाहिये। इस दवा का प्रभाव मुंह पर अत्यधिक देखा जाता है । डॉ० एलेन ने लिखा है कि दाँयी तरफ लेटने से रोग में वृद्धि होती है। एवं रोग-वृद्धि का लक्षण कम दवाओं में देखने को मिलता है । अतः इस लक्षण को प्रधान रूप से देखकर ही दवाओं का चुनाव करना चाहिये ।

मर्क वाइवस 30 – टॉन्सिल किसी भी तरफ हो परन्तु उससे बदबू आये तथा जीभ पर दाँतों के निशान पड़ जायें और पसीना भी आता हो परन्तु पसीने से आराम न मिले- यह इसके प्रमुख लक्षण हैं ।

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